क्या दलितों में भी जातिवाद है?

क्या दलितों में भी  जातिवाद है? 

क्या दलितों में भी जातिवाद है?

इस सवाल का जवाब आपको जरूर मिलेगा लेकिन इसके पहले

आपको भारत में जाति की असलियत को समझने की कोशिश करनी होगी।

क्योंकि हकीकत कुछ और है हकीकत समझी कुछ और ही जाती है ।

भारत ही नहीं संसार में जब भी बात जातिवाद की होती है

तो पूरी दुनिया भारत की ओर देखती है

और जातिवाद की बात जब भारत में चलती है तो सबसे पहले लोगों सवर्णों और उनके द्वारा

तथाकथित सताए जनों के रूप में दलितों की ओर देखा जाता है।

सवाल उठता है कि क्या यही जातिवाद है?

अर्थात क्या एक तथाकथित सवर्ण द्वारा तथाकथित

दलित व्यक्ति के साथ किया जाने वाला अमानवीय व्यवहार ही जातिवाद है?

डंके की चोट के साथ मेरा जवाब है नहीं।

एक सवर्ण द्वारा तथाकथित दलित के साथ किया जाने

वाला गैर बराबरी का व्यवहार ही जाति वाद नहीं है

बल्कि हकीकत में जातिवाद कुछ और ही है।

जातिवादी कौन? 

क्या दलितों में भी जातिवाद है?

इसी सवाल के संदर्भ मे यह भी पूछने का मन करता है कि

फिर क्या है जातिवाद?

असलियत में जातिवाद वह मानसिकता है या वह मानसिक बीमारी है

जो एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की तुलना में बेहतर या कमतर आंकती है,

और ताज्जुब यह है कि ऐसा हिन्दुस्तान का प्रत्येक बच्चा बच्चा करता है।

यह निहायत झूठ है कि सवर्ण जातिवाद को मानने और फैलाने वाले एकमात्र लोग हैं। 

जब कि कागजी नहीं जमीनी हकीकत यह है कि भारत में तथाकथित

जातिवाद का मजा लेना न कोई छोडता है और नही कोई छोडने का मन बनाता है।

क्योंकि इस जातिवाद रूपी नशे का आलम ही कुछ ऐसा है कि

भंगी को छोड़ दें तो भारत में हर जाति जातिवाद का मजा लेने में सबसे आगे है।। 

घोर आश्चर्य तब होता है जब कुछ तार्किक तथाकथित विद्वान

सड़क से संसद तक जातिवाद की चर्चा  तो करते हैं और चाहते हैं

कि हमें भी ठाकुर बामन की झूठी शान हासिल हो।

लेकिन वही जातिवाद को मिटाने का सपना देखने वाले

अपने स्तर से कुछ भी करने को राजी नहीं होते।

दलितों में एक नहीँ सैकड़ों जातियां हैं जो जाति वाद की भयंकर पोशक हैं

पर उन्हें उनके द्वारा फैलाया गया जातिवाद उनके स्तर पर कभी नही दिखाई देता।

जातिवाद का आलम यह है 

क्या दलितों में भी जातिवाद है? 

इस महत्वपूर्ण प्रश्न के क्रम में यह भी जानना बेहद जरूरी है कि

हमारे पंडित जी महाराज जब भी ठाकुर  बनिया, सूद्र आदि को देखते हैं

तो छाती फुलाकर जाति के गौरव का भरपूर आनंद लेते हैं।

हमारे पंडित जी महाराज के सामने उनसे काबिल और उनसे उम्र में बड़ ही क्यों न आ जाए

पंडित जी ज्ञान और उम्र में छोटा होने के बाद भी उससे खुद प्रणाम नहीं करते

बल्कि उसके प्रणाम की राह तकते रहते हैं।

चरण स्पर्श की तो कल्पना ही फिजूल है।

अब जरा अपने ठाकुर साहब की ठसक देखिए।

इन्हें जब भी कोई पिछड़ी जातियों या फिर दलित जातियों का आदमी दिखता है

तो इनका भी सीना 56 इंच का आटोमेटिक हो जाता है।

ठाकुर साहब को भी अपनी जाति श्रेष्ठता पर गर्व होता है।

और भले ही घर में खाने को न हो उनकी जाति श्रेष्ठता के आगे सब बेकार है।

खैर आइए अब कुर्मी यादव पटेल जी की पोटली खोलते हैं।

इस अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल लोगों का आलम यह है कि

जब भी ये अपने से तथाकथित कमतर जाति  यानी दलित या भंगी को देखते हैं

तो इनका ठाकुर बामन के सामने सोया हुआ गुरूर जिंदा हो जाता है ।

सच कहें तो यह अपनी ऊपर जाने की छटपटाहट के चलते

सुकून नहीं पाते लेकिन दलित को देखते ही इन्हें अपार सुख  मिलता है।

इन्हे भी तथाकथित जाति श्रेष्ठता का मजा आने लगता है।

अंत में आइए बात करते हैं अपने दलित भाइयों की जिसकी

तथाकथित जाति श्रेष्ठता भंगी को देखकर अवतरित होती है।

दलितों में हजारों जातियां उप जातियां विराजमान है इसका प्रमाण यह है कि

धोबी कोरी को देखकर चौड़ा होता है तो धोबी दर्जी को कुछ नहीं समझता।

दर्जी के हांथ का पानी धोबी नहीं पीता तो धोबी के हांथ का कोरी कुछ नहीं खा पी सकता।

अगर हम इस पूरे जाति की तथाकथित श्रेष्ठता के कुचक्र को ध्यान पूर्वक देखें तो

जाति का आनंद जिस तरह ठाकुर पंडित प्राप्त करते हैं ठीक उसी तरह

दलित जातियां भी प्राप्त करती हैं।

कोई मुझे अंत में यह बताने का कष्ट करें कि आखिर  जाति की झूठी शान से

दिक्कत किसे है जो जाति खत्म करने की सोचे? 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 06092018

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मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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