सुप्रीम कोर्ट ने तोड़ी 800 साल पुरानी प्रथा

सुप्रीम कोर्ट ने तोड़ी 800 साल पुरानी  प्रथा 

सुप्रीम कोर्ट ने तोड़ी 800 पुरानी परम्परा।

जी हां दोस्तों, सच यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक

अहम और ऐतिहासिक महत्व के फैसले के द्वारा 800 वर्षों से चली आ रही

तथाकथित सड़ीगली, असंगत और अमानवीय प्रथा को तोड़ दिया है।

28 सितम्बर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में दिए गए

अपने एक और तार्किक तथा ऐतिहासिक फैसले में

केरल स्थित सबरीमाला मंदिर के द्वार सभी महिलाओं के लिए खोल दिए हैं।

यहाँ ध्यान देन वाली बात यह है कि इस ऐतिहासिक

महत्व के भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिर में 800 वर्षों से एक अतार्किक प्रथा यह चल रही थी कि

इस मंदिर में कोई भी ऐसी महिला प्रवेश नहीं कर सकती जिसकी उम्र 10 से 50 वर्ष के बीच हो।

इसके पीछे तर्क और आस्था यह थी कि चूंकि

सबरीमाला मंदिर में बिराज मान भगवान् अयप्पा ब्रह्म चारी रूप में हैं, 

इसलिए इस मंदिर में 10से 50 साल की महिलाएं प्रवेश नहीं कर सकतीं।

कारण यह है कि इस उम्र की महिलाओं को मासिक धर्म होता है

फलस्वरूप वह उस दौरान अपवित्र होती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी 800 साल की पुरानी तथाकथित अतार्किक परंपरा को

तोड़ते हुए कहा कि यह महिलाओं के साथ भेदभाव है।

इससे महिलाओं के अधिकारों तथा पूजा अर्चना के मौलिक अधिकारों का हनन होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय को स्पष्ट करते हुए यह भी कहा कि

शारीरिक कारणों से महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने से रोकना गलत है।

इसी तर्क के सुप्रीम कोर्ट ने तोड़ी है 800 साल पुरानी प्रथा  को। 

ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर और अदालत 

सुप्रीम कोर्ट ने तोड़ी 800 साल पुरानी प्रथा।

इस सच की सच्चाई यह है कि केरल के सबरीमाला मंदिर में

800 सालों से चली आ रही पुरानी प्रथा को

सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 

4:1के बहुमत से अपना फैसला सुनाते हुए इसे हर दम के लिए खत्म कर दिया है।

इस संविधान पीठ में भारतीय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर,

आर एफ नरीमन, डीवाई चंद्र चूण और महिला न्यायाधीश  इंदु मल्होत्रा शामिल थीं।

यहां विशेष बात यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में

स्वयं सुप्रीम कोर्ट भी एक राय नहीं रखता। 

क्यों कि इस संविधान पीठ की एकमात्र महिला सदस्य

बाकी चार न्यायाधीशों के निर्णय से असहमति जताते हुए अपना फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय इस संविधान पीठ की एकमात्र महिला सदस्य इंदु मल्होत्रा ने

अपने निर्णय में सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के रोक को सही ठहराया है।

भारत के प्रधान न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा ने स्वयं

और जस्टिस खानविलकर की ओर से दिए गए अपने फैसले में लिखा है कि

महिलाओं के प्रति दोहरा मानदंड अपनाना समय और सभ्यता का कुतर्क  और अपमान है ।

दीपक मिश्रा ने अपनी बात की पुष्टि में यह भी कहने से नहीं चूके कि

एक तरफ तो महिलाओं को देवी माना जाता है वहीं दूसरी ओर

धार्मिक परम्परा के नाम पर उनके साथ संगठित भेदभाव किया जाता है।

इसलिए इस प्रकार की सभी घिसी पिटी परम्पराओं को त्यागना होगा।

इतना ही नहीं दीपक मिश्रा ने अपने निर्णय में यह भी कहा है कि

धर्म में पुरुषवादी धारणा को किसी की धर्मिक आस्था

और पूूजा के अधिकार के ऊपर मान्यता नहीं दी जा सकती है।

दीपक मिश्रा ने यह भी कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सभी व्यक्ति समान हैं। 

सबरीमाला, संविधान और पूजा का अधिकार 

सबरीमाला, संविधान और जहां तक पूजा के अधिकार की बात है तो संविधान के तहत

सभी को यानी स्त्री पुरुष को समान पूजा अर्चना का मौलिक अधिकार है।

भगवान् अयप्पा एक अलग धार्मिक पंथ नहीं हैं।

निश्चित आयु की महिलाओं पर रोक लगाने का

नियम वास्तव में किसी धर्म का अभिन्न अंग नहीं है।

10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाने वाला नियम 3बी, 

हिन्दू महिलाओं के पूजा अर्चना के मौलिक अधिकार का हनन करता है।

किसी भी महिला को उसके मासिक धर्म के नाम पर किसी सार्वजनिक स्थल से

बाहर करना या बाहर रखना एक तरह का छुआछूत है।

ध्यान रहे कि संविधान में छुआछूत एक अभिशाप है।

इसमें पवित्रता या अशुद्धता के लिए कोई जगह नहीं है।

अनुच्छेद 25(1)के तहत सभी को धार्मिक आस्था

और पूजा अर्चना का मौलिक अधिकार प्राप्त है।

इसमें महिलाएं भी शामिल हैं। 

 

न्यायाधीश इंदू मल्होत्रा का विरोध 

27 अप्रैल 2018 को सर्वोच्च न्यायालय के

न्यायाधीश की शपथ लेने वाली इंदू मल्होत्रा बेहद खास हैं।

वह भारत की पहली ऐसी महिला अधिवक्ता हैं

जो अधिवक्ता पद से सीधा सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बनाई गई हैं।

इस लिए यह कोई अतार्किक बात शायद ही करें। 

फिर भी अगर इन्होनें संविधान पीठ के चार जजों से ठीक उल्टा निर्णय दिया है तो

वह इतना बेकार नहीं हो सकता जो केवल और केवल विरोध के लिए किया गया हो।

इसका भी कुछ अर्थ होगा और इस अर्थ के भी कुछ मायने होंगे।

सबरीमाला के ऐतिहासिक फैसले के ठीक उलट फैसला देने वाली

जस्टिस इंदु मल्होत्रा संविधान पीठ के बाकी जजों के फैसले के बारे में कहती हैं कि

वर्तमान निर्णय केवल सबरीमला तक सीमित नहीं रहेगा।

गहरी धार्मिक भावनाओं में आमतौर पर अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

इंदु मल्होत्रा का कहना है कि धार्मिक प्रथाओं का

संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रदत्त समानता के

अधिकार के साथ पूरी तरह से परीक्षण नहीं किया जा सकता है। 

पूजा का तरीका भक्त तय करता है कि उसे कब कैसे

और किस तरह पूजा आराधना करना है।

इसके लिए अदालत को हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है।

अदालत कतई यह नहीं बता सकती कि किसी को किस तरह पूजा करना चाहिए।

इंदु जी आगे यह भी कहती हैं कि आस्था से जुड़े मामलों को

समाज को ही तय करना चाहिए न कि अदालत को। 

मुझे लगता है कि हमें इंदू जी के कथन को बस यूं ही नहीं छोड देना चाहिए

बल्कि हमें इनके कथन का परीक्षण भी करना चाहिए।

देखा जाए तो इंदू जी की बात समझना इतना आसान भी नहीं है।

अगर यह बहुत सामान्य कथन होता तो इस बात की गारंटी है कि

यह कथन फिर इंदू जी का नहीं होता।

मेरे हिसाब से इंदु मल्होत्रा सही कह रही हैं कि गहरी

धार्मिक भावनाओं में आमतौर पर अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 30 092018

 

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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