भरत – एक ईमानदार भाई Bharat – A Honest Brother

भरत – एक ईमानदार भाई Bharat – A Honest Brother

भरत – एक ईमानदार भाई । दोस्तों, महाराज दशरथ की तीन रानियाँ थी । कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा । भरत कैकेयी के पुत्र थे । जो राम से छोटे थे । राम बड़े थे इसलिए पिता के बाद,  राजा के पद पर राम को बैठना था । परंतु कैकेयी, राजगद्दी पर भरत को, बैठना चाहती थी ।

राम का बनवास

राजा दशरथ ने जब कैकेयी से विवाह किया । तो कैकेयी ने राजा दशरथ से, कुछ भी मांगने का वचन लिया था । क्योंकि कैकेयी के मन में अपने पुत्र को,  राजगद्दी पर बैठाने की अभिलाषा थी । इसलिए कैकेयी ने दशरथ से राम को, 14 वर्ष का वनवास मांगा । दशरथ अपने वचन से विवश थे । इसलिए ना चाहते हुए भी उन्होंने, राम को बनवास भेजने का निर्णय लिया ।

दशरथ की मृत्यु

महाराज दशरथ भली भांति जानते थे । कि कैकेयी ने राम को बनवास क्यों भेजा है । महाराज दशरथ, राम के साथ हुए इस अन्याय से, काफी विचलित हो चुके थे । और इनका ह्रदय इस अन्याय को, सहन नहीं कर सका । और राजा दशरथ, राम के वियोग में मृत्यु को प्राप्त हो गए ।

विवशता

जिस समय महाराज दशरथ की मृत्यु हुई । उस समय भरत अपने ननिहाल में थे । अयोध्या में क्या-क्या हुआ । इन घटनाओं  के बारे में उन्हें,  तनिक भी ज्ञात नहीं था । महाराज दशरथ की मृत्यु का समाचार पाकर, भरतपुर अयोध्या आए । तब उन्हें पता चला की उनकी माता, के कारण उनके बड़े भाई राम को, 14 वर्ष का वनवास हो गया है । इस खबर से भरत का कलेजा तिलमिला उठा ।

भारत  बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति थे । वह जानते थे कि भले ही उन्हें, इन बातों की कोई खबर ना थी । परंतु प्रजा तो यही समझेगी कि, सिंहासन के लालच में वे खुद भी, अपनी माता के साथ मिले हुए हैं । अपनी माता के द्वारा किए इस कृत्य से,  भरत अत्यंत दुखी वह लज्जित थे । अपनी माता से वह बेहद नाराज थे । परंतु पुत्र होने के कारण, वह अपनी माता को कुछ कर ना सके ।

सिंहासन पर बैठने का अनुरोध

महाराज दशरथ  के अंतिम संस्कार, से संबंधित कार्य पूर्ण हो जाने के पश्चात, लोगों ने उन से अनुरोध किया । कि राजा दशरथ की अंतिम इच्छा यही थी । कि अयोध्या के राजा आप ही बने । इसलिए राजकाज संभालें । और प्रजा का इस प्रकार पालन करें । कि वे सुखी रहे । परंतु भरत इस बात को मानने को, तैयार ही नहीं हुए ।  ऋषि मुनियों, विद्वानों और उनकी माताओं, के आग्रह पर भी उन्होंने, सिंहासन पर बैठने से साफ मना कर दिया ।

वह नैतिक दृष्टि से, इसे बहुत ही अनुचित समझते थे । क्योंकि पुराने नियमों के अनुसार,  सिंहासन का असली अधिकारी, राजा का बड़ा पुत्र होता है । और राम, दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे । और उन्हें इस बात का भी अंदाजा था । कि राजगद्दी पर बैठने के बाद, लोग यही समझेंगे कि, उसने अपने बड़े भाई का सिंहासन, हड़प लिया । उन्हें लोगों ने बहुत समझाया । की यह इच्छा उनके पिता की थी ।  इसलिए ऐसी अवस्था में सिंहासन पर, बैठना अन्याय नहीं समझा जाएगा । किंतु भरत किसी की बात को, मानने के लिए तैयार नहीं थे ।

राम से मिलना

उन्होंने विद्वानों, ऋषि मुनियों और अपनी माताओं से विनती की । कि उन्हें राम से भेंट करने की अनुमति दी जाए । भरत की स्थिति के आगे, सब को हार मानना पड़ा । और उन लोगों ने भरत को, रामचंद्र जी से भेंट करने की अनुमति दे दी । भरत को यह ज्ञात नहीं था कि, राम कहां है इसलिए वह, राम को ढूंढने वन में निकले । कई वनों में घूमते रहे । लोगों से पूछे और अनेक कठिनाइयों का सामना किया । उधर जब राम को यह समाचार मिला । तब राम उनके सामने आए ।

भारत के साथ उनके परिवार के, सभी लोग भी थे । उनकी माताएं भी उनके साथ थी । राम को सामने देख, भरत दौड़कर उनके चरणों में गिर गए ।

भरत ने अपने माता के द्वारा, भेजे गए वनवास के लिए । और राम पर किए गए, हर तरह के अन्याय के लिए, स्वयं को दोषी माना । और सारा दोष अपने सर पर ले लिए । और रामचंद्र जी से क्षमा याचना करने लगे । रामचंद्र जी के चरणों में गिरकर, भरत जिस तरह से क्षमा याचना कर रहे थे । उसकी तुलना आज भी, किसी दूसरे उदाहरण से नहीं की जा सकती । परंतु रामचंद्र जी ने भरत को, समझाते हुए कहा कि, पिताजी की आज्ञा से तुम, राज्य पर शासन करो ।

भारत के अनुरोध से जब, राम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा । तब भरत ने राम से कहा कि, सिंहासन का असली उत्तराधिकारी आप ही हैं । और सिंहासन पर आपके सिवा, कोई नहीं बैठ सकता । जब तक आप अयोध्या वापस नहीं आ जाते । तब तक मैं राज्य की देखभाल करूंगा । परंतु सिंहासन पर नहीं बैठूंगा । और सिंहासन पर आपके खड़ाऊँ विराजमान रहेंगे ।

महानता

रामायण में ही कई ऐसे उदाहरण हैं । जहां भाइयों ने अपने सगे भाइयों का, धन सम्पत्ति और सिंघासन छीन लिये । वहीं भरत का मिले हुए, राज सिंघासन को त्याग देना, बल्कि बड़े भाई को उनका अधिकार, देने के लिए अपनी माता के द्वारा किये गए, गलत कार्यों का सारा दोष, अपने सर पर ले लेना । और बड़े भाई को मानाने के लिए, उनके चरणों में गिरकर विलाप करना, भरत के उच्च विचार और महानता का,  सर्व श्रेष्ठ उदाहरण है ।

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धन्यवाद ।

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