क्या प्यार ही दर्द बन जाता है?

क्या प्यार ही दर्द बन जाता है? 

क्या प्यार ही दर्द बन जाता है?

इसे आप केवल एक सवाल मत समझिएगा क्योंकि यह केवल एक  सवाल भर नहीं है।

हकीकत में यह जिंदगी की वह हकीकत है जिससे कभी कभार वह लोग भी दो चार हो जाते हैं, 

जो अक्सर अपनी जिंदगी में खुशियों से सराबोर दिखाई दिया करते हैं।

हो सकता है बात अटपटी लगे लेकिन आप अगर इसे करीने से समझने की कोशिश करेंगे तो

मुझे विश्वास है कि मेरी यह बात आपको उलझी नहीं बल्कि सुलझी हुई लगेगी।

क्या प्यार ही दर्द बन जाता है?

अगर आप सच में इस सवाल का जवाब जानना चाहते हैं तो

आप को मेरी एक छोटी सी कहानी पढना होगा और हां,

अगर आप ने सचमुच इसे पूरा पूरा पढ लिया तो आपका कोई सवाल ही नहीं बचेगा।

मेरी कहानी मेरी  जबानी 

अभी मैंने केवल बीए पास किया था।

हम केवल तीन बहनें थीं और पापा सरकारी नौकरी में थे।

बड़ी दीदी की शादी हो चुकी थी इसलिए गाहे बगाहे लोगों के आते जाते, 

उठते बैठते मेरी शादी की बात टपक ही पड़ती थी किसी के भी मुंह से।

झूठ नहीं बोलूंगी, मैंने अपनी कई सहेलियों को भी शादी ब्याह की बात करते सुना था, 

और उससे भी बड़ा सच कहूं

तो मैं खुद भी चाहती थी कि मुझे भी कोई प्यार करे और मेरा भी कोई ख्याल रखें।

इतन ही नहीं मैं यह भी चाहती थी कि कोई मुझसे भी  रूठे और मैं भी उसे मनाऊं।

दोस्तों, मेरा मन यह सब क्यों सोचता था मुझे ठीक ठीक पता तो नहीं था

लेकिन हां मुझे इस बात का पता जरूर था कि मुझे भी अब यह सब अच्छा लगने लगा था। 

लेकिन यह सब ऐसी बातें हैं जो हम चाहकर भी अपने खुद के घर वालों से नहीं कह सकते। 

कहने को तो हम इन्हें बाहर वालों से भी नहीं कह सकते पर हां, 

शायद इसी लिए जब कोई दूसरा इस तरह की बातें करता है

तो मन बस खिंच कर चला ही जाता था  

मेरे जीजा जी बेहद अच्छे इंसान थे ।

इस बात का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं

कि दीदी के बाद हम दोनों बहनों से कभी उन्होंने जीजा साली वाला रिश्त ननहीं चलाया।

वे खुद को हमारा बड़ा भाई मानते थे।

ऐसे में आप भी सोच सकते हैं किसी को भी दीदी के

पास उनकी ससुराल जाने में दिक्कत नहीं हो सकती थी ।

शायद यही कारण था कि जब जीजा जी ने अपने छोटे

भाई की शादी में दीदी के पास चलने को कहा तो मम्मी

पापा किसी ने मुझे मना नहीं किया । 

विवाह में जाना और आना

क्या प्यार ही दर्द बन जाता है?

इस सवाल का जवाब तो मैं आपको बाद में दूंगी पहले आपको मैं रमन के बारे में बताना चाहती हूं।

आप इस नाम को कहानी में पहली बार सुनकर शायद अभी तक यह समझ न पाए हों कि

यह जनाब कौन हैं? और कहां से टपके हैं?

मैं आपको बता दू कि यह दीदी का पारिवारिक लड़का था, 

जिसका विवाह के चलते घर में कुछ ज्यादा ही आना जाना था।

मुझे इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि मेरी भी कहानी इसी से यहाँ आकर जुुड़ेगी

इस लिए मैं तो स्वाभाविक रूप से ही इससे जरूरत पर बात करती थी

लेकिन यह साहब कुछ ज्यादा ही मेरे आस पास होने के बहाने ढूढने लगे थे।

आप को यह बात शायद ही बताने की जरूरत है कि

शादी के घर में बिना सीसीटीवी कैमरे के ही काम चल जाता है।

मजाल है कि ऐसे घरों में कोई मामला नजरों से बच जाए।

वहीं मेरे साथ भी हुआ जब रमन कुछ ज्यादा ही

कैफियत दिखाने लगा तो मुझे भी वह अच्छा लगने लगा था।

मैंने चुपके से पता किया तो जनाब एक पुलिस वाले के बड़े बेटे थे, 

बीएससी कर चुके थे अब आगे की पढाई के लिए कानपुर या इलाहाबाद जाने वाले थे।

घर में दो बहनें और दो छोटे छोटे भाई थे।

मैं यह सब जानकारी किसी पड़ताल या जांच परख करने के लिए हासिल नहीं कर रही थी

बल्कि सच तो यह है कि पता नहीं क्यों?

इस उम्र में किसी न किसी के प्रति कुछ ऐसा झुकाव हो ही जाता है

कि बेमतलब उससे मतलब रखने में अच्छा लगता है।

बात धीरे धीरे बढकर शादी की बात तक चली तो पापा ने साफ बता दिया कि

छोटी सी सरकारी नौकरी है बस स्वागत सत्कार ही कर पाएंगे।

रिश्ता तब भी इस लिए पक्का हो गया कि पता चला

रमन ने अपने पापा को इस बात के लिए मना लिया था

कि वह बिना मोटा दहेज लिए ही शादी कर लें।

 

शादी के पहले और शादी के बाद 

शादी के बाद मुझे लगा था कि हम दोनों को प्यार हो गया था, 

इसीलिए हमने और रमन ने शादी की थी।

लेकिन यह बात समझने में मुझे पल भर भी नहीं लगा कि

प्यार और आकर्षण में फर्क होता है।

इतना ही नहीं मुझे इस बात का भी बखूबी पता चल चुका था कि

शायद मुझे अब खुश रहने का न तो कोई अधिकार है और न ही मुझे

अब इसका कोई मौका मिलने वाला है।

मुझे यह भी पहली बार ही पता चला था कि आज की दुनिया

इतना आगे बढ गई है कि लोग हंसते हंसते शादी को खिलवाड़ मानकर

किसी के भी जज्बात से यूं ही खेल लेते हैं।

 यह राज की बात है जो अब मैं आपको बताने जा रही हूं।

क्योंकि मुझे लगता है कि जब तक मैं आपको अपनी यह बात नहीं बताऊँगी, 

तब तक आपको मेरा प्यार और मेरे प्यार का असली दर्द समझ नहीं आएगा।

हुआ यह था कि जब मैं बीए लास्ट ईयर में थी तो  मेरी

शादी का एक खास पैगाम खुद  दीदी और जीजा जी लाए थे

जिसे मैने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया था।

दीदी अपने गैर पढे लिखे देवर से मेरा विवाह इस लिए करवाना चाहती थीं

कि पिता जी की संपत्ति में दीदी के घर एक नहीँ दो हिस्से जाएंगे

और इस कंडीशन मे दीदी मुझे मनाकर दो हिस्सों की

वजह से मकान और सम्पत्ति में अच्छा खासा माल बटोर लेंगी ।

लेकिन मैने जब शादी से ही इन्कार कर दिया तो दीदी के सपने बिखर गए थे

तो दूसरी तरफ दीदी के गैर पढेलिखे देवर के लिए भी यह बेहद नागवार गुजरा था।

दीदी का देवर और रमन एक नहीं कई तरह के नशे साथ ही करते थे।

इसलिए दीदी के देवर ने मुझसे बदला लेने का प्लान बनाकर यह घिनौना खेल खेला था ।

बाहर से पिता जी को भी लगा था कि रमन और रमन का परिवार ठीक है

लेकिन हकीकत यह है कि पुलिस वाले का परिवार शायद

हजारों में  एक ही बमुश्किल ठीक होता है।

रमन असलियत में निहायत शादी लायक आदमी नहीं था, 

इसीलिए मेरी शादी उससे कराई गई थी ।

यह एक  सोची समझी चाल थी जिससे मैं बिल्कुल ही अनजान थी ।

आज की सच्चाई केवल यही है कि जिसे मैं प्यार समझ कर पाना चाहती थी

आज वह मेरे लिए प्यार कम दर्द ज्यादा लग रहा था। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 10102018

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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