चीन का स्वदेशी विमानवाहक युद्ध पोत

        चीन का पहला  स्वदेशी विमानवाहक              युद्ध पोत 

चीन का  पहला स्वदेशी  विमान वाहक  युद्ध पोत 13 मई 2018 को परीक्षण के लिए समुद्री जल में उतारा जा चुका है।

अपनी सेना को मजबूत बनाने के लिए और बेहद विवादित समुद्री इलाकों पर,

पैठ बनाने की दिशा में इसे चीन का बड़ा कदम माना  जा रहा है।

पचास हजार टन वजन वाला यह युद्ध पोत सही में चीन के जहाजी बेड़े का दूसरा युद्ध पोत है।

आप कहेंगे इसका नाम क्या है तो इसका अभी तक कोई भी नाम नहीं है,

इसे आप बेनाम कह सकते हैं।

राजनीति और रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस अति महत्वाकांक्षी विमानवाहक युद्ध पोत से,

भले ही एशिया में चीनी की ताकत बढ जाए लेकिन यह युद्ध पोत,

तकनीक के मामले में अमेरिका से काफी पीछे है।

एक अनुमान के मुताबिक इस विमान वाहक युद्ध

पोत के चीनी सेना में 2020 तक शामिल होने की उम्मीद है। 

जहाज के बारे में 

चीन के पहले स्वदेशी विमानवाहक युद्ध पोत की

यदि हम लम्बाई की बात करें तो  इसकी लम्बाई 315 मीटर है।

रही बात चौड़ाई की तो इस चीन के पहले सवद विमानवाहक युद्ध पोत की चौड़ाई 75 मी है।

🔴इसका कुल वजन 50000 टन है।

🔴इस पोत में 12 हजार उपकरण मौजूद हैं।

🔴इसे चीन की कुल 532 कंपनियों ने तैयार                 किया है। 

🔴इसमें आश्चर्य जनक रूप से 3600 से भी ज्यादा केबिन हैं। 

🔴इसके निर्माण के दौरान इसमें प्रति दिन 3000 मजदूर काम करते थे। 

🔴 चीन के इस पहले स्वदेशी विमानवाहक युद्ध पोत में,

38 अन्य युद्ध पोत को ले जाने की क्षमता है।

जबकि इससे पहले वाले में यह क्षमता केवल 30 विमान थी। 

पूर्व युद्ध पोत से बेहतर 

चीन के पहले विमानवाहक युद्ध पोत का नाम लियाओनिंग है।

लेकिन यह विमानवाहक युद्ध पोत चीन का पहला स्वदेशी विमानवाहक युद्ध पोत नही था।

इस पहले स्वदेशी विमानवाहक युद्ध पोत पर गौर करें तो यह पहले वाले की अपेक्षा अधिक भारी है।

साथ ही इसमें विमान वाहन करने की क्षमता भी ज्यादा है।

हां जहाँ तक इसकी डिजाइन की बात करें तो

इसकी डिजाइन पहले वाले विमान की मूल डिजाइन पर ही आधारित है।

इसमें विमान के उड़न भरने के लिए विशेष स्की जंप पट्टी लगी हैं।

यह नया विमानवाहक युद्ध पोत संचालित होने के लिए,

परमाणु प्रपल्शन तकनीक की बजाय पारंपरिक तकनीक का इस्तेमाल करने वाला है। 

दोनों के बीच का फर्क 

दोनों विमानवाहक युद्ध पोत के बीच फर्क यह है कि,.

पहला विमान प्रशिक्षण पोत की तरह विकसित किया गया था।

जबकि इस नए विमानवाहक युद्ध पोत का विकास अभियान हेतु किया गया है।

इस बेनाम नवीनतम विमानवाहक युद्ध पोत की वजह से,

चीन दुनिया के सर्वश्रेष्ठ नौ सैनिक क्षमताओं वाले देशों की श्रेणी में आ गया है।

सच तो यह है कि चीन इस समय अपनी नौ सेना को पूरी तरह से धार देने में जुटा हुआ है।  

संघाई में चीन के तीसरे विमानवाहक युद्ध पोत के निर्माण से इस बात की पुष्टि होती है।

यह तीसरा विमान वाहक युद्ध पोत परमाणु ऊर्जा द्वारा संचालित होगा।

अनुमान है चीन अपने इस तीसरे विमानवाहक युद्ध पोत को 2030 में शामिल करेगा।

चीन ने AJ-15 नामक नया जेट फाइटर विमान भी तैयार कर लिया है।

ध्यान रखें यह जेट फाइटर उसके विमान वाहक युद्ध पोतों के डेक से संचालित होगा।

भारतीय पक्ष 

चीन के पहले स्वदेशी विमानवाहक युद्ध पोत के संदर्भ में,

यदि भारत के पक्ष की बात करें तो चीन जिस गति से अपनी सैन्य क्षमताओं में इजाफा कर रहा है,

यह भारत के लिए खतरा नहीं बल्कि चिंता की बात जरूर है।

भारत के पास केवल 44 हजार 400 टन वजनी

क्षमता का INS विक्रमादित्य विमानवाहक युद्ध पोत सेवा में है।

भारत ने इसे रूस से 2013 में 2.23 अरब डॉलर में खरीदा था।

इसी तरह 40 हजार टन वजनी स्वदेश निर्मित Ins विक्रांत कोचीन शिपयार्ड में बन रहा है।

इसका परीक्षण अक्टूबर 2020 में तथा पूरी तरह से सेना का अंग यह बनेगा 2023 तक।

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि  हमारी वह योजना अभी तक अधर में लटकी हुई है, 

जिसमें भारत को 65000 टन वजनी अपना तीसरा विमान वाहक युद्ध पोत बनाना है। 

धन्यवाद

KPSINGH 16052018

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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