घूस को मारो घूंसा लेकिन हवा में

घूस को मारो घूंसा लेकिन हवा में 

घूस को मारो घूंसा  लेकिन हवा में 

वर्ना कहीं ऐसा न हो कि घूस को घूंसा लग जाए और फिर वह डर कर भाग जाए।

दोस्तों नमस्कार,

आज अपनी पोस्ट को आगे बढाने के पहले मैं आपको

एक बात अपने व्यक्तिगत जीवन की बताना चाहता हूं।

काफी समय पहले “अनुराग “फिल्म देखने का अवसर मिला था दूरदर्शन चैनल पर।

उसमें सम्भवतः विनोद मेहरा, मौसमी चटर्जी और अशोक कुमार थे।

फिल्म की कहानी बड़ी ही इंट्रेस्टिंग है।

नायक का पिता दहेज के खिलाफ लड़ाई लडने का पर्याय है।

यानी आम जनता उसे दहेज विरोधी देवता समान इंसान मानती है।

नायक भी किसी गरीब से प्यार करता है  ।

चूंकि नायक के पिता जी गरीबों के लिए देवता समान हैं

इसलिए नायक बिना डर के  अपने पिता से एक ही सांस में यह बता देता है

कि वह फलां गरीब लडकी से शादी करना चाहता है।

नायक के पिता ने कहा ऐसा कतई नहीं हो सकता।

आखिर हमारा भी कुछ स्टेट्स है।

उनके पास हमारी हैसियत के हिसाब से क्या है देने के लिए?

नायक को  घोर आश्चर्य होता है ।

उसे लगता था कि मेरे पिता जी दहेज विरोधी हैं, इस लिए दहेज की तो बात ही नहीं करेंगे।

पर यहां सब उल्टा था।

नायक के पिता अपनी हर सार्वजनिक सभा में दहेज विरोधी भाषण देते थे।

इसी बात को जब नायक ने अपने पिता से कहा तो उसने अपनी असलियत

कुछ इस तरह बताई,,,

बेटा वह मंच से भाषण देना अलग बात है और असली जिंदगी में

दहेज लेकर शादी करना अलग बात है ।

सार्वजनिक भाषण में हम जरूर दहेज के विरोधी हैं

लेकिन असली व्यक्तिगत जीवन में बिना दहेज के शादी नहीं कर सकते….।

 

दोस्तों,, आज मुझे इस पोस्ट को लिखते वक्त वही फिल्म वाली कहानीबार बार याद आ रही है ।

मुझे लगता है समाज में आज भी वही कहानी चल रही है । 

क्योंकि हम सार्वजनिक मंच से घूस खोरी और भष्टाचार विरोधी

तमाम तरह की बातें तो करते हैं लेकिन असलियत यही है कि हम

घूस को घूंसा मारते वक्त इसी बात का ख्याल रखते हैं कि

यह घूंसा हवा में ही मारें।

अगर हम घूस को मारने वाला घूंसा हवा में न मारते तो

तस्वीर कुछ जरूर अलग होती। 

घूस वाले घूंसा की हकीकत 

घूस को मारो घूंसा लेकिन हवा में।

दोस्तों, अगर हमारे घूस वाले घूंसा की हकीकत फिल्म वाली हकीकत न होती, 

तो जरूर हमारे इतने सारे घूस के खिलाफ इंतजाम कुछ अलग ही तस्वीर पेश करते। 

इतना ही नहीं एक दिन घूंसा खा खा कर अब तक घूस पस्त हो चुकी होती।

और हमारे आपके जीवन में घूस का नामोनिशान तक नहीं होता। 

जबकि सच्चाई यह है कि आज हम मरे हुए अपने किसी परिजन की हड्डियां भी लेने

किसी कार्यालय में जाते हैं तो हम बिना घूस के मरे हुए आदमी की हम हड्डियां तक

आसानी से हासिल नहीं कर पाते ।

हमारे समाज की वर्तमान सच्चाई यह है कि हमें अपना ही पैसा यदि, 

अपने ही फंड से निकालना होता है तो विभाग के भृष्ट बाबू को पहले

घूस की किस्त देनी पडती है ।

इसके बाद ही हमारा अपना पैसा हमारे हाथ में आता है।

हमारा अपना ही एरियर जब हम भुगतान कराने अपने ही विभाग के कार्यालय जाते हैं

तो बिना कमीशन उसे पाने की कल्पना तक नहीं करते।

हमारे समाज में घूस विरोधी घूंसा की हकीकत यह है कि जब

हमें किसी बीमारी की हालत में अवकाश चाहिए

तो मेडिकल लीव बिना घूस के मिलना ही असम्भव होती हैं ।

घूस के घूंसा की   हकीकत 

ऐसा नहीं है कि हम घूस को घूंसा नहीं मारते।

  हम सचमुच बड़ी जोर से घूस को घूंसा मारते हैं लेकिन वह हवा में मारते हैं।

अगर यही सच न होता तो घूस के घूंसा की हकीकत यह न होती

जो रिकॉर्ड कुछ ऐसी बयानबाजी हरगिज न करते।

लंदन की प्रतिष्ठित कंपनी अन्सर्ट एंड यंग के ग्लोबल फ्राड सर्वे 2018 के तहत

55 देशों की कई कंपनियों में घूसखोरी और भष्टाचार की रीतियों का अध्ययन किया गया है ।

भाईयो, बहनों इसमें भारत से 50 कंपनियां शामिल हुईं।

जिनमें से 20 ने यह स्वीकार किया कि भारतीय व्यापार में

बहुत बडे स्तर पर रिश्वतखोरी और भष्टाचार होता है :

🔴इस सर्वे में शामिल होने वाली भारतीय कंपनियों में

सात कंपनियां 1स5 अरब डालर मुनाफा कमाती हैं ।

🔴18 कंपनियां 50 से 99.9 करोड़ डॉलर कमाती हैं।

और इनमें से 16 कंपनियों की आय 10 से 49.9 करोड़ डॉलर है।

9 कंपनियां ऐसी भी हैं जिनका मुनाफा 9.9 करोड़ से कम है।

रिश्वत की साफ  सफाई 

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि इस रिश्वत के लेन देन के बारे में

भारतीय लोग सफाई अधिक देने लगे हैं।

पांच में से एक भारतीय व्यक्ति का कहना है कि नकद में रिश्वत देना सही होता है। 

-जबकि 6में से 1 ने कहा कि कान्ट्रैक्ट जीतने के लिए रिश्वत राम बाण नुस्खा है ।

44%भारतीय मानते हैं कि व्यापार को बिना भय और बाधा के चलाने के लिए

नकद राशि देना, मनोरंजन करना, तोहफे देना या

कंपनी की वित्तीय स्थिति के बारे में गलत जानकारी देना सामान्य बात है।

12% भारतीय यह मानते हैं कि उनकी कंपनी ने बीते दो वर्षों में बड़ घपला हुआ है।

ग्लोबल रिइंफोर्समेंट एजेंसी और नियामक

संस्थाओं ने उनसे एक साल में 11 अरब डॉलर से

भी अधिक का धन वसूला जा चुका है। 

एशिया प्रशांत में सर्वाधिक घूस अपने यहां 

घूस के घूंसा की हकीकत यह है कि पूरे एशिया प्रशांत क्षेत्र में

अपने यहां सबसे ज्यादा घूस को घूंसा मारा जाता है लेकिन हवा में।

इसका प्रमाण यह है कि अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संस्था

इंटर पेरंसी इंटरनेशनल की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक

एशिया प्रशांत क्षेत्र में 16 देशों में रिश्वत देने के मामले में भारत सबसे आगे है।

यहां घूसखोरी की दर 69 %है यानी 10 में से लगभग 7 भारतीय, 

शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के लिए घूस देते हैं। 

इससे तो यही सिद्ध होता है कि हम भारतीय

घूस को घूंसा  तो मारते हैं लेकिन हवा में। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 09082018

 

 

 

 

About kpsingh

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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2 Comments on “घूस को मारो घूंसा लेकिन हवा में”

  1. बहुत अच्छी पोस्ट आप ने लिखा सर आप का बहुत बहुत धन्यवाद

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