आदर्श चुनाव आचार संहिता फालतू या काम की?

आदर्श चुनाव आचार  संहिता फालतू या काम की? 

 

आदर्श चुनाव आचार संहिता फालतू या काम की?

अगर आप इस सवाल का सचमुच जवाब चाहते हैं तो आपको

पहले यह कौन सी बला है इस पर ध्यान देना होगा। 

चुनाव होने के पहले और चुनाव के बाद तक

जिस आदर्श चुनाव आचार संहिता की बात की जाती है,

आखिर वह आचार संहिता किस काम की होती है? 

यही जानना इस पोस्ट का मकसद है, अत:यदि आप यह जानना चाहते हैं कि

आदर्श चुनाव आचार संहिता फालतू या काम की?

तो इस लेख को, शुरू से अंत तक जरूर अवलोकन करें।

आपको आपकी जिज्ञासा का हल जरूर मिलेगा कि

आदर्श चुनाव आचार संहिता फालतू है या काम की भी होती है? 

भारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में शांतिपूर्ण

एवं निष्पक्ष तरीके से चुनाव संपन्न कराना एक निहायत ही बडी़ चुनौती है

इस बात को हम आप सब बहुत ही कायदे से जानते हैं। 

प्रत्यासी से लेकर राजनीति दल सभी इस बात की

जुगत और जुगाड़ में रहते हैं कि चुनाव में अपना सिक्का आखिर कैसे चलाया जाए? 

मजेदार बात यह है कि चुनाव पूर्व दल और प्रत्यासी सभी इसी फिराक में रहते हैं कि

किस किस से गठबंधन कर लें कि लुटिया डूबने से बच जाए

भले ही मतदाता को उनका बेमेल गठबंधन रत्तीभर भी न सुहाता हो। 

यह बेमेल असंगत और अवैध गठबंधन ऐनकेन

प्रकारेण चुनाव जीतकर सत्ता में काबिज होना चाहते हैं।

एक नमूना इसका यही है कि हाल ही में बुआ भतीजा की हवा चली। 

 लोग बुआ भतीजा का राग अलापते रहे 

लेकिन जब फायदा ज्यादा नजर नहीं आया तो वही बुआ भतीजा का माला जपने वाले

खुद कहते हैं कि बुआ भतीजा राग सम्मान जनक सीटों पर निर्भर करता है। 

सीटे नहीं तो कोई बुआ भतीजा नहीं।

एक राष्ट्रीय दल की मान्यता खो चुकी पार्टी की मुखिया बिना लाग लपेट यह कहने में

जरा भी संकोच नहीं करतीं कि न तो मैं किसी की बुआ और न ही कोई मेरा भतीजा।

आदर्श चुनाव आचार संहिता फालतू या काम की?

इस पर विचार करना ही हमारी इस पोस्ट का अहम उद्देश्य है।

खैर यह तो हुई चुनाव पूर्व दलों की अंतरात्मा के मिलन की कहानी, 

असली कहानी यह है कि बाहुबली लोग मतदाताओं को डरा धमका कर भी

अपना उल्लू सीधा करने में जरा भी देर और संकोच नहीं करते।

भारत के लोकतंत्र ने तो ऐसे भी दिन देखें हैं जब ऐन चुनाव के वक्त, 

पोलिंग बूथ के अंदर मतदाता को या तो खरीद लिया जाता है

या फिर उनके मतदान करने के पहले ही उनके नाम से मतदान कर दिया जाता है।

गुंडे, मवाली  बदमाश, लुच्चे, लफंगे तिकड़मी

सदाबहार दुष्ट चूंकि आज खुद एम पी एम एल ए बनने लगे हैं, 

इसलिए इस बात की बेहद संभावना बढ गई है कि अगर देश और संविधान के रक्षक

ध्यान न दें या फिर इन्हें सबक सिखाने का इंतजाम न करें तो

आज 100 में 99 प्रत्यासी अवैध और असंगत तरीके से ही चुनाव जीतने की कामना करते हैं। 

आदर्श चुनाव आचार संहिता फालतू या काम की? 

हम इसी सवाल का उत्तर खोजने की आगे भी कोशिश जारी रखेंगे। 

मतदान के दौरान मत पत्रों, मत पेटियों /ईवीएम को

लूटने आदि की हरकतें भी बाहुबली लोगों के चमचे करने से बाज नहीं आते।

प्रत्यासी खुद एक दूसरे को डराने, धमकाने और किसी भयंकर मामले में

फंसाने का बखूबी प्रयास करते रहते हैं।

इन्हीं तमाम तरह की चुनावी व्याधियों और चुनौतियों का सामना करने के लिए

और उन्हें समाप्त करने के लिए भारत निर्वाचन आयोग ने

चुनाव की तिथियों की घोषणा के साथ ही साथ कुछ चुनावी मानकों की भी घोषणा करता है। 

यानी चुनाव आयोग कुछ ऐसी बातों का एलान करता है 

जिनको करने की इजाजत किसी को नहीं दी जाती।

हम सामान्य भाषा में चुनाव आयोग द्वारा लागू

इन्हीं बातों को चुनाव आचार संहिता के नाम से जानते हैं। 

जिनका उल्लंघन कोई न करे चुनाव आयोग सब से यही अपेक्षा करता है। 

वर्तमान चुनाव आचार संहिता 

 आदर्श चुनाव आचार संहिता फालतू या काम की? जैसे सवाल के जवाब में हम यह जानते हैं कि

वर्तमान में प्रभावी आदर्श चुनाव आचार संहिता केरल विधान सभा में

1960 में पारित विधेयक गाइडेंस आफ पोलेटिकल पार्टीज एंड कंडीडेटस पर आधारित है।

भारत  निर्वाचन आयोग द्वारा इन्हीं दिशा निर्देशों को

1962 के सामान्य निर्वाचन में कतिपय संशोधनों के साथ अपना लिया गया था।

1962 से 1990 तक की अवधि में जितने भी भारत में चुनाव हुए हैं

उन सभी में आदर्श चुनाव आचार संहिता जारी की गई है।

हां यह बात जरूर है कि  इसके बावजूद भी किसी ने

इनका किसी भी तरह आज तक पालन करना जरूरी नहीं समझा है। 

आदर्श चुनाव आचार संहिता का सशक्त रूप 

आदर्श चुनाव आचार संहिता का सशक्त स्वरूप

1996 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के कार्य काल में देखने को मिला।

उनके उत्तरवर्ती मुख्य निर्वाचन आयुक्तों ने इसे उत्तरोत्तर और अधिक सशक्त बनाया है।

आदर्श आचार संहिता  को यद्यपि अभी तक वैधानिकता प्राप्त नहीं है

फिर भी इसके पालन की अपेक्षा सभी दलों और प्रत्यासियों से की जाती है।

क्योंकि भारत निर्वाचन आयोग को आदर्श आचार संहिता के प्रावधानों का

उल्लंघन किए जाने पर चुनाव प्रक्रिया को रोकने

अथवा रद्द करने का अधिकार प्राप्त है

केवल इसी भय के कारण राजनीति दल आदर्श चुनाव

आचार संहिता की बखिया संभल कर उधेड़ते हैं।

आम जनता जानती है कि हर चुुना में हर दल की शिकायत

हर दल द्वारा की जाती है लेकिन वास्तव में बहुत ही कम मौके आते हैं जब कार्य वाही होती है।

हां मीडिया अपने को हीरो साबित करने में जरूर कामयाब हो जाता है

लेकिन वास्तविक परिवर्तन देखने को जनता की आंखें तरसती ही रहती हैं। 

आदर्श चुनाव आचार संहिता के प्रावधान प्रत्यासियों और दलों के लिए 

किसी भी दल या प्रत्यासी को जाति धर्म या भाषा के आधार पर दो समुदायों के बीच

मतभेद उत्पन्न करने या तनाव बढाने वाले काम करने की मनाही है।

कोई भी राजनीतिक दल जब किसी दूसरे दल की आलोचना करे तो उसे राजनीतिक ही होना चाहिए। 

व्यक्तिगत आलोचना नहीं होनी चाहिए यानी केवल दलों की नीतियों,

कार्यक्रमों की आलोचना होनी चाहिए परिवार की नहीं।

मत प्राप्त करने के लिए किसी की जातीय या

साम्प्रदायिक भावनाओं से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।

सभी दलों को ईमानदारी से ऐसे कार्यों से बचना चाहिए

जो निर्वाचन विधि के अधीन भ्रष्ट आचरण और अपराध हैं।

सभी दलों को चाहिए कि वह प्रत्येक व्यक्ति की निजता का सम्मान करें।

किसी भी राजनीतिक दल या प्रत्यासी को ध्वज दंड बनाने  ध्वज टांगने,

सूचनाएँ चिपकाने, नारे लिखने आदि के लिए किसी भी व्यक्ति को

भूमि  भवन, अहाते दीवार आदि का उसकी अनुमति के बिना उपयोग करने की अनुमति

अपने अनुयायियों को नहीं देना चाहिए। 

चुनाव सभाएं 

किसी को भी यदि कहीं सभा आदि का आयोजन करना है तो उसे 

उसकी अनुमति जरूर लेनी होगी। 

जिसमे समय के साथ साथ

स्थान आदि के बारे में जिम्मेदार अधिकारियों को जरूर बताना चाहिए।

यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि सभा स्थल में कोई निषेधात्मक प्रतिबंध न लगा हो।

किसी सभा में कितने लाउडस्पीकर आदि ध्वनि विस्तारक यंत्र लगेंगे इसकी भी इजाजत लेनी चाहिए।

सभा पर बाधा डालने वालों से निबटने के लिए पुलिस की सहायता प्राप्त करनी चाहिए।

हकीकत यह है कि यदि केवल आदर्श चुनाव आचार संहिता का पालन करना ही

वैधानिक या आवश्यक कर दिया जाए तो चुनाव संबंधी सारे अपराथ खत्म हो सकते हैं 

लेकिन हकीकत यह भी है कि अब लगभग जनता और राजनीतिक दलों की

यह आदत सी हो गई है कि कभी कोई दल मर्यादा का उल्लंघन करता है

तो कभी दूसरा दल वही करता है ।

जनता वही की वहीं रहती है।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि हकीकत की

कसौटी में आदर्श चुनाव आचार संहिता किसी काम की नहीं है। 

   धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 22092018

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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