मानव स्वास्थ्य और रोग

मानव स्वास्थ्य और रोग 

मनुष्य में अक्सर होने वाले रोग :कारण और उनके निवारण नामक यह लेख,

आपको सावधान करना चाहता है तथा यह कहना चाहता है कि,

इस लेख को पढने से भी पहले आपको इस बात

को समझ लेना चाहिए कि दुनिया की किसी भी

दवा से बेहतरीन कोई दवा नहीं बल्कि बीमारी से दूर रहकर खुद को उससे बचाना होता है।

यानी दुनिया के किसी भी इलाज से बेहतर उसका बचाव होता है।

फिर भी सच्चाई यह है कि मनुष्य को नाना प्रकार की व्याधियों से अक्सर दो चार होना पड़ता है।

आज यहां पर आपको  कुछ ऐसे ही रोगों से उनके

कारण,और उनके निवारण  सहित परिचय कराया जाएगा।

तो आइए  अपने लेख के माध्यम से  हम आजकुछ बीमारियों की पहचान करें। 

मानव स्वास्थ्य क्या है 

आपको  आश्चर्य  होगा, स्वास्थ्य क्या है?  इसकी कोई परिभाषा नहीं होती।

हम स्वास्थ्य की परिभाषा को बीमारी से जोड़कर ही दे सकते हैं।

यानी जब शरीर में कोई बीमारी न हो वही स्वास्थ है।

उम्र के अनुसार शारी, मानसिक विकास हो यही अच्छे स्वास्थ्य के लक्षण हैं।

जहां तक एक सर्व मान्य परिभाषा की बात है तो,

“मनुष्य का शारी, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक

रूप से स्वस्थ रहना ही मानव स्वास्थ्य कहलाता है।”

यदि व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ न रहे तो

वहविभिन्न प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हो सकता है।

अच्छा स्वास्थ्य मनुष्य में कार्य करने की क्षमता में वृद्धि लाता है।

मनुष्य को अपने को स्वस्थ बनाए रखने के लिए निरंतर व्यायाम,

अपने आसपास के परिवेश की सफाई, रोगों के प्रति जागरूकता,

संतुलित एवं पौष्टिक खाद्य पदार्थों का उपयोग आदि पर ध्यान जरूर देना चाहिए।

एक  स्वस्थ व्यक्ति ही देश के नव निर्माण में अपना बेहतरीन योगदान दे सकता है।

इतना ही नहीं यह भी हमें ध्यान रखना चाहिए कि एक स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का वास होता है। 

आइए जानें रोग क्या होता है 

रोग या बीमारी मानव शरीर की ऐसी अवस्था है

जो शरीर की कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करती है।

रोग मुख्य रूप से जीवाणु, कवक, विषाणु और प्रोटोजोआ के संक्रमण से होता है।

मानव शरीर तभी रोगग्रस्त होता है जब व्यक्ति

अपने आसपास के परिवेश की साफ सफाई से अनजान रहता है।

हमारा मानव शरीर जैविक, रासायनिक, भौतिक,

आनुवांशिक तथा सामाजिक कारकों से रोग ग्रस्त होता है। 

संक्रामक रोग किसे कहते हैं 

एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलने वाले रोग को संक्रामक रोग कहते हैं।

यह रोग हानिकारक सूक्ष्म जीवों यथा जीवाणु विषाणु कवक एवं प्रोटोजोआ द्वारा होता है।

ये सूक्ष्म जीव हवा, जल, भोजन एवं मिट्टी के द्वारा

एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर रोग फैलाते हैं।

हेपटाइटिस, बर्ड फ्लू, एड्स, स्पाइन फ्लू तथा पीत ज्वर विषाणु जनित संक्रामक रोग हैं।

हैजा एवं टाईफाइड जीवाणु जनित संक्रामक रोग हैं।

निद्रा रोग, पेचिश तथा पायरिया प्रोटोजोआ द्वारा होने वाले रोग हैं।

यह रोग शैवाल गोल कृमि जैसे निमोटोड तथा मच्छर एवं मधुमक्खी द्वारा भी हो सकते हैं।

इस रोग का प्रचार प्रसार बहुत ही शीघ्र होता है।

कभी-कभी संक्रामक रोग तो महामारी का भी रूप धारण कर लेते हैं।

सजगता एवं सक्रियता ही इन रोगों से बचाव का सबसे बेहतर तरीका होता है। 

मलेरिया

मलेरिया एक संक्रामक रोग है जो प्लाज्मोडियम नामक प्रोटोजोआ द्वारा उत्पन्न होता है।

यह बीमारी मादा एनाफिलीज नामक मच्छर के काटने से होती है।

यह व्याधि मुख्य रूप से वृक्क को प्रभावित करती है।

मलेरिया की पहचान मानव शरीर में निम्नलिखित लक्षणों द्वारा की जाती है।

🔴शरीर में तेज ज्वर तथा कपकपी का होना। 🔴तेजी से सिरदर्द होना जी मिचलाना तेजी से पसीना आना।

🔴शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं का कम हो जाना।

🔴कमजोरी महसूस होना।

🔴मांसपेशियों में दर्द होना।

🔴मलेरिया के उपचार के लिए क्लोरोक्वीन,

पेलुडरीन, प्रीभाक्वीन नामक दवाओं का उपयोग किया जाता है। 

वर्णांधता 

यह एक आनुवांशिक नेत्र रोग है यानी यह एक

ऐसा रोग है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक में स्थानांतरित हो जाता है।

इस रोग के कारण रोगी में मुख्य रूप से प्राथमिक

रंगों  यानी  लाल हरा  नीला रंग को पहचानने की क्षमता नहीं होती। 

चिकित्सा विज्ञान में वर्णांधता का कोई उपचार नहीं होता।

वर्णांधता की खोज सबसे पहले  ब्रिटिश रसायनज्ञ

जान डाल्टन ने 1798 में की थी। वह स्वयं इस रोग से पीड़ित थे।

यह बीमारी मुख्य रूप से पुरुषों में ही पाई जाती हैै जिसकी वाहक स्त्री होती है।

स्त्रियों में यह रोग तभी उत्पन्न होता है जब इसके दोनों गुण सूत्र यानी XX प्रभावित हों।

इस बीमारी की खोज डाल्टन द्वारा किए जाने के कारण इसे डाल्टोनिज्म भी कहते हैं। 

रिकेट्स यानी सूखा रोग 

रिकेट्स यानी सूखा रोग मुख्य रूप से बच्चों से संबंधित रोग है।

यह बीमारी विटामिन डी या फिर कैल्सियम की कमी के कारण पैदा होती है।

🔴इस रोग के लक्षणों में बच्चों की हड्डियां

कमजोर होना और उनके पैरों में टेढ़ा पन आ जाना।

🔴वक्ष कबूतर की छाती जैसा हो जाना।

🔴दांतों की बाहरी चमकीली परत का नष्ट हो जाना।

🔴हड्डियों तथा दांतों में दर्द होना।

🔴इस रोग के उपचार हेतु कैल्सियम फास्फेट

तथा विटामिन डी से संबंधित खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

साथ ही साथ रिकेट्स रोग के उपचार हेतु बच्चों के शरीर में मछली के तेल की मालिश करनी चाहिए। 

 

धन्यवाद

KPSINGH 07072018

 

 

 


 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

View all posts by KPSINGH →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *