पीलिया (जॉन्डिस) क्या है ? आइए जानें इस बारे में।

पीलिया (जॉन्डिस) क्या है ? आइए जानें इस बारे में।

 

पीलिया (जॉन्डिस) क्या है ? आइए जानें इस बारे में।
जी हाँ दोस्तो आज हम इस रोग के बारे में बात करेेंगे। आखिर यह क्योंं होता है ? लिवर से हम सभी लोग परिचित  हैैंं। इसकी
कोशिकाओंं में पित्त रस(बाइल जूूस) निर्मित होता है,लेकिन इसका भंडारण पित्ताशय (gall bladder) में हो जाता है। जब
भोजन आहार नली से गुजरकर आंत्र संंस्थान (deodenum) में पहुँँचता हैै,तो पित्त भी पित्तााशय से निकलकर आंत्र
संस्थान में जाकर मिक्स हो जाता है और भोजन को सुपाच्य बनाता है,लेेेकिन कभी किसी बीमारी या फिर किसी कारणवश
यह पित्त भोजन केे साथ न मिलकर सीधे रक्त में मिश्रित हो जाता है और रक्त वाहिनियों द्वारा पूरे शरीर में फैल जाता है।
पित्त में बिलिरूबिन नामक एक पदार्थ मौजूूूद होता है,जो हमारी आँँखों की कंजैैैक्टाइवा,स्किन और श्लैैैष्मिक कला में फैल
जाता है और हमारे शरीर की आँँखें, नाखूूून,स्किन आदि सभी पीले दिखाई देनेे लगते हैं। तो दोस्तो चलिए इस रोग के बारे मेंं
और जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं।

 

पीलिया (जॉन्डिस)क्या है ? आइए जानें इस बारे में।

 

पीलिया रोग :-

(1) रक्त मेें जैसे-जैसेे बिलिरूबिन की मात्रा बढ़ती जाती है,किडनी रक्त में मिश्रित इसी बिलिरूबिन को छानने में असमर्थ हो
       जाती है।
(2) यही वजह है कि निकलने वाला पित्त गाढ़ा प्रतीत होता है।
(3) इस रोग की मुख्य पहचान है शरीर का पीला होना।
(4) इस रोग को कई नामों से पुकारा जाता है। हिंदी में पीलिया,अंग्रेेजी मेेंं जॉन्डिस,संस्कृृृत में कामला इत्यादि।

 

पीलिया (जॉन्डिस) क्या है ? आइए जानें इस बारे में।

 

इस रोग की मुख्य वजह :-

(A) रक्त मेें कमी होने के कारण(हीमोलिटिक जॉन्डिस) :-

(1) रक्त मेें उपस्थित लाल रक्त कणिकाओं के नष्ट हो जाने के कारण उत्पन्न होने वाले पीलिया को हीमोलिटिक पीलिया
       कहा जाता है।
(2) हीमोलिटिक पीलिया होने के कई कारण होते हैं जैैसे :- विषाक्त पदार्थोंं का रक्त मेें मिल जाना,दूूूसरे ग्रुप का ब्लड चढ़
       जाना, एनीमिया हो जाना, परजीवी, मलेरिया, कालाजार संक्रमण,जन्मजात रोगों के कारण इत्यादि।
(3) जब रक्त में उपस्थित लाल रक्त कणिकाएँ नष्ट  होने लगती हैैं,तो रक्त मेें उपस्थित हीमोग्लोबिन स्वतंत्र होकर लिवर
       में अधिक मात्रा में बिलिरूबिन का निर्माण करता है।
(4) इसकी अत्यधिक मात्रा होने पर किडनी भी इसका पूर्ण रूप से उत्सर्जन नहीं कर पाती है।
(5) यही कारण है कि रक्त में इसकी मात्रा बढ़ने से पीलिया के लक्षण प्रकट होने लगते हैैं।

लक्षण :-

(1) यूरिन पीले रंग का आना।
(2) रोगी की प्यास बढ़ जाना।
(3) पाचन तंंत्र गड़बड़ा जाना।
(4) कभी-कभी दस्त हो जाना।
(5) मुँह का स्वाद बिगड़ने के साथ-साथ कब्ज हो जाना।
(6) बेचैनी व कमजोरी महसूस होना।
(7) रोगी का पसीना व थूक पीला हो जाना।
(8) सभी वस्तुुएँ पीली दिखना।
(9) सर दर्द, बदन दर्द,थकान,बेचैनी,कमजोरी इत्यादि।

 

पीलिया (जॉन्डिस) क्या है ? आइए जानें इस बारे में।

 

(B) पित्त के भोजन में न पहुँँचने केे कारण (कोलिस्टेटिक जॉन्डिस) :-

(1) हमारे द्वारा अत्यधिक मात्रा में गरिष्ठ भोजन लेने के कारण वसा का पूूूर्ण रूप से अवशोषण नहीं हो पाता।
(2) परिणामत: कौलैस्ट्रौल की मात्रा बढ़ने लगती है और रक्त वाहिनियोंं मेें इनके अत्यधिक मात्रा मेंं मौजूूूद होने की वजह से
       रक्त वाहिनियाँ अवरुद्ध होने लगती हैं।
(3) कोलैस्ट्रौल पित्ताशय में पहले से ही मौजूद रहता है और अधिक मात्रा मेें इसके पहुँँचने पर पित्त मेें गाढ़ापन आ जाता है।
(4) परिणामत: गाढ़ा पित्त पथरी में परिवर्तित हो जाता है।
(5) ऐसी स्थिति में लिवर की कोशिकाएँँ तो सही काम करती हैं,परन्तु पित्ताशय का मुँह आँशिक या पूर्ण रूप से बंद रहने पर
      पित्त ड्यूडेनम तक नहीं पहुुँच पाता और सीधे रक्त में मिलकर इस रोग का रूप ले लेेता हैै।

लक्षण :-

(1) इसे क्ले कलर जॉन्डिस भी कहा जाता है,क्योंंकि बिलिरूबिन पित्ताशय से निकलकर ड्यूडेनम में नहीं पहुँँच पाता और
       स्टूल का रंग सफेेेद,स्लेटी व राख के रंंग जैसा लगता है।
(2) यूरिन,आँखों व स्किन का रंंग पीला हो जाता है।
(3) रोगी को अपच की शिकायत रहती है।
(4)लिवर का आकार बढ़ जाता है।
(5) रात के समय खुजली महसूस होना।

पीलिया (जॉन्डिस) क्या है ? आइए जानें इस बारे में।­

 

(C) लिवर की कोशिकाओं में विकृति के कारण(हिपेेेेटो सैल्यूलर जॉन्डिस) :-

(1) लिवर की कोशिकाओं में क्षति या फिर सूजन आ जाने के कारण बिलिरूबिन पित्त मेंं मिश्रित नहीं हो पाता।
(2) यह सीधे रक्त मेें मिलकर पीलिया रोग को प्रकट करता है।
(3) इस प्रकार के पीलिया रोग के दो प्रमुख कारण हैं –
(a) विषाणु के कारण होने वाला पीलिया :-
(1) विषाणु से होने वाला पीलिया कई प्रकार का होता है जैसे :- हेपेटाइटिस ए,बी,सी,डी,ई, एफ,जी।
(2) ये विषााणु आहार के माध्यम से ड्यूूूूडेनम में पहुँचते हैैंं और वहाँ से रक्त वाहिनियों के द्वारा लिवर मेें पहुँचकर उसे क्षति
       पहुँँचाते हैैं।
(3) इसके अतिरिक्त इन्फैैक्टिड सिरिंंज, संक्रमित ब्लड,संक्रमित व्यक्ति से सेक्स करने पर भी इस रोग का संंक्रमण हो
       सकता है।

लक्षण :-

मंद ज्वर आना,भोजन अरुचिकर लगना,यूरिन गहरेे पीले रंग का आना,लिवर के स्थान पर भारीपन महसूस
होना,त्वचा,आँख व नाखून में पीलापन,वजन कम हो जाना इत्यादि।
(b) विषाक्त पदार्थों सेे होने वाला पीलिया :-
(1) लम्बे समय तक दवाइयों के प्रयोग करने केे कारण लिवर प्रभावित हो जाता है।
(2) लिवर केे ठीक ढंग से कार्य न करने के कारण विषाक्त पदार्थ व बिलिरुबिन रक्त में मिश्रित होकर पीलिया रोग को प्रकट
       करता है।
लेखक
अखिलेश कुुुुमार नागर
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