आंकड़े से दूर फिर भी मिला ताज

आंकड़े से दूर फिर भी          मिला ताज

आंकड़े से दूर फिर भी मिला ताज, दोस्तों यह कोई नई कहानी नहीं है।

ताजा घटना की बात करें तो यह मंगलवार 15 मई 2018 की बात है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम जैसे जैसे आते गए ,

भाजपा एंड कंपनी खुश होती रही तो कांग्रेस और जनता दल एस सुबकती, सिसियाती रहीं।

लेकिन यह क्या शाम हुई तो नजारा कुछ और था।

कुल 224 सीटों में से 222 विधान सभा सीटों पर हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम में,

भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसे कुल 104 सीटों पर जीत हासिल हुई।

इसी तरह कांग्रेस को कुल 78 सीटें मिलीं।

देवगौड़ा के जद एस को कुल 38 सीटें मीलीं, जबकि अन्य के खाते में केवल 2सीट दर्ज की गईं।

इस चुनाव परिणाम का मतलब यह है कि कोई पार्टी अकेले सरकार नहीं बना सकती।

भाजपा खुश थी कि वह सबसे बड़ी पार्टी है, उसे अब सरकार बनाना है।

लेकिन सब कुछ मिट्टी तब हो गया जब केवल 38

सीट जीतकर पहुंचे जदएस ने कर्नाटक में सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया।

कांग्रेस के बिना शर्त समर्थन देने के बाद जद एस सरकार बनाने की हैसियत में आ गई।

सवाल उठता है कि क्या तीसरे नम्बर में रही पार्टी

आंकड़े से दूर होने के बाद भी सरकार बना सकती है?

इसका जवाब है हां जद एस कर्नाटक में अल्पमत के बाद भी ऐसा कर सकती है। 

क्या है इतिहास 

 

 

इतिहास की बात करें तो इतिहास गवाह है कि देश के राजनीतिक इतिहास में,

एक नहीं कई बार ऐसा हुआ है कि आंकड़ों से दूर रहने के बाद भी ताज मिला है।

अगर आप इस बात की सच्चाई जानना चाहते हैं

तो जरा नजर घुमाइए भारत के बिचित्र किंतु सत्य घटनाओं पर कुछ इस तरह :

दिल्ली में केजरीवाल 

आंकड़े से दूर, फिर भी मिला ताज का उल्लेखनीय उदाहरण हैं दिल्ली के वर्तमान सीएम केजरीवाल।

दोस्तों याद कीजिए, 2013 में हुए दिल्ली विधान सभा के उस चुनाव को,

जिसमें केजरीवाल साहब को दिल्ली विधान सभा की  कुल 70 सीटों में से केवल 27 सीटें मिली थीं।

इस चुनाव में भाजपा को 70 में 31 सीटें मिली थीं

लेकिन दिल्ली के तत्कालीन उप राज्यपाल  श्री नजीब जंग की कृपा से,

आंकड़े से दूर रहने के बाद भी केजरी वाल को  ही दिल्ली का ताज मिला था।

दिल्ली के तत्कालीन उप राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया था।

इसके बाद केजरीवाल ने कांग्रेस समर्थन से ताज की प्राप्ति की थी। 

झारखंड में सिबू सोरेन 

आंकड़े से दूर फिर भी मिला ताज के सबसे खास उदाहरण है झारखंड में सिबू सोरेन का।

यह गजब कहानी है 2005 की जब वहाँ राज्य पाल थे सैय्यद सिब्ते रजी।

तब झारखंड की कुल 81 विधानसभा सीटों में

भाजपा को 30 और JMM को केवल 17 सीटें मिली थीं।

तब रजी साहब ने गलत ढंग से सिबू सोरेन को सरकार बनाने के लिए बुलाया था।

सोरेन ने कांग्रेस एंड कंपनी के साथ मिलकर सरकार बनाकर ताज अपने नाम किया था।

यह बात दीगर है कि यह ताज केवल 10 दिनों के लिए था। 

मनोहर पार्रिकर गोवा 

आंकडे से दूर फिर भी मिला ताज, की अगली खास कहानी गोवा की है।

गोवा में भाजपा को 13 तथा कांग्रेस को 17 सीटें मिली थीं। 

2017 में गोवा विधानसभा चुनाव में भाजपा को कांग्रेस से कम सीटें मिली थीं।

इसके बाद राज्य पाल ने दो दिन बाद भाजपा को सरकार बनाने का मौका दिया था।

भाजपा ने केवल 16 घंटे में mgp तथा gpfआदि 

 की बदौलत सरकार बना कर ताज अपने नाम कर लिया था। 

मणिपुर में पहली बार 

मणिपुर में 2017 में भाजपा की पहली बार सरकार बनी थी।

लेकिन मणिपुर विधानसभा चुनाव में भाजपा को जहाँ केवल 21 सीटें मिली थीं,

 वहीं कांग्रेस को 28 सीटों के बाद भी ताज नहीं मिला था।

भाजपा ने तब NPFवNPP के चार चार सदस्यों व

लोजपा के एक सदस्य की बदौलत     ताज    पहना था। 

यूपी में मायावती 

इस कड़ी की अगली अद्भुत कहानी उत्तर प्रदेश में मायावती की है।

1996 में कुल 424 सीटों के चुनाव परिणाम के अनुसार भाजपा को 174 सीटें मिली थीं।

जब कि इस चुनाव के बाद ताज पहनने वाली मायावती की बसपा को केवल 67 सीटें मिली थीं।

तब भाजपा तथा बसपा ने 6/6महीने के लिए समझौता करके सरकार बनाई थी। 

कुछ और कहानियां 

 

कुछ और कहानियों की बात करें तो 1889 में वी पी सिंह का प्रधानमंत्री बनना हो,

 

या फिर 1996 में एच डी देवगोडा का प्रधानमंत्री बनना।

1990 में चन्द्र शेखर और 1997 में आई के गुजराल की भी यही कहानी है। 

 

 

 

 

 

About kpsingh

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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