बिहार पिछड़ा राज्य क्यों है

बिहार पिछड़ा राज्य क्यों है

बिहार पिछड़ा राज्य क्यों है ? दोस्तों,  बिहार का होने के नाते मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ कि मैं अपने राज्य के बारे में विचार करूँ और आपको बताऊँ कि हमारा राज्य  बिहार पिछड़ा राज्य क्यों है |
इस पोस्ट की आवश्यकता क्यों पड़ी ?
मेरा मानना है कि बिहार में विकास की ढेरों संभावनाएं हैं |
देश में जितना विकास हो चुका है उतना बिहार में नहीं हुआ है |
आइये जानने की कोशिश करते हैं कि बिहार पिछड़ा राज्य क्यों है और इसके विकास की क्या संभावनाएं हैं |
बिहार में प्रति व्यक्ति सलाना आय 31000 रू है जो देश की तुलना में बहुत कम है |
पूरे देशवासी को यह विश्लेषण समझना जरूरी है क्योंकि किसी राज्य के पिछड़ेपन का प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है |
जो राज्य विकसित होते हैं वे देश की विकास दर को आगे ले जाते हैं | ठीक इसके विपरीत पिछड़े राज्य देश की विकास दर को पीछे घसीटते हैं |
आज ऐसी स्थिति क्यों बन गई है कि बिहार को हेय दृष्टि से देखा जाता है |
आज उन बिन्दुओं पर चर्चा करेंगे जिसके कारण बिहार पिछड़ा राज्य कहलाता है |

1. भौगोलिक परिस्थितियां –

         
बिहार की भौगोलिक परिस्थितियां ऐसी है कि यह सभी तरफ से अन्य राज्यों से घिरा हुआ है |
नेपाल के अलावा कोई अन्तर्राष्ट्रीय सीमा नहीं मिलती है |
इस कारण बिहार का व्यापार अन्तर्राष्ट्रीय देशों के साथ स्थापित नहीं हो पाया |
यदि कोई देश व्यापार बढ़ाना भी चाहे तो उसका ट्रांसपोर्टेशन चार्ज बढ़ जाता है |
बिहार का एक क्षेत्र ऐसा है जहाँ बाढ़ आ जाती है तो दूसरे क्षेत्र में सूखा पड़ जाता है इसलिए जीवन यापन के लिए लोगों को बाहर जाना पड़ता है |
भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही बिहार पिछड़ा राज्य रह गया |

2. बड़े उद्योग का अभाव –

बिहार में कोई बड़ा उद्योग या कारखाना नहीं है |
एक या दो कम्पनी को छोड़कर कोई बिहार में उद्योग स्थापित नहीं करना चाहता है |
पड़ौसी राज्यों से माल भरकर ट्रक बिहार में आता है लेकिन यहाँ से ट्रक खाली जाता है |
कहने का मतलब है कि बिहार अन्य राज्यों से माल ले तो रहा है पर बदले में कुछ बेच नहीं रहा है |

3. माल भाड़ा पॉलिसी –

ये पॉलिसी 1950 से 1990 तक रही, जब बिहार और झारखंड एक ही थे |
इस पॉलिसी के तहत उस समय कोयला को अन्य औद्योगिक क्षेत्र में ले जाने के लिए सरकार द्वारा सब्सिडी दी जाती थी |
जिससे उद्योगपतियों ने अपने कारखाने अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क स्थल पर स्थापित किये |
जबकि सरकार को ऐसी पॉलिसी बनानी थी कि बिहार में उद्योग स्थापित करने पर इन्सेन्टिव दिया जाता |
जिससे बिहार में रोजगार बढ़ते, शिक्षा और जीवन स्तर में सुधार होता |
झारखंड के अलग होने पर बिहार और लाचार हो गया |

4. कुँए का मेंढ़क जैसी मानसिकता –

बिहार के लोगों की मानसिकता कुँए के मेंढ़क जैसी है |
वे सरकारी नौकरी या सिविल सर्विसेज को ही सब कुछ मानते हैं |
IAS, IPS या सरकारी नौकरी मिल जाने पर समाज में उसे विशेष इज्जत दी जाती है |
सरकारी नौकरी के हिसाब से दहेज की रेट निश्चित कर दी गई है |
बिहार की संस्कृति में, लोगों के खून में ये बात घर कर चुकी है कि सरकारी नौकरी मिलने पर जिन्दगी सुखमय हो जाएगी |
समाज द्वारा युवाओं को यही शिक्षा दी जाती है कि किसी तरह सरकारी नौकरी में घुस जाओ |

5. जातिगत राजनीति –

 
जातिगत राजनीति के कुछ मामूली फायदे होते हैं, परन्तु यदि पूरी राजनीति जातिगत हो जाय तो इसके दुष्परिणाम ज्यादा होते हैं और विकास के मार्ग को अवरूद्ध कर देते हैं |
1991 के बाद जब लिब्रेलाइजेशन आया तो सभी राज्य विदेशी कॉर्पोरेट को आकर्षित कर रहे थे, विदेशी फंड लाने का सोच रहे थे, अपने राज्य में व्यापार बढ़ाने पर जोर दे रहे थे और बिहार उस समय अपनी जाति की राजनीति में ही फँसे रहे |
यहाँ विकास की राजनीति नहीं हुई |
अगर आंकड़ों पर ध्यान दें तो पिछले 70 साल में 40 बार सरकार बदली, 23 अलग अलग मुख्यमंत्री बने |
दो तीन मुख्यमंत्री को छोड़ दें तो किसी भी मुख्यमंत्री को डेढ़ साल से ज्यादा कार्यकाल नहीं मिला |

6. जनसंख्या और साक्षरता दर –

बिहार की जनसंख्या वृद्धि दर और साक्षरता दर में काफी अंतर है |
यहाँ की जनसंख्या तो बढ़ रही है पर शिक्षा का स्तर नहीं बढ़ रहा है |
पूरे देश में अधिक बच्चे जन्म देने वाली माँ बिहार में ही है |
शिक्षा में पिछड़े परिवार की औरतें 5-6 बच्चे जन्म देती है |
शिक्षित परिवारों में यह संख्या घटकर 2-3 हो रही है |
जबकि अन्य राज्यों ऐसे हैं जहाँ एक परिवार में दो से अधिक बच्चे नहीं है |
बिहार में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है और साक्षरता रूकी हुई है |
यहाँ का साक्षरता दर 63% ही है | यह भारत का निम्नतम स्तर है |
बिहार सबसे ज्यादा IAS देने के बावजूद यहाँ का शिक्षा का स्तर सबसे कम है |

7. रोजगार और आय के साधन –

शिक्षा से रोजगार मिलता है रोजगार से इनकम बढ़ती है |
बिहार में शिक्षा का औसत स्तर कम होने से उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है |
एक आँकड़े के अनुसार 1950-51 में बिहार में प्रति व्यक्ति सलाना आय 204 रू था और भारत का 265 रू |
2013-14 तक बिहार 28000 रू पहुँचा और भारत बढ़कर 75000 रू पहुँच गया |
बिहार जिस गति से वृद्धि करता है उसकी तुलना में भारत के शेष राज्य और तेज गति से आगे बढ़ जाते हैं |
बिहार की मूल समस्याओं में शिक्षा का विकास बहुत जरूरी है | समस्याएं हैं तो संभावनाएं भी अन्य राज्यों से बेहतर बिहार में ही है |
केवल सोच बदलने की जरूरत है | बिहार से कई सफल व्यापारी भी निकले हैं | जरूरत है बिहार को ऐसे व्यापारियों की जो बिहार में रोजगार के अवसर पैदा करे |
बिहार में सबसे ज्यादा युवाशक्ति है, कठोर परिश्रम करने में बिहार का नाम सबसे आगे आता है, बिहार में सबसे ज्यादा अवसर और संभावनाएं है | जो बिहार 1980 तक पंजाब से आगे हुआ करता धा, आज पंजाब बिहार से तीन गुना आगे हो चुका है |
मेरा सभी युवाओं को केवल एक ही सुझाव है कि वे अपनी सरकारी नौकरी वाली मानसिकता से बाहर निकलें क्योंकि सरकारी नौकरी की चाह में जीवन के अनमोल और उर्जावान समय नष्ट हो जाता है | बिहार के व्यापारी वर्ग जिनका व्यापार अन्य राज्यों या विदेशों में फैला है, उनसे निवेदन है कि वे बिहार में भी रोजगार पैदा करें |

आपका साथी —- प्रमोद कुमार

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About PRAMOD KUMAR

मेंने ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन राजस्थान में कम्पलीट किया |इसके बाद B. Ed कर्नाटक से किया | लेखन की चाह बचपन से ही थी, कॉलेज आते आते इसमें कुछ निखार आ गया |कॉलेज में यह स्थिति थी कि यदि कोई निबंध प्रतियोगिता होती और उसमें मेरे शामिल हो जाने से प्रतियोगिता दूसरे और तीसरे स्थान के लिए रह जाता | वापस राजस्थान आने पर अपना विद्यालय खोला ,सरकारी शिक्षक बनकर त्याग पत्र दे दिया |बिजनेस में एक सम्मानित ऊँचाई को पाकर धरातल पर आ गया |अब अपने जन्म स्थल पर कर्म कर रहा हूँ, जहाँ शिक्षा देना प्रमुख कर्म है | बचे समय में लिखने का अपना शौक पुरा करता हूँ |

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