मी टू हकीकत या हंगामा?

मी टू हकीकत या   हंगामा? 

मी टू हकीकत या हंगामा?

इस सवाल का असली जवाब आज हर व्यक्ति जानना चाहता है।

कुछ लोगों की नजरों में मी टू एक अनंत काल से पृथ्वी के नीचे दबा हुआ वह ज्वाला मुखी है, 

जिसे पूर्व मिस इंडिया और अभिनेत्री तनु श्री दत्ता ने

अपनी सालों की चुप्पी तोड़ कर बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया है। 

तो कुछ लोगों को लगता है यह एक ऐसा षडयंत्र है जो बिना किसी खास मकसद के ही

इस लिए चलाया जा रहा है कि चलो इसी बहाने ही सही खबरों की खबर तो बनें ही रहेंगे।

मी टू आज सोशल मीडिया की सबसे बड़ी खबर है जिसमें

एक से एक नामचीन व्यक्तियों पर हर दिन हंगामेदार खुलासे हो रहे हैं

तो  दूसरी तरफ मीटू एक ऐसा बवंडर है जो हर दिन किसी न किसी महिला की आपबीती के बहाने

समाज में चल रही अंधेर गर्दी के सुबूत पेश करने की कोशिश करता है। 

मी टू के मायने क्या   हैं? 

मी टू मूलतः अंग्रेज़ी के दो शब्दों मी और टू शब्दों को लेकर मीडिया द्वारा रचित शब्द है

जिसका अर्थ होता है “मैं भी”।

इसके संदर्भ सहित प्रसंग और भावार्थ की बात करें तो

जब से तनु श्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर यौनिक दुर्व्यवहार का आरोप लगाया है

तब से हर वह महिला जो कभी न कभी इसी तरह की स्थिति का सामना मन मसोस कर कर चुकी है

वह यह बताने के लिए कि मैं भी इसी कंडीशन की शिकार हूं तो वह जो भी बयां करती है

उसे मीटू अभियान का हिस्सा मान लिया जाता है।

इसे मीडिया का सौभाग्य कहें या विडम्बना कि बिना असलियत जानें

सोशल मीडिया में किसी भी अच्छी बुरी बात को आग की तरह फैलते देर नहीं लगती ।

इतना ही नहीं जैसे ही खबरों की आग का ज्वालामुखी फटता है

तो सच झूठ का विचार बाद में होता है पहले सब कुछ स्वाहा की तर्ज पर राख हो जाता है।

क्या इसे हम तार्किक और सभ्य दुनिया में ठीक कहेंगे?

शायद नहीं,

क्योंकि जहां एक तरफ आरोप लगाने वालों की बाढ़ है

तो वहीं दूसरी तरफ आरोपों को फिजूल बताने वालों की कमी नहीं है। 

मी टू की असल   कहानी 

मी टू की असल कहानी तब शुरू होती है जब दस साल

पहले फिल्म हार्न ओके प्लीज के आइटम सांग नथनी उतारो

की सूटिंग के दौरान तनु श्री दत्ता ने अभिनेता नाना पाटेकर पर

यौनिक दुर्व्यवहार  के आरोप लगाए थे।

तनु श्री दत्ता तो आगे भी कहती हैं कि जब वह फिल्म चाकलेट की सूटिंग कर रही थीं

तब फिल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने उनसे कपड़े खोल कर नाचने को कहा था।

मी टू का यह सिलसिला तनु श्री दत्ता के बाद लगातार आगे बढ़ रहा है

जिसमें सच है या झूठ पर एक से एक अप्रत्याशित हंगामेदार खुलासे हर पल हो रहे हैं।

कंगना रनौत  सपना पब्बी मौनी राय पूनम पांडे जहां

मीटू को हंगामेदार बना रही हैं तो सुजैन खान फराह

खान और पूजा भट्ट जैसी स्थापित सख्शियतें इन्हें अस्वीकार कर रही हैं। 

किसने किस पर क्या   आरोप लगाया? 

मी टू अभियान अब तूफान का रूप धर चुका है।

अमेरिका से चले इस तूफान में अब तक अमेरिका और भारत की सैकड़ों महिलाएं

अपनी अपनी हाजिरी अपने अपने आरोपों और अपने अपने तरीकों से  दर्ज कर चुकी हैं।

ये महिलाएं ट्विटर को अपना कारगर हथियार बना

कर अपने साथ हुए असहज व्यवहार को सिद्दत से बयान कर रही हैं।

जैसा कि आप सब जानते हैं कि इस कड़ी में नाना पाटेकर आलोक नाथ 

जैसे कलाकार फंसे हैं तो निर्देशक विवेक अग्निहोत्री और विकास बहल के भी नाम हैं।

एम जे अकबर, विनोद दुआ जैसे पत्रकार व प्रशासक फंसे हैं

तो अर्जुन रणतुंगा और लसिथ मलिंगा जैसे अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों के अलावा

बी सी सी आई के सी ई ओ राहुल जौहरी को भी इस सच्चे झूठे मामले ने

अपनी गिरफ्त में ले लिया है। 

इतना ही नहीं एक महिला लेखक ने तो राहुल जौहरी पर करीने से जो आरोप लगाए हैं

वह बेहद सोचनीय और अनैतिकता की पराकाष्ठा हैं।

जौहरी पर महिला लेखिका आरोप लगाते हुए बताती हैं कि

जब जौहरी डिस्कवरी नेटवर्क में काम करते थे तब उन्होंनें मेरे साथ

नौकरी दिलाने के नाम पर अपने घर ले जा कर गलत हरकत की थी और मैं बेबस थी।

मी टू की आग में बालीवुड के दो डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा और विकास सदाना भी जलने लगे हैं। 

दूसरी तरफ आलोक नाथ ने अपने ऊपर आरोप लगाने

वाली वनिता नंदा और संध्या मृदुल के खिलाफ मानहानि का केस दर्ज कर दिया है। 

समर्थन में भी विरोध में भी 

ध्यान देने वाली बात यह है कि मी टू अभियान का

कुछलोग समर्थन कर रहे हैं तो कुछ लोग इसका विरोध भी कर रहे हैं।

तनु श्री दस सालों तक चुप रहीं लेकिन आज जब उन्होंने आरोपों की बारिश की है

तो उनके समर्थन में अनुष्का शर्मा, प्रियंका चोपड़ा वरुण धवन,

सिद्धार्थ मल्होत्रा, कंगना रनौत, सपना पब्बी, पूनम पांडे और मौनी राय नजर आ रही हैं।

ऐसा नहीं है कि महिलाएं सिर्फ आरोप लगाने वालों के ही साथ हैं, 

कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने मी टू को नकारने का भी सिलसिला प्रारंभ कर दिया है।

इनमें प्रमुख हैं फराह खान, पूजा भट्ट तथा सुजैन खान।

इस मामले में बोलते हुए सुजैन खान कहती हैं कि

आजकल जो मी टू के जरिए आरोप लगाए जा रहे हैं उन आरोपों में बहुत से आरोप झूठे हैं ।

आखिर सच्चाई क्या   है? 

मी टू हकीकत या हंगामा?

अगर हम आरोप प्रत्यारोप लगाने वालों की तरफदारी न करके

शुद्ध निष्कर्ष निकलने की कोशिश करें तो हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते हैं कि

स्त्री और पुरुष में कौन विश्वसनीय है और कौन अविश्वसनीय है।

हकीकत यह है कि दोनों विश्वसनीय हैं, साथ ही दोनों अविश्वसनीय हैं।

इस कथन का तात्पर्य यह नहीं है कि इस पोस्ट में मी टू को खारिज किया जा रहा है।

बल्कि पूनम पांडे जैसी महान अभिनेत्रियों की बाबत यहां पर

यह समझाने की कोशिश भी की जा रही है कि  अक्सर बहती गंगा में

लोग हांथ धोना ज्यादा पसंद करते हैं।

जिनके चरित्र का ठीकठाक खुद पता नहीं होता वह

खानदानी छानबीन में पारंगत होते हैं।

दुनिया ऐसा भी मानती है।

सोचनीय बात यह है कि जब कोई कानूनी साक्ष्य न हो तो नियम नहीं

नीयत का पैमाना काम आता है।

यदि हम एक तरफ पुरुष की लोलुपता से परिचित हैं

तो दूसरी तरफ की सच्चाई यह भी है कि हम महिलाओं की महत्वाकांक्षी प्रवृति से भी परिचित हैं।

इतना ही नहीं मी टू जिस तरह आज महिलाओं के लिए उनकी पीड़ा बाहर निकालने का जरिया है

तो बहुत सम्भव है कि किसी दिन सी टू के जरिए अपनी पीड़ा का बयान वह पुरुष भी करें

जो अपनी मेहनत और लगन के बाद भी अपने बास से कभी

उस महिला की वजह से तवज्जो नहीं पा सके जिसे

यह पता था कि

वह केवल कर्मचारी नहीं बल्कि वह एक महिला कर्मचारी है। 

चेतन भगत का संकेत

जिस तरह से आलोक नाथ और फिर एम जे अकबर ने मामले को कानूनी शक्ल दी है

और उसके बाद चेतन भगत की स्क्रीन शाॅट वाला मामला सामने आया है,

सुजैन खान की बात सही लगती है कि अधिकांश आरोप गलत हैं।

इतना ही नहीं एडवोकेट देविका सिंह की बात भी सही लग रही है कि

इस तरह कानूनी साक्ष्य के बिना ही आरोप लगाना अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा है।

क्योंकि यह बात ठीक उसी तरह साफ है कि एक बार एक राज कुमार को पकडने के लिए

कुछ चुड़ैलों ने उसके घोड़े की पूछ पकड़ लिया तो एक चुड़ैल 

जो राजकुमार से प्रेम करती थी उसने राजकुमार को याद दिलाने के लिएअपनी सहेलियों से कहा

बच के रहना बहन कहीं राजकुमार घोड़े की पूंछ ही न काट दे।

बस फिर क्या था राज कुमार ने तुरंत वही किया और बच के भाग गया।

वही हाल इधर भी संभव है, जिनके पास कानूनी साक्ष्य नहीं हैं वह खुद ही फंस जाएं। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 15102018

 

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मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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2 Comments on “मी टू हकीकत या हंगामा?”

  1. मी टू में बयां अधिकांश घटनाएं ऐसी हैं जिसमें स्त्रियाँ स्वेच्छा से या अपनी किसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए समर्पण किया था | इतने वर्षों बाद पुनः घटना को उजागर करके और कोई फायदा उठाना चाहती हैं, अन्यथा जो आज उन्हें गलत लग रहा है वो पहले भी गलत था और गलत को सजा देने के लिए पहले भी कानून व्यवस्था थी |

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