कौन है भारतीय लोकतंत्र का असली दुश्मन?

 

कौन है भारतीय लोकतंत्र का असली दुश्मन? 

कौन है भारतीय लोकतंत्र का असली दुश्मन?

अगर आपको इस सवाल का जवाब जानना है तो आपको पीछे चलना होगा।

आपको मेरे पीछे नहीं चलना बल्कि मेरे कहने का मतलब यह है कि

आपको वर्तमान से हट चंद कदम विगत उन वर्षों की तरफ बढाने होंगे

जब भारतीय लोकतंत्र को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।

सच कहें तो भारतीय लोकतंत्र की यह चुनौतियां भी लोकतंत्र की ही देन हैं।

भारतीय लोकतंत्र का असली दुश्मन अगर हमें तलाश करना है

तो हमें और कहीं जाने की जरूरत नहीं है। 

बल्कि अपने ही लोकतंत्र में झांकने की जरूरत है और यह पता लगाने की दरकार है

कि भारतीय लोकतंत्र के संचालन में कौन कौन से बाधक तत्व हैं?

क्योंकि लोकतंत्र के असली दुश्मन कोई और नहीं बल्कि

यही लोकतंत्र के बाधक तत्व ही लोकतंत्र के असली दुश्मन हैं।

आइए जानते हैं कि लोकतंत्र के असली दुश्मन यानी लोकतंत्र के असली बाधक तत्व कौन हैं,, , 

निरक्षरता है लोकतंत्र के संचालन में बड़ा बाधक तत्व 

कौन है भारतीय लोकतंत्र का असली दुश्मन?

इस सवाल का जवाब है कि निरक्षरता लोकतंत्र के संचालन में

सबसे बड़ा बाधक तत्व यानी असली दुश्मन है।

क्योंकि लोकतंत्र के सफल संचालन हेतु आम जनमानस का साक्षर होना नितांत आवश्यक होता है।

यह ध्यान देने की बात है कि लोकतंत्र यानी सरकार का निर्माण जनता की इच्छा पर होता।

लेकिन इसके बावजूद उसकी इच्छा मायने नहीं रखती क्योंकि

भारतीय जन संख्या का एक बड़ा भाग आज भी निरक्षर।

निरक्षरता चेतना शून्यता की अवस्था है जिसके कारण

लोकतंत्र के संचालन में कदम कदम में बाधा आना स्वाभाविक है।

भारतीय जनगणना आयोग के अनुसार एक साक्षर व्यक्ति वह है

जिसमें समझदारी पूर्वक लिखने और पढने की क्षमता है। 

इस दृष्टि कोण के अनुसार यदि कोई व्यक्ति लिख और पढ लेता है

परंतु समझता नहीं है कि वह क्या लिख रहा है तो उसे साक्षर की श्रेणी में नहीं रखा जाता है।

निरक्षरता वास्तव में विकास में बाधक होती है।

विकास, संवृद्धि तथा सामाजिक न्याय के नजरिए से निरक्षरता एक बड़ी बाधा है। 

स्तरीय या अच्छे जीवन जो लोकतंत्र का अभीष्ट है की प्राप्ति में

यह यानी निरक्षरता एक अवरोध है।

निरक्षरता अनायास ही समाज को साकार रों तथा निरक्षरों में विभाजित कर देती है।

इतना ही नहीं निरक्षर अनायास ही राजनीतिक

आर्थिक व सामाजिक विकास की परिधि से बाहर हो जाता है। 

सामाजिक एवं आर्थिक असमानता 

लोकतांत्रिक सरकार प्रतिनिधित्व स्वतंत्र चयन विधि

के समक्ष समानता और विधि के शासन के सिद्धांतों पर आधारित होती है।

लोकतंत्र अवसर की समानता, संसाधनों के न्याय संगत वितरण

और सबके लिए जीविकोपार्जन के साधन उपलब्ध कराने का आग्रह करता है।

भारतीय समाज में विद्यमान जाति आधारित विभाजन एक जाति के द्वारा

दूसरी जाति के शोषण जातियों के मध्य संघर्ष लोकतंत्र के क्रियान्वयन को बाधित करते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो लोकतंत्र के असली दुश्मन यही सामाजिक आर्थिक असमानता नामक यथार्थ है।

सामाजिक असमानता का मूल भारत की वर्ण व्यवस्था है ।

इनमे कुछ निम्न तो कुछ उच्च जाति मानी जाती हैं।

यह पहले व्यवसाय प्रधान थी आगे चलकर जाति प्रधान बन गई ।

वास्तव में यही सामाजिक असमानता भारतीय लोक तंत्र के असली दुश्मनों में शामिल है।

इसे ही लोक तंत्र के क्रियान्वयन में बाधा माना जाता है।

 

इस असमानता की ही एक सच्चाई यह भी है कि मतदाता भी

जाति के हिसाब से वोट करते हैं जो अंतत: लोकतंत्र

का असली दुश्मन बनने का प्रथम लक्षण साबित होता है।

निर्वाचन में इसी के चलते यही जातियों का समीकरण संतुलन का मानक बन गया है।

जाति के आधार पर ही अनुसूचित एवं अन्य पिछड़ा

वर्ग एससीएसटी ओबीसी जाति में वर्गीकृत किया गया है। 

क्षेत्रीय असंतुलन भी है लोकतंत्र का असली दुश्मन 

क्षेत्रीय असंतुलन का मतलब यह है कि जब 2007 से

2012 के बीच यूपी में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी की सरकार थी

तो पूरे प्रदेश में बिजली के लिए हाहाकार था।

लेकिन सैफी, मैनपुरी  इटावा, कन्नौज में कोई दिक्कत नहीं थी।

कारण यह था कि पूरे प्रदेश की बजाय समाजवादी

पार्टी अपने खास इलाके को अधिकतम सुख प्रदान करना चाहती थी।

यही हाल सरकार में शामिल मंत्रियों और संतरियों का था।

जहां का प्रतिनिधित्व सरकार में शामिल लोग कर रहे थे

वहां के लोगों को फायदा था और जहां के लोगों का

प्रतिनिधित्व सरकार में शामिल लोग नहीं कर रहे थे वहां हाहाकार ही सच्चाई थी।

कहने का मतलब यह हुआ कि जब सरकारें इस तरह का आचरण करती हैं तो

क्षेत्रीय असंतोष या असंतुलन बढ जाता है

जिसका अंतिम परिणाम कभी सकारात्मक नहीं होता,

और इस तथ्य का अंतिम सत्य लोक तंत्र की बाधा के रूप में हमें दिखाई देती है।

तात्पर्य यह है कि लोकतंत्र का असली दुश्मन यह तथ्य भी कहा जा सकता है।

क्षेत्रीय असंतुलन कभी भी लोकतंत्र के लिए फायदेमंद नहीं होता

यह सदैव लोकतांत्रिक व्यवस्था में गलत प्रभाव डालता है।।

कौन है भारतीय लोकतंत्र का असली दुश्मन?

इस सवाल का जवाब यह भी है कि क्षेत्रीय असंतुलन भी लोकतंत्र का असली दुश्मन ही है। 

भाषा वाद और नक्सल वाद भी लोकतंत्र के दुश्मन हैं 

क्षेत्रवाद की ही तरह भाषावाद भी किसी राजनीतिक

व्यवस्था के  एकीकरण की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।

ध्यान देने की बात है कि अपनी भाषा के प्रति लगाव होना कोई भाषा वाद नहीं है ।

लेकिन जब किसी भाषा विशेष से जुड़े लोग भाषा के आधार पर

अपने सामाजिक आर्थिक हितों को अन्य भाषा

भाषियों से पृथक मानने लगते हैं तो यही भाषा वाद कहलाता है।

जो लोग दक्षिण भारत की घटिया राजनीति से परिचित हैं वह जानते हैं

कि जिस तरह पाकिस्तान में हर भारत विरोधी ही सत्ता पाता है।

ठीक उसी तरह दक्षिण के भारत विरोधी प्रदेशों की सच्चाई यही है कि

जो दल हिन्दी और उत्तर भाषी राज्यों की भाषा का हर तरह हर स्तर से अतार्किक विरोध करता है

वही दक्षिण की राजनीति में विजेता कहलाता है ।

यह सारी हलचल किसी भी देश के लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं होता।

जहां तक भारतीय लोकतंत्र की बात है तो सचमुच उसे

यही व्याधियां लगातार कमजोर करने की कोशिश करती रहती हैं।

इस लिए हम सभी भारतीय लोगों की यह जिम्मेदारी है कि हम अपने

लोकतंत्र को कमजोर और बाधित करने की चेष्टा कतई न करें।

वर्ना हमें बार बार यही सवाल पूछना पडेगा कि कौन है भारतीय लोकतंत्र का असली दुश्मन? 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 22092018

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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2 Comments on “कौन है भारतीय लोकतंत्र का असली दुश्मन?”

  1. Verry nice sir sir ek aap ka post hai jo likh kar submit karne se kuch hi dino m wa publish ho jata hai or ek mera mtlb mere jaise or bhi log h jinka post publish nhi hota pta nhi kyun ❓

    1. धन्यवाद बहुत बहुत
      आप धैर्य रखें जल्द ही सभी के लेख प्रकाशित होंगे

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