रक्षाबंधन क्या गुलामी का प्रतीक है?

रक्षाबंधन क्या गुलामी का प्रतीक है? 

रक्षाबंधन क्या गुलामी का प्रतीक है?

दोस्तों, आप लोग हैरान और परेशान मत होइएगा इस सवाल को पढ़ कर ।

यह सवाल मेरा नहीं है और न ही मैं इस सवाल का समर्थन करता हूं।

दोस्तों,  रक्षाबंधन क्या गुलामी का प्रतीक है ?

यह किसी और का सवाल है जिसे मैं यहां केवल इस लिए उल्लेख कर रहा हूं

या उल्लेख करना चाहता हूं ताकि आप भी सोचे समझें और महसूस करें कि

दिमाग में अगर केवल भूसा भरा हो तो जबान सदैव कुतर्क करती रहती है।

उसमें भी ताज्जुब यह है कि कुतर्क में माहिर इस बात

को सुनना ही नहीं चाहता कि उसके कुतर्क घटिया और व्यर्थ हैं।

दोस्तों रक्षाबंधन क्या गुलामी का नाम है?

आज मेरी पोस्ट का शीर्षक क्यों है पहले मैं आपको इसी संबंध में कुछ बताना चाहता हूं। 

फेसबुक की वह पोस्ट 

आज फेसबुक में मैने किसी की बहुत ही अलग किस्म की पोस्ट पढी रक्षाबंधन के संबंध में।

मैने पढा किसी महिला ने अपनी दो बच्चियों को ही आपस में राखी बांधने को कहा ।

इसमें कोई विचित्र बात नहीं थी  अक्सर ऐसा होता है कि बेटी ही पिता को राखी बांध देती हैं।

अथवा सामान्य जीवन में ऐसा भी देखा गया है कि बहनें अक्सर अपने भाई के साथ साथ भौजाई के भी राखी बांध देती हैं।

यहां तक तो सब सही था उस पोस्ट में लेकिन मुझे दिक्कत तब महसूस हुई

जब मैने पाठकों के कमेन्ट और पोस्ट लेखिका के प्रति उत्तर देखे।

एक सज्जन ने लिखा आपने मिसाल आखिर आज कायम कर ही दिया।

आपको सैल्यूट जो आपने पुरुषवादी सोच को चुनौती दी आखिर बहन ही भाई को राखी क्यों बांधे।

भाई क्यों नहीं बांधता अपनी बहन को राखी?

सच कहता हूँ इसी तरह के विचित्र कमेंट और फिर उससे भी बिचित्र

प्रति उत्तर पढ कर नकली बौद्धिकता पर बेहद अफसोस हुआ। 

मुझे भी कुछ कहना  है 

रक्षाबंधन क्या गुलामी का प्रतीक है ?

इस सवाल के जवाब तलाशने के क्रम में मैं अपने कुछ विचार रखूं उससे भी पहले मुझे कुछ कहना है।

कहना है यानी एक कहानी सुनिए मुझे इतना विश्वास है कि शायद आपको

यह भी समझ में आ जाएगा कि आखिर मुझे कहना क्या है।

दोस्तों बात उस समय की है जब मैं इलाहाबाद विश्व विद्यालय में पढाई कर रहा था

तभी मुझे एक बार कुछ प्रगतिशील लोगों के साथ बहस का अवसर मिला।

बहस का विषय था कि यदि हमें ब्राह्मण वाद मिटाना है तो जरूरी नहीं कि हम पूजा पाठ

या सत्यनारायण व्रत  कथा केवल पंडित जी से ही कराएं।

हम यह सब किसी अन्य जाति के व्यक्ति से भी करा सकते हैं।

सबने कहा उत्तम विचार।

मुझसे रहा न गया मैने कहा तुम सब पर है धिक्कार ।। लोगों ने कहा क्यों भाई धिक्कार क्यों है?

मैने कहा अरे भाईयो जब आपको बाहमण वाद को मिटाना ही है तो फिर सत्य नारायण व्रत कथा ही क्यों पढना चाहिए।

किसी दूसरी  जााति का आदमी भी तो वही ढोंग कराएगा।

सच तो यही है कि केवल वक्ता बदलने से ब्राह्मण वाद खत्म होने वाला नहीं है।

जब तक यह सत्य नारायण व्रत कथा ही खत्म नहीं होती तब तक

ब्राह्मण वाद ज्यों का त्यों बना ही रहेगा।

अब आइए असली मुद्दे पर 

दोस्तों,  विचारणीय प्रश्न यह है कि बहन अगर अपने भाई को राखी बांधती है तो क्या

यह इस बात का प्रतीक है कि बहन भाई की गुलामी कर रही है?

मुझे तो लगता है कि पहली बात तो यह कोई गुलामी नहीं है, यह सच में आपसी प्रेम का प्रतीक है ।

लेकिन अगर राखी बांधना गुलामी है तो फिर चाहे बहन भाई को बांधे या

बहन बहन को बांधे दोनों ही राखी के धागों की गुलामी का प्रतीक है।

तब तो किसी खास दिन बहन द्वारा बहन को धागा बांधना भी एक परम्परा की गुलामी का प्रतीक है।

मेरा तो यहां तक कहना है कि यदि आप इसे गुलामी का प्रतीक ही मानने पर उतारू हैं

तो फिर यह राखी ही गुलामी का प्रतीक हुई ।।

और आप यदि इस गुलामी के प्रतीक को ही खत्म करना चाहते हैं तो

आपको इस राखी को ही खत्म करना होगा। 

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 26082018

 

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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