सोने की लंका न तो रावण की थी और न ही इसे हनुमान जी ने जलाया था

सोने की लंका न तो रावण की थी और न ही इसे हनुमान जी ने जलाया था ( The Golden Lanka was neither Ravana’s nor Hangman ji had burnt it )

 सोने की लंका न तो रावण की थी और न ही इसे हनुमान जी ने जलाया था |
दोस्तों,  रामायण आप सब ने भी पढ़ा और सुना होगा जिसमें बताया गया है
कि रावण ने कई देवताओं को कैद कर रखा था और विश्वकर्मा जी से अपने लिए सोने की लंका बनवाया  था |
           
सामान्यतया रामायण  सहज और सरल लगती है |
लेकिन वास्तव में इसमें कई ऐसे पहलू है जिनसे हम अनभिज्ञ हैं |
ऐसे एक प्रसंग का ज़िक्र इस ब्लॉग में कर रहा हूँ जिसे जानकर आप आश्चर्यचकित हो जायेंगे कि
ऐसा कैसे सम्भव हो सकता है इसे जानने के लिए पोस्ट को पूरा पढ़ें |
पुराणों के अनुसार एक बार भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी जब कैलाश पर्वत पर
शिव और पार्वती से मिलने गये तो ठंड के कारण माता लक्ष्मी जी ठिठुरने लगी |
 
कैलाश पर्वत पर कोई महल भी नहीं था जहाँ  जाकर वो  राहत  महसूस कर पाती |
माता लक्ष्मी जी ने पार्वती जी पर व्यंग्य कस दिया कि आप स्वयं एक राजकुमारी हैं
और इस तरह का जीवन कैसे व्यतीत कर सकती हैं |
जाते – जाते लक्ष्मी जी शिव और पार्वती को बैकुण्ठ धाम आने का आमंत्रण दे दिया |
कुछ दिनों बाद माता पार्वती और शिव, लक्ष्मी जी के न्यौते को स्वीकार करते हुए बैकुण्ठ धाम पहुँचे |
           
बैकुण्ठ धाम का वैभव देखकर पार्वती जी आश्चर्यचकित हो गई |
साथ ही उनके मन में नारी का विशेष गुण जलन वाली भावना पैदा हो गई |
            
बैकुण्ठ धाम देखने के बाद उनकी लालसा बढ़ गई कि उनके पास भी ऐसा ही वैभवशाली महल हो |
जब माता पार्वती वापस कैलाश पर्वत पर लौटी तो शिव जी से महल बनवाने का हठ करने लगी |
 
नारी हठ के आगे भगवान का भी बस नहीं चलता है तो भगवान शिव ने पार्वती को भेंट करने के लिए कुबेर को कहकर अद्वितीय महल बनवाया
जो तीनों लोकों में अनूठा था |यह महल पूर्णतः सोने का बना हुआ था |
          
जब रावण की नजर इस भव्य महल पर पड़ी तो उसने सोचा कि पूरे त्रिलोक में इतना सुन्दर महल किसी के पास नहीं है, इसलिए यह महल मेरे पास होना चाहिए |
महल पाने की इच्छा मन में दबाकर जब  रावण गृहप्रवेश की पुजा कराने पंडित के रुप में अपने इष्ट देव महादेव के पास गया तो दक्षिणा में सोने के महल की माँग की |
भगवान शिव भी जानते थे कि रावण उनका कितना बड़ा भक्त है |
भगवान शिव को द्वार पर आये ब्राह्मण को खाली हाथ लौटाना धर्मविरोधी लगा,
इसलिए उन्होंने खुशी – खुशी सोने का महल रावण को दान दे दिया |
जब  ये बात माता पार्वती जी को पता चली तो वह अत्यन्त नाराज हुई |
वे इस बात को मानने को कतई तैयार नहीं थी कि उनका सोने का महल किसी और का हो सकता है |
हालांकि भगवान शिव ने पार्वती को मनाने का बहुत प्रयास किया |
माता पार्वती इसे अपमान समझने लगी इसलिए उन्होंने प्रण लिया कि
यदि यह सोने का महल मेरा नहीं हुआ तो त्रिलोक में किसी का भी नहीं हो सकता है |
यही सोने का महल रावण की लंका के नाम से जाना जाने लगा |माता पार्वती इस महल को अपने हाथों से नष्ट करना चाहती थी |
जब रामायण के पात्रों का चयन हो रहा था तो भगवान शिव ने कहा था कि
त्रेता युग में जब विष्णु का अवतार राम के रूप में होगा तो मैं हनुमान का रूप धारण करूंगा
और सोने की लंका को नष्ट कर दूँगा, लेकिन माता पार्वती तो चाहती थी कि वे खुद अपने हाथों से उसका नाश करे |
इसलिए जब रामायण के सभी पात्रों का चयन हो गया और माता पार्वती की कोई भूमिका नहीं रही,
जिससे वो अपने अपमान का बदला ले सके तो भगवान शिव ने कहा कि आप मेरी पूँछ बन जाना
जिससे आपकी भी इच्छा पूर्ण हो जाएगी और आप खुद लंका दहन कर सकते हैं |
            
रामायण में वर्णित लंका दहन हनुमान जी के पूँछ द्वारा ही होता है जो माता पार्वती का रूप थी,
इसलिए लंका दहन के बाद माता पार्वती के गुस्से को शांत करने करने के लिए या पूँछ की अग्नि बुझाने के लिए सागर में जाना पड़ा |

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आपका ——- प्रमोद कुमार 

 

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About PRAMOD KUMAR

मेंने ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन राजस्थान में कम्पलीट किया |इसके बाद B. Ed कर्नाटक से किया | लेखन की चाह बचपन से ही थी, कॉलेज आते आते इसमें कुछ निखार आ गया |कॉलेज में यह स्थिति थी कि यदि कोई निबंध प्रतियोगिता होती और उसमें मेरे शामिल हो जाने से प्रतियोगिता दूसरे और तीसरे स्थान के लिए रह जाता | वापस राजस्थान आने पर अपना विद्यालय खोला ,सरकारी शिक्षक बनकर त्याग पत्र दे दिया |बिजनेस में एक सम्मानित ऊँचाई को पाकर धरातल पर आ गया |अब अपने जन्म स्थल पर कर्म कर रहा हूँ, जहाँ शिक्षा देना प्रमुख कर्म है | बचे समय में लिखने का अपना शौक पुरा करता हूँ |

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11 Comments on “सोने की लंका न तो रावण की थी और न ही इसे हनुमान जी ने जलाया था”

  1. Ravam ne brahaman ka roop nahi dhara tha, Vah Khud Braaman tha, Mahal Banane ke bad jab Grih Pravesh ke liye Pandit ko Bulana tha us samay Ravan se bada Pandit koi nahi tha, Us se poojan ke vidhi karayi gai, tatpashchat Brahaman dakshina ke roop me usne shiv ji se Mahal Mang Liya.

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