मेरे गांव की पुरानी बातें

मेरे गांव की पुरानी बातें 

मेरे गांव की पुरानी बातें कहने के लिए ही हैं हकीकत

और सच्चाई यही है कि ये बातें हर भारतीय के गांव की अपनी बातें हैं।

जी हां दोस्तों, आज की रफ्तार वाली जिंदगी में हम भले ही पल भर के लिए

इन तमाम अनमोल बातों को भूल गए हों परंतु सच यही है कि

हमने, आप ने, सबने अपनी अपनी जिन्दगी का जो भी हिस्सा गांव में गुजारा है

वह अद्भुत है, अद्वितीय है, और आज की तारीख में अकल्पनीय है।

इतना ही नहीं आज हम अपनी अपनी जिंदगी को भले ही नामचीन ओहदों को भेंट कर चुके हों

लेकिन हमने अपने गांव की गलियों में जैसा और जिस तरह का जीवन जिया है

वह हमारे आज के किसी भी ओहदे और पद प्रतिष्ठा से भारी है। 

आओ चलें गांव की ओर 

अगर आप ने इस तस्वीर को पहचान लिया है तो मुझे

पूरा विश्वास है कि आपने और भी बहुत कुछ अपने जेहन से निकाल लिया होगा।

आप इस तस्वीर में एक पिरामिड जैसी आकृति को देख रहे हैं

उसे हम अपने जमाने में बठिया कहते थे।

होता यह था कि हमारी अम्मा और अगल बगल की

काकी, बड़ी अम्मा, दाई, आजी जो भी महिलाएं थीं सभी जाड़े के दिनों में

सुबह का घरेलू काम करने के बाद और दोपहर के भोजन के पहले

कन्डा पाथने पथरउड़ा जाती थीं ।

इस काम के लिए घर से दूर और गांव के किनारे एक अघोसित रिजर्व जगह होती थी

जिसमे गोबर के उपले यानी कन्डा बनाने अथवा पाथने का काम होता था।

हमारी अम्मा और बाकी लोग हम बच्चों से या घर के बड़ों से इसके लिए

जानवरों का गोबर पहले ही सुबह उठते ही सबसे पहले भिजवा देती थीं।

जब सुबह का घर का काम बूत निबट जाता था तो

मुहल्ले की सभी बुजुर्ग और लगभग बुजुर्ग सभी इस

काम के लिए  हांथ में एक बाल्टी पानी लेकर निकल जाती थी। 

और फिर तैयार होती थी प्रापर्टी कुछ इस तरह 

दोस्तों, यह जो चित्र अब आप देख रहे हैं यह साधारण चित्र नहीं

बल्कि यह किसी जमाने में गांव की जिन्दगी हुआ करता था।

चूंकि सभी के घर मिट्टी के ही होते थे इसलिए जैसे ही बारिश खत्म होती थी

और क्वांर,कार्तिक के महीनों की शुरुआत होती तो

हम सब मिल कर अपनी प्रापर्टी को सजाने संवारने और बनाने में जुट जाते थे।

गांव में बिरला ही ऐसा घर होता जहां की औरतें या बेटियां इस तरह

जुगाड़ करके खरउटन न लगाती हों।

ये महिलाएं खास मिट्टी में एक खास अनुपात में गोबर

मिला कर खरउटन तैयार करके बारिस से क्षति ग्रस्त हुई दीवारों पर लगा रही है।

दशहरा, दीवाली के आसपास इस तरह के सीन गांव की हर मुहल्ले की

हर गली के हर घर में देखे जाते थे। 

दोस्तों लिपाई पुताई और खरउटन के बाद कुछ पल सुकून के भी मिलते थे

जब शाम को आंगन जिसे हम तब अंगनई कहते थे वहां पर

सभी घर के लोग खटिया बिछाकर आराम करते थे।

वैसे आपको बता दें कि इस खास समय में चने की बहुरी

या फिर गादा की कोहरी या फिर बाजरा उर्फ लेहर्रा की बाली भून कर खाने में बहुत मजा आता था ।

कभी कभी तो झरबेरी के बेर का ही महोत्सव हो जाता था और हाँ

अगर हम चुन्नू  बच्चा  रबूदे, रहिमाल, राधे, रामू के साथ कभी खलवा की तरफ ब्यार खाने जाते तो

ऊंख यानी गन्ना, शकरकंद, सिंघाड़ा, लाना नहीं भूलते थे।

हां यहां एक बात स्पष्ट कर दूं कि हम जो भी लाते थे कभी कभी बस यूं ही चिटका कर लाते थे।

रामू अक्सर ब्यार कहां हैं यह खोज बीन जारी रखता था फिर हमारा बैच

सत्ती चौरा से लेकर ढोलबजा और खलवा तक की खोज खबर ले लेता था। 

अम्मा के हांथ की हंथपई 

मेरे गांव की पुरानी बातें बड़ी ही खूबसूरत हैं।

इन खूबसूरत और यादगार बातों में अम्मा के हांथ की बनी ज्वार बाजरा और बेर्रा की वो रोटियां हैं

जिन्हें हम नमक तेल खटाई के अलावा दूध से बड़े ही चाव से खाते थे।

हां बहनों भाइयो तब दाल भात तो होता था पर सब्जी और चावल कम ही कोई बोलता था।

गैस स्टोव तक आम नहीं था कंडे और लकड़ियों से तब चूल्हे में खाना बनता था।

चक्की या मील का शक्ति भोग आटा की जगह तब

ज्यादातर घरों में लोग जांत  में ही पिसे आटे को अपना प्यार समर्पित करते थे।

आप सच मानिए तब इतने रोग भी आदमी को नहीं होते थे।

दिन भर घर बाहर के काम के बाद तब महिलाएं घर में ही पिसे आटे पर भरोसा करती थीं।

दूध ही उस समय सबसे बड़ा सालन था।

दोस्तों आज की तरह मैगी या छोला भटूरा की जगह

तब अगर अम्मा के हांथ की हंथपई मिल जाती थीं तो सचमुच स्वर्ग उतर आता था। 

बात रतन जतन की भी

मेरे गांव की पुरानी बातें बड़ी ही अर्थ पूर्ण और भावपूर्ण भी हैं।

आप जिस तस्वीर को देख रहे हैं वह तब हर घर के लिए आम बात थी।

दूध दही की नदियाँ तो हलांकि नहीं बहती थीं लेकिन लगभग हर घर में

गोरू,  चउवा यानी कोई न कोई जानवर जरूर होता था ।

क्योंकि यह कहीं न कहीं प्रतिष्ठा की भी बात थी क्योंकि कहा यह भी जाता था कि

घर में अगर जानवर नहीं तो लीपने पोतने को आदमी तरसता है।

खैर इस तस्वीर की बात करें तो नानी दादी काकी अम्मा काकी या बड़ी अम्मा सभी हर दिन 

दही से मक्खन और छाछ निकालने का काम बड़े ही उत्साह से करती थीं।

इसे हम माठा भांना भी कहते थे।हम तो अक्सर बुद्ध राज भइया की अम्मा के पास या फिर

सुबेदार काका के घर माठा लेने पहुंच जाते थे।

मजेदार बात यह थी कि आज किसी और के घर से

माठा मांगकर लाने में शर्म आती है और हम तब बड़ी सहजता से माठा मांग लाते थे। 

आपको भी याद होगा जब मक्खन निकालने का काम पूरा होने वाला होता था

तो हमारी आपकी अम्मा नानी काकी चाची ताई इस चित्र की ही तरह

मथानी एक तरफ ओढ़का कर मटकी से नेनू निकालकर हमें

या फिर अपने अपने नाती नतकुरों को बड़े ही प्यार से खाने को देती थीं

और साथ ही साथ खूब आशीष भी देती थीं।

मुझे याद है शिवमंगल काका की अम्मा हमें भी खूब

खाने को देती थीं अगर हम कभी माठा लेने राधेश्याम के घर चले जाते थे ।

आप इसे अन्यथा न लें हम कभी कभी अपने घर माठा लाने के बाद

अम्मा के साथ इस बात की समीक्षा भी किया करते थे

कि किसका माठा पतला होता है और किसका माठा गाढ़ा। 

तैयारी तीजा की हमारी काकी के घर  में 

मेरे गांव की पुरानी बातों में सब से मजेदार और खास बात यह है कि

हम अमौली वाली काकी के यहां सुबह से शाम तक खेला कूदा करते थे ।

हमें और मजा तब आता था जब सब जगह से खदेड़े जाने वाला हमारा बैच

अक्सर अम्मा काकी चाची और दाई यानी आजी उर्फ ग्रांड मदर के लिए बहुत ही प्यारा हो जाता था।

दोस्तों आप ज्यादा मत सोचिए आपको बता दें कि तब

सेंवईं बनाने का नया नया आविष्कार लोहे के एक पेंच के रूप में हुआ था, 

जिसे किसी मजबूत खटिया में फिट कर दिया जाता था।

इसी में आटा या मैदा को गूंध कर उसकी छोटी छोटी लोई बना कर पेंच में डाली जाती थीं।

अब बारी होती थी उस पेंच में लगे हैंडल को घुमाने की

जो आटा या मैदा की लोई के कारण बहुत वजन घूमता था।

बस, इसे घुमाने के लिए हमारी मंडली की लगभग मान मनौवल तक की जाती थी ।

हम भी अपने कौशल का बेहतरीन प्रदर्शन करने की गरज से जान लगा देते थे

जिसके कारण अढइया पसेरी नहीं कभी कभी तो चार चार पसेरी की

सेंवईं इस पेंच से निकाली जाती थीं।

यह सब तीजा के पहले हो जाता था क्योंकि तीजा में हमारे यहां दूध की सेंवईं ही खाई जाती थीं। 

खरी खोटी और खलिहान 

मेरे गांव की पुरानी बातें सचमुच मेरे देश की ही बातें हैं क्योंकि

यह आप भी जानते हैं कि कोई क्षेत्र विशेष सभ्यता तय नहीं करता

बल्कि सभ्यता तय करने का काम हम नहीं जमाना किया करता है।

तो दोस्तों,, जो तस्वीर आप इस समय देख रहे हैं यह आज की अद्भुत तस्वीर है।

अगर यह कहा जाए कि यह तस्वीर दुर्लभ और अद्भुत है तो भी

कोई अलग बात या अतिशय नहीं होगी ।

आज जब भी फसलें तैयार होती हैं तो इन्हें काटने कूटने के लिएपंजाब हरियाणा से

ऐसी ऐसी मशीनों की आश्चर्य जनक आवक होती है कि बड़ा ही विस्मय होता है।

आज के जैसे तब थ्रेसरिंग की सुविधा कतई नहीं थी इसीलिए

तब महीनों लोग गांव के बाहर बने खलिहान में खरीखोटी

एक दूसरे को सुनाते हुए बिता देते थे।

यह सीन बताता है कि फसलों को खलिहान में बैलों के जरिए माड़ा जाता था।

यानी किसी भी फसल को खलिहान में फैला दिया जाता था। 

फिर उसमें बैलों को घुमाया जाता था तब फसल छोट छोटे टुकड़ों में बंट जाती थी

इसके बाद अनुकूल हवा चलने पर फसल को ओसाते हुए साफ कर लिया जाता था। 

हमारा बुद्धि विकास केंद्र 

 

 

 

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 13102018

 

 

 

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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2 Comments on “मेरे गांव की पुरानी बातें”

    1. बहुत याद आता है सब कुछ पर क्या करें
      लिख कर ही जी हल्का करते हैं

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