सुप्रीम कोर्ट का फैसला मेरी समझ से बाहर है

सुप्रीम कोर्ट का फैसला मेरी समझ से बाहर है 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला मेरी समझ से बाहर है दोस्तों,

क्योंकि मेरी समझ में जिंदगी में अभी तक केवल यही आया था कि

अवैध संबंध दुनिया की वह सच्चाई है जो दुनिया की हर बुराई की जड़ है।

यानी दुनिया में जितने भी भयंकर से भयंकर अपराध होते हैं उन सब में

कहीं न कहीं यही अवैध संबंध कारण होते हैं।

इतना ही नहीं मैने तो यहां तक सुना है कि दुनिया का

हर अवैध संबंध केवल और केवल घरों को बर्बाद करता है।

कोई आज तक पूरी दुनिया में एक भी ऐसा अवैध संबंध नहीं है

जिसने परिवारों को आबाद करने की बजाए आबाद न किया हो।

 

मैने अपने बड़े बुजुर्गों और अपनी सभ्यता और संस्कृति की सीख में भी आभी तक

यही सीखा था कि अवैध संबंध अवैध ही नहीं समाज के लिए कलंक और अभिशाप भी होता है।

 

कुल मिलाकर मैं अभी तक यही मानकर चल रहा था कि अवैध संबंध अवैध हैं,

 परंतु यह क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने अभी अभी इसी प्रश्न का जो अपना

निर्णय दिया है वह तो मेरी समझ से ही परे है।

सच कहें तो कुछ भी समझ में नहीं आता कि आखिर समझें तो क्या समझें

अवैध संबंध वैध कैसे हो सकते हैं???? 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा क्या है 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला मेरी समझ से बाहर है।

इसकी हकीकत यह है कि 27 सितंबर 2018 भगतसिंह के जन्म दिवस

तथा विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम

तथा बेहद महत्वपूर्ण तथा बेहद चर्चित मामले में बेहद खास फैसला सुनाया है।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पति की मर्जी पर उसकी

पत्नी से संबंध बनाने और मर्जी न होने पर सजा देने के प्रावधान को रद कर दिया है। 😢

कोर्ट ने व्यभिचार को अपराध मानने वाली आई पी सी की धारा – 497 को

लिंग आधारित भेदभाव वाला बताते हुए असंवैधानिक करार दिया है।

कोर्ट ने कहा कि पति अपनी पत्नी का मालिक नहीं है।

 

 यह बात दीगर है कि यही कोर्ट तलाक के बाद गुजारा

भत्ता मालिक मानकर ही दिलाता।

साथ ह सासाथ यह बात भी दीगर है कि हमारी

संस्कृति पति पत्नी दोनों को दोनों का मालिक ही

मानती है।

 कोर्ट ने अपने निर्णय में आगे यह भी कहा कि पत्नी

को बराबरी का अधिकार है और उसे यौन स्वायत्तता

भी हासिल है।

इसे हिन्दी में समझें कि कोर्ट ने क्या कहा है।

कोर्ट ने यह कहा है कि अगर किसी व्यक्ति ने अपनी पत्नी को

किसी दूसरे व्यक्ति से संबंध अपनी मर्जी से बनवाया

तो जिस तरह यह कोई अपराध नहीं है। 

उसी तरह यदि किसी की पत्नी किसी दूसरे से संबंध बनाती है तो वह भी अपराध नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि धारा – 497 के अनुसार पत्नी के इस कृत्य के खिलाफ

पति मुकदमा कर देता है और पत्नी नहीं कर सकती यह भी गलत है।

कोर्ट ने कहा सच में इस धारा से पुरुष वादी सोच

झलकती है जो अवैध और असंगत है।

भाइयो बहनों मुझे यहां तक तो बात समझ में आती है लेकिन

मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि चाहे पुरुष हो या स्त्री

कोर्ट ने दोनों को बराबरी देने के चक्कर में एक खराब

काम पर अपनी मुहर क्यों लगा दी।

कोर्ट ने यह क्यों नहीं कहा कि पति जो कर रहा है वह भी गलत

और यदि वही काम पत्नी करती है तो वह भी गलत है।

कोर्ट को इस गंदे काम को इस लिए वैध नहीं ठहराना चाहिए

कि एक करता है तो दूसरा भी करे तो कुछ गलत नहीं।

कोर्ट का फैसला 

महिलाओं को बराबरी और विवाहित महिला की स्वायत्तता के अधिकार पर

मुहर लगाने वाला यह ऐतिहासिक फैसला प्रधान

न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायधीशों की खंडपीठ ने सुनाया है।

पांच न्यायाधीशों  की पीठ में चार न्यायाधीशों ने अलग अलग लेकिन सहमति का फैसला दिया है।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने स्वयं और जस्टिस एएम खानविलकर की ओर से फैसला दिया, 

जबकि जस्टिस आर एफ नरीमन, डीवाई चंद्र चूण और जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने

अलग अलग एक दूसरे से सहमति जताने वाला फैसला सुनाते हुए

एक सुर से 158 साल पुराने कानून आई पी सी की धारा 497

और सीआर पीसी की धारा 198-2को रद्द कर दिया है।

जस्टिस चंद्र चूण ने अपने फैसले में कहा है कि कानून शादीशुदा महिला

और शादी शुदा पुरुष में भेद करता है।

जीवनसाथी की वफादारी सुनिश्चित करने के लिए पुरुष को आपराधिक दंड का अधिकार मिला हुआ है। 

पत्नी का मालिक नही है पति 

प्रधान न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि कि धारा 497 लिंग आधारित घिसीपिटी सोच है, 

जिससे महिला की गरिमा पर चोट पहुंचती है।

इसके अलावा इस धारा में संबंध बनाने के लिए पति की सहमति या सुविधा

एक तरह से पत्नी को उसकी अर्जित की गई सम्पत्ति बनाती है।

यह धारा वास्तव में अनुच्छेद 21 में मिली जीवन के

अधिकार की आजादी का उल्लंघन करती है।

जस्टिस आर एफ नरीमन ने अपने फैसले मे कहा है

कि यह पुराना कानून पत्नी को पति की सम्पत्ति की तरह मानता है। 

कानूनन पुरुष को हक है कि वह पत्नी से संबंध बनाने वाले

दूसरे पुरुष पर मुकदमा कर सकता है लेकिन किसी की पत्नी

अपने पति से संबंध बनाने वाली पर नारी पर मुकदमा नहीं कर सकती ।

इतना ही नहीं किसी की पत्नी अपने पति के खिलाफ भी मुकदमा नहीं कर सकती

यदि उसका पति किसी दूसरी महिला से अवैध संबंध स्थापित करता है।

 इस कानून की यह बात निहायत गलत है

जिसे दोनों के लिए होना चाहिए उसे किसी एक के लिए नहीं होना चाहिए।

यह बात भी समझ में आती है लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला मेरी समझ के बाहर है

जिसमें वह पत्नी को भी वही सब करने को सजा विहीन मानता है

जिसे उसका पति भी करता।

होना यह चाहिए था कि अदालत किसी भी तरह के अवैध संबंध को गलत ठहराती

फिर चाहे वह स्त्री का होता या उसके पति यानी पुरुष  का होता ।

लेकिन मुझे लगता है आजादी या जिंदगी की स्वायत्तता देने के चक्कर में कोर्ट खुद चक्कर काट गयी है ।

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 28092018

 

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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