प्रथम विश्व युद्ध के क्या कारण थे?

प्रथम विश्व युद्ध के क्या कारण थे? 

प्रथम विश्व युद्ध के क्या कारण थे?

दोस्तों यह एक ऐसा सवाल है जो आज तक करोड़ों बार पूरी दुनिया के

लोगों की जबान पर आ चुका है। 

मगर ताज्जुब यह है कि आज तक इसका उत्तर पूरा नहीं हुआ।

प्रथम विश्व युद्ध के क्या कारण थे?

यह सवाल जैसे ही किसी की जबान से निकलता है उत्तर देने वाला

बस उत्तर देता ही चला जाता है ।

एक नहीँ अनेकों अनेक कारण अब तक बताए गए हैं। फिर भी

आज मैं आपको इसके असली सवाल और असली जवाब की तरफ ले जाना चाहता हूं।

कि प्रथम विश्व युद्ध के क्या कारण थे?? 

वास्तव में प्रथम विश्व युद्ध के क्या कारण थे यही बताने के लिए आज मैं आप से मुखातिब हूं 

प्रथम विश्व युद्ध 

प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 के बीच हुआ था।

प्रथम विश्व युद्ध के क्या कारण थे इसके जवाब को हम एक नहीँ दो भागों में बांट सकते हैं । 

पहले भाग में मूलभूत कारणों को रखेंगे तथा

दूसरे भाग में तात्कालिक कारणों को रख सकते हैं।

जहां तक इसके मूलभूत कारणों की बात है वह इस प्रकार हैं :

कूटनीतिक कारण

प्रथम विश्व युद्ध के क्या कारण थे?

इसके जवाब में हम कूटनीति कारणों की चर्चा कर सकते हैं, जो इस प्रकार हैं :

🔴प्रथम विश्व युद्ध से पहले का इतिहास गुप्त संधियों तथा उनके माध्यम से

गठित होने वाले राजनीतिक सैनिक गुटों के निर्माण का इतिहास था ।

इस कूटनीति के जन्म दाता जर्मनी के चांसलर बिस्मार्क थे ।

फ्रैंको प्रशा युद्ध के द्वारा जर्मनी का एकीकरण करने के बाद

बिस्मार्क को इस बात का डर था कि फ्रास अन्य राज्यों की सहायता लेकर

प्रतीशोध युद्ध आरंभ कर सकता है  फ्रांस को अलग थलग करने के लिए

उसने गुप्त संधियों के माध्यम से गुटों के निर्माण की नीति का पालन किया।

द्वैध संधि के माध्यम से उसने आस्ट्रिया, हंगरी को अपने साथ जोड़ा।

तथा आगे चलकर इटली को भी साथ लेकर एक त्रिगुट का निर्माण किया।

संधि के माध्यम से उसने रूस को भी अपने साथ बनाए रखा। 

बिस्मार्क की इन चालों को चौपट करने के लिए फ्रांस भी प्रयास कर रहा था।

अंततः उसने रूस को फिर उसके बाद ब्रिटेन को अपने

साथ लाने में सफल रहा ।

 इस तरह एक त्रिगुट जर्मनी , हंगरीआस्ट्रिया, इटली का

था तो दूसरा त्रिगुट रूस ब्रिटेन फ्रांस का था ।

इस तरह यूरोप की छ शक्तियां दो गुटों में बंट गईं।

यह दोनों गुट एक दूसरे को अविश्वास तथा संदेह से

देखते थे । 

प्रथम विश्व युद्ध के क्या कारण थे?

इस बात का विश्लेषण करने वाले इतिहास कार

SB fay लिखते हैं कि,

“गुप्त संधियों की व्यवस्था ने इसे अपरिहार्य बना दिया था कि

यदि युद्ध होता है तो उसमें यूरोप की सभी

महाशक्तियों की भागेदारी होगी।

क्योंकि सभी ने खुद को इस मजबूरी से बांध दिया है। “

उनकी बात तब सही साबित हुई जब आस्ट्रिया हंगरी

विवाद स्थानीय न रहकर वैश्विक बन गया । 

अंध राष्ट्वाद

19 शताब्दी यूरोपीय इतिहास में राष्ट्रवद के विविजय की शताब्दी है।

जर्मनी तथा इटली का एकीकरण राष्ट्रवाद की महान उपलब्धियों में थी।

किन्तु 19 वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में यह राष्ट्रवाद  विकृत होकर उग्र अंधराष्ट्रवाद में बदल गया था ।

नवोदित राष्ट्र राज्य इटली तथा जर्मनी राष्ट्रीय एकता के लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद भी संतृप्त नहीं थे।

वह दोनों अपने को विश्व का महान राष्ट्र के रूप में स्थापित करना चाहते थे ।

लेकिन जरा सोचिए ऐसा तभी हो सकता था

जब वह अपने राज्य का विस्तार करें और दूसरों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करें।

अतीत के महान रोमन साम्राज्य की यादें इठली के जेहन में रची बसी थीं।

इटली के राष्ट्रवादी उन क्षेत्रों को जो इटालियन थे

लेकिन आज  उन पर दूसरों का अधिकार था उन्हें मुक्त कराना चाहते थे।

बाल्कन प्रायद्वीप का नवोदित राष्ट्र सर्विया अपनी वर्तमान सीमाओं से संतुष्ट नहीं था।

वह वृहत्तर सर्बिया का सपना देख रहा था।

जर्मनी भी अब बिस्मार्क युग का संतृप्त राज्य नहीं था।

कैसर विलियम 2 की राजनीति अब विश्व राजनीति थी।

जर्मनी के उग्र राष्ट्रवादियों के ऊपर त्रितस्के की शिक्षाओं का प्रभाव था।

त्रितस्के ने कहा था,

“जर्मन चरित्र  जर्मन मस्तिष्क तथा जर्मन संस्कृति के

पूर्व वर्चस्व में ही विश्व कल्याण और महानता को प्राप्त किया जा सकता है।” 

इतिहासकार हेज के शब्दों में,

“राष्ट्रवादियों की उपस्थिति अपनी तीव्रता के साथ हर जगह थी

और सरकारों को तर्क की बजाय कुतर्क की घुट्टी पिला रहे थे  “

इसी उग्र अंधराष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय हितों के टकराव को जन्म दिया था ।

यही टकराव राष्ट्रों के मध्य झगड़े का कारण बना। 

साम्राज्यवाद का विस्तार 

19 वीं शताब्दी का अंतिम चतुर्थांस साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा का दौर था।

इस दौर में उपनिवेशों पर कब्जा करके राज्य विस्तार की अंधी दौड़ चल रही थी।

जर्मनी इटली जापान जैसे नवोदित औद्योगिक राज्यों को ऐसे प्रदेशों की जरूरत थी

जहां सस्ता श्रम कच्चा माल तथा जरूरी बाजार मिल सके।

यानी जहां सुरक्षित निवेश किया जा सके  और जहां अपने अपने देशों की

बढती जनसंख्या को बसाया जा सके।

यह अंधी दौड़ कितनी मरभुखी थी कि  इसका अंजाजा

इसी  बात से लगाया जा सकता है कि

केवल 25 सालों में लोलुप यूरोपीय देशों ने अफ्रीका महाद्वीप तक में कब्जा जमा लिया था।

इसके बाद अफ्रीका के राज्यों के बंटवारे में

इन सभी में आपसी वैमनस्य पैदा हो गया जो अंततः प्रथम विश्व युद्ध का कारण बना । 

हथियारों की दौड़ 

1870-71 के फ्रेंको-प्रशा युद्ध के बाद यूरोप के सभी प्रमुख राज्य

अपनी सैन्य शक्ति का विस्तार करने की जरूरत महसूस कर रहे थे।

क्योंकि अधिकांश राष्ट्र अपने पड़ोसी राष्ट्र से भी भय खाते थे।

अपने पड़सी तक को आशंका और भय से देख रहे थे। इतिहास कार हेज के अनुसार ग्रेट ब्रिटेन तथा जर्मनी के मध्य

नौ सेना के क्षेत्र में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा थी ।

इसको रोकने के लिए इन दोनों राष्ट्रों के प्रयास  बेहद कम थे। 

इतिहास कार हेज के अनुसार

इसे विडंबना ही कहेंगे कि बावजूद इसके किसी राज्य में सुरक्षा की भावना नहीं थी।

सभी सभी से डरे थे।

इस तरह हथियारों की अंधी दौड़ ने पूरी दुनिया को गिरफ्त में ले लिया ।। 

संवेदनशील तनाव क्षेत्र 

 

20 वीं सदी में यूरोप में कुछ ऐसे भी क्षेत्र थे जो बेहद तनावपूर्ण और संवेदनशील थे।

यह इतना संवेदनशील थे कि इन क्षेत्रों में कभी भी युद्ध भड़क सकता था ।

फ्रांस  अल्लास लारेन को जिस पर जर्मनी का कब्जा था वापस पाने के लिए बेचैन था ।

यही हाल इटली का था।

टीस्ट तथा आस्ट्रिया के आधिपत्य वाले क्षेत्रों में वह भी कब्जा करने के लिए बेचैन था ।

जर्मनी के पूर्व की तरफ बढने को ब्रिटेन अपने लिए खतरा मानता था।

इसी तरह बाल्कन प्रायद्वीप में रूस एवं आस्ट्रिया के स्वार्थ भड़क रहे थे।

यह जहां और जितने भी टकराव थे वह किसी न किसी की मान प्रतिष्ठा को नेस्तनाबूद करने वाले थे। 

इतिहास कार हेज के अनुसार 1913 के अंत तक आस्ट्रिया हंगरी कृत संकल्प था कि

वह किसी भी कूटनीति प्रतिबंध तथा सैन्य धमकी के सामने नहीं झुकेगा ।

यही हाल रूस और जर्मनी, फ्रांस का भी था। 

प्रथम विश्व युद्ध के तात्कालिक कारण 

सच कहें तो पूरा यूरोप 1913 में एक दूसरे से भरा बैठा था।

जरा सा बस एकमात्र बहाने की जरूरत थी कि पूरा यूरोप जूझने को तैयार था।

इसे संयोग कहें या विडंबना कि आखिरकार यह बहाना 28 जून 1914 को मिल ही गया ।

आस्ट्रिया के ड्यूक फर्डिनेंड तथा उसकी पत्नी की हत्या कर दी गई।

इस हत्याकांड को प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण कहा जाता है ।

हत्या करने वाले ब्लैक हैंड नामक आतंकी गुट के सदस्य थे।

हत्यारा एक सर्ब था जिससे आस्ट्रिया ने आरोप लगाया कि हत्या में सर्बिया की सरकार का हांथ है।

आस्ट्रिया ने सर्बिया को अल्टीमेटम दे दिया।

रूस के साथ के कारण सर्बिया ने आस्ट्रिया को ठेंगा दिखा दिया।

परिणामस्वरूप 28/ 07/1914 को आस्ट्रिया ने सर्बिया के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी । 

फिर क्या था

मात्र कुछ ही घंटों में यूरोपीय हस्तियां  एक दूसरे के सामने थीं । 

अगर हम प्रथम विश्व युद्ध के लिए जिम्मेदार राष्ट्र की विवेचना करें

तो प्रथम विश्व युद्ध के विजेता पक्ष अर्थात फ्रांस इंग्लैंड रूस आदि ने

पराजित जर्मनी को इसका उत्तर दायी माना था।

इसीलिए युद्ध के बाद हुई वार्साय की संधि में इसे शामिल करके

उसे अपने अपराध को मानने के लिए विवश किया गया। 

देखा जाए तो यह सरासर गलत था।

हकीकत यह थी कि युद्ध के पहले जर्मनी की यही कोशिश थी कि आस्ट्रिया किसी तरह समझौता कर ले।

लेकिन रूस  सर्बिया को लगातार भड़काता रहा और युद्ध को अनिवार्य बनाता रहा।

रूस लामबंदी न करता तो जर्मनी कभी मैदान में न कूदता।

बावजूद इसके इसका मतलब यह नहीं है कि आप बाकी देशों को दूध का धुला मान लें।

असली कारण यदि रूस था तो बाकी देश भी रूस की तुलना में कुछ कम जिम्मेदार नहीं थे।

इस कहानी से आप खुद समझ सकते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध के क्या कारण थे?

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 04082018

 

 

 

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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5 Comments on “प्रथम विश्व युद्ध के क्या कारण थे?”

  1. પ્રથમ વિશ્વ યુધ્ધ કા કારણ અનેં પરીણામો

    1. यह आप बता दें तो पाठकों का भी भला हो
      मुझे सिर्फ कारण ही लिखने थे लेख के अनुसार वैसे तकनीक तो नहीं पर तरकीब का ज्यादा इस्तेमाल हुआ था।

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