जीवन में खुशियां कब कहां और कैसे मिलती हैं?

जीवन में खुशियां कब कहां और कैसे मिलती हैं? 

जीवन में खुशियां कब कहां और कैसे मिलती हैं?

यह बेहद साधारण सा सवाल लगता है लेकिन आपको ताज्जुब होगा कि

जब आप थोड़ा गहराई से इस सवाल और इसके जवाब पर विचार करेंगे

तो आपको यह सवाल कि जीवन में खुशियां कब कहां और कैसे मिलती हैं,

कतई साधारण सवाल नहीं लगेगा।

हो सकता है आप यह भी हुज्जत करें कि नहीं यह कतई असाधारण सवाल नहीं है

क्योंकि दुनिया की सारी खुशियां आज उसके लिए उपलब्ध होती हैं जो पैसे वाला है।

दोस्तों, आपने यह जरूर सुना होगा कि रुपया खुदा नहीं है

लेकिन आजकल यह मुहावरा बदल गया है 

लोग अब इस मुहावरे को कुछ इस तरह कहने और सुनने लगे हैं कि

हां यह बात बिल्कुल सच है कि रुपया खुदा नहीं है लेकिन आज यह भी सच है कि

अगर रुपया खुदा नहीं है तो खुदा से कम भी नहीं है।

इस नए मुहावरे  का मन्तव्य यही है कि आज रुपये पैसे से दुनिया की

लगभग सभी चीजें खरीद सकते हैं।

यहाँ तक की आज खुशी भी धन से खरीदी जा सकती है।

दोस्तों, आप भले ही इस बात को मानते हों कि गर पैसा खुदा नहीं है तो खुदा से कम भी नहीं है

लेकिन मैं इस बात को नहीं मानता।

इतना ही नहीं मेरा तो यह भी मानना है कि खुशी कहीं से भी

या किसी भी तरीके से खरीदी नहीं जा सकती ।

जीवन में खुशियां कब कहां और कैसे मिलती हैं?

इसी बात पर चर्चा करना इस पोस्ट का लक्ष्य है।

दोस्तों, जीवन में खुशियां कब कहां और कैसे मिलती है?

यही आपको बताना है भले ही इसके लिए आप मुझे कुछ भी कहें।

दोस्तों, कौन है इस संसार में जो अपने खुद के जीवन में खुशियां नहीं चाहता? 

इसी तरह कौन है इस संसार में जिसे उसके जीवन में कभी दुख नहीं मिला?

इन दोनों सवालों के जवाबों के साथ साथ मैं आपको अपनी पोस्ट में

यह भी बताऊंगा कि जीवन में खुशियां कब कहां और कैसे मिलती हैंं?

बस, आप मेरे साथ अंत तक बने रहिए और

अपने तमाम सवालों के तमाम जवाब जानने के पहले एक छोटी सी कहानी पर गौर कीजिए।

सुनिए कहानी खुशी की 

एक बार एक महान विचारक संत अपने एक शिष्य के साथ घूमने निकले थे।

दोनों ने रास्ते में देखा कि एक जगह खेत की मेड़ में किसान के फटे जूते  रखे हुए हैं।

चूंकि किसान खेत के अंदर पानी में घुस कर काम कर रहा था

इसलिए यह सब अंदाजा लगाने में किसी को जरा भी दिक्कत नहीं गई।

लेकिन तभी शिष्य को एक मसखरी सूझी उसने अपने गुरु से कहा, 

गुरू जी क्यों न हम इस किसान के जूतों को छिपा दें और फिर

यह देखने की कोशिश करें कि आखिर यह कैसे इधर-उधर जूते ढूढने में परेशान होता है?

गुरु जी मेरे ख्याल से बहुत मजा आएगा जब हम किसान को 

जूतों के लिए इधर-उधर बेचैन, बदहवास होकर घूमता हुआ देखेंगे।

गुरु जी अपने शिष्य की बात सुनकर सन्न रह गए। 

क्यों कि उन्हें यह तो पता था कि यह मंद बुद्धि है लेकिन इतनी मंद बुद्धि का है

यह कतई पता नहीं था।

खैर, गुरु जी ने उसे सुधारने के लिए और साथ ही साथ बहुत कुछ समझाने के लिए बोले, 

“बेटा जो तुम बता रहे हो उससे किसान परेशान हो सकता है।

इस लिए मेरा ख्याल है तुम्हें कुछ और करना चाहिए जैसे

हम क्यों न किसान के जूतों में 100 – 100 के दो नोट डाल दें, 

फिर छिप कर देखते हैं कि किसान तब कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा।”

शिष्य ने ऐसा ही किया और फिर गुरु शिष्य छिप कर देखने लगे।

जैसे ही किसान को जूतों में 100 – 100 के दो नोट मिले वह तुरंत जमीन में झुक गया।

किसान ने जमीन को चूम कर हांथ जोड़कर ऊपर आकाश की ओर इस तरह बुदबुदाया,

” हे ईश्वर तेरा लाख लाख शुक्रिया, तूने किसी मसीहा को

मेरी सहायता के लिए भेज कर मेरे परिवार को बचा लिया 

अब मैं इस पैसे से अपने परिवार को भरपेट भोजन खिला सकूंगा।

अब मेरा परिवार खूशी महसूस करेगा। 

कहानी क्या कहती है? 

कहानी यह कहती है कि यह हमारा आपका भ्रम है कि हम

किसी को तकलीफ देकर खुशी हो सकते हैं।

या रुपए पैसे की ताकत से खुशी खरीद सकते हैं जबकि

हकीकत यह है कि हमें खुशी किसी और की मदद  करने से ही मिलती है।

सबसे बड़ी खुशी इस पूरे संसार को तभी मिल सकती है,

जब सबसे पहले हम इस बात को स्वीकार कर लें कि हमें सबसे पहले खुद को सुधारना है, 

बाद में किसी और को सुधारेंगे।

हकीकत यह है कि हम सबसे पहले दुखी तभी होते हैं

जब किसी दूसरे से अपेक्षा करने की बीमारी से ग्रसित हो जाते हैं।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हम जब भी किसी और से अपेक्षा करते हैं

तो सबसे पहले अपना ही नुकसान करते हैं इसलिए

किसी और से अपेक्षा न करके हमें खुद किसी की अपेक्षा बनना चाहिए। 

जीवन में खुशियां ही खुशियां 

जैसे अगर आप किसी आटा छानने वाली छन्नी में दूध निकालेंगे तो

दूध किसी बर्तन में न जाकर  सीधा जमीन में गिरता है।

तब हमें यह बात पता चलती है कि हमें दूध के लिए उचित बर्तन की जरूरत होती है।

यही उचित बर्तन वाली बात जिंदगी में भी लागू होती है जिसका मतलब यह हुआ कि

संसार में खुशियां भी उसी को मिलती हैं जो खुशियों के ठहरने के लिए उचित स्थान बनाकर रखता है।

अगर आप खुद को बहुत चालाक समझते हैं और

साथहीही साथ बहुत होशियार भी समझते हैं तो जान लीजिये आप खुश नहीं रह सकते।

आपको खुशियां तभी मिल सकती हैं जब आप दूसरों को भी तवज्जो देने की कला सीख लेंगे।

यदि आप किसी और को सम्मान या महत्व  देना प्रारंभ नहीं करते तो आप इस बात को

लिख कर रख लीजिए कि आप जीवन भर खुशियां नहीं हासिल कर सकते।

आपको खुशियां तब ही मिल सकती हैं जब आप किसी और की खुशी के

माध्यम या फिर कारण हों  ताकि किसी और को आपके जरिए खुशियां मिल सकती हों। 

जीवन में खुशियां उसी को मिलती हैं जो खुशी पाने लायक होता है।

खुशी पाने लायक वही होता है जो दूसरों की खुशियों की भी चिंता करते हैं।

दूसरों की खुशियों की चिंता वही करते हैं

जिनका जीवन सचमुच सीखने लायक होता है या अनुकरणीय होता है।

अनुकरणीय वही होते हैं जो महान होते हैं।

महान वह होते हैं जो खुद से ज्यादा समय और समाज की करते हैं।

क्योंकि जीवन में खुशियां कब कहां और कैसे मिलती हैं?

इस सवाल का यही जवाब है।

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 03112018

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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