ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है?

ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है? 

संसार का शायद यह सबसे ज्यादा बार पूछे जाने वाला सवाल है कि

आखिर ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है?

आप किसी को भी देख लीजिए चाहे अमीर हो या गरीब

कुलीन हो या अकुलीन सभी को यह सवाल सदैव परेशान करता रहा है कि

आखिर ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है?

ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है यह एक ऐसा सवाल है जो किसी के भी मन में हलचल पैदा कर सकता है।

आप बुद्धिमान हों या बुद्धि हीन सभी के मन में यह

सवाल कभी न कभी जरूर आता है कि आखिर ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है?

ज्ञान प्राप्ति के लिए क्या जरूरी है 

क्या ज्ञान की प्राप्ति के लिए उपदेश की जरूरत होती है?

या फिर ज्ञान प्राप्त करने के लिए बहुत ही संख्या में

क्लिष्ट और बड़े बड़े ग्रंथों के मर्म को समझने की जरूरत होती है?

इसका उत्तर मेरे हिसाब से है “नहीं”।

ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी महान ग्रंथ के मर्म को घोटकर पीने की जरूरत नहीं है।

असली ज्ञान वही है जो किसी किताब से न आकर जिंदगी के पन्नों से आया हो।

जिंदगी के पन्नों में कलम दवात और स्याही से कुछ भी लिखने के बजाय

खामोश सच्चाई के हर्फ लिखे होते हैं। 

ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है?

इस सवाल का जवाब वैसे  कुछ भी हो सकता है लेकिन

हकीकत और हकीकत की सच्चाई यही है कि ज्ञान ऐसा होना चाहिए कि

जब हम उसे पूरी तरह से स्वयं में आत्मसात कर लें तो इसके बाद

उसे हमारे व्यवहार और कर्म का पर्याय होना चाहिए।

इसका मतलब यह हुआ कि ज्ञान ऐसा होना चाहिए जिसे

ग्रहण करने के बाद अपने कर्म और व्यवहार में उतारा जा सके।

जो ज्ञान किसी के भी कर्म और व्यवहार में दिखने की क्षमता नहीं रखता

उसे ज्ञान नहीं कहा जा सकता ।

अगर कुछ कहना ही हो तो उसे व्यर्थ का थोथा ज्ञान जरूर कहा जा सकता है।

व्यर्थ ज्ञान यानी समय की बर्बादी 

क्या आपने महसूस किया है कुछ लोग अक्सर कहा करते हैं हम तो सत्संग करने जा रहे हैं, 

या फिर वही लोग कहते हैं हम तो सत्संग करके आ रहे हैं। 

लेकिन जरा ध्यान से देखिए

जिसे हम आप सब ज्ञान का साधन यानी सत्संग कहते हैं

वह सत्य का संग नहीं बल्कि भीड़ का संग और इधर-उधर की बतकही का प्रपंच मात्र होता है।

आपको याद रखना चाहिए कि सत्य संग कभी माइक लगाकर

हजारों की भीड़ से लाखों का दान लेकर नहीं किया जाता।

सत्य का संग यानी सत्संग आत्मा से साक्षात्कार को कहा जाता है न कि

किसी मोटी तोंद वाले का शाष्टांग आसन को। 

 

ज्ञान की यथार्थ प्राप्ति 

दोस्तों,, जिसे दुनिया यथार्थ ज्ञान कहती हैं उसे दुनिया सत्य ज्ञान भी कहती हैं।

अब आप ही अपनी बुद्धि पर जोर लगाकर सोचो क्या सत्य या यथार्थ ज्ञान

किसी असत्य के जरिए संभव है? 

आप मंदिर जाओ, मस्जिद जाओ, गुरूद्वारा जाओ दरगार पीर फकीर खानकाह जाओ

ढोंगियों के झुंड आप पर झपट्टा मारने के लिए बेताब मिल जाते हैं।

दोस्तों ऐसे में ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है? जैसे सवाल का जवाब यही है

कि सत्य ज्ञान की प्राप्ति सत्य से होती है, किसी ढोंगी के ढोंग से नहीं। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 05102018

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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4 Comments on “ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है?”

  1. Very good your post
    ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है ,यह इस पोस्ट का टैग है

    वास्तव में सर आपने सही बताया कि ज्ञान उपदेश देने से प्राप्त होता है और हर व्यक्ति के अंदर अंतरात्मा रूपी ज्ञान पाया जाता हैऔर वह चाहे जिस प्रकार का हो
    सर मै आपको अपने दिल से धनन्यवाद करता हूँ

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