हैप्पी न्यू ईयर मनाएं मगर कैसे?

हैप्पी न्यू ईयर मनाएं मगर कैसे? 

हैप्पी न्यू ईयर मनाएं मगर कैसे?

यह एक सवाल नहीं बल्कि सवाल से कहीं ज्यादा सुझाव और संकल्प प्रतीत होता है।

जरा विचार करके देखिए जब हम कहते हैं सूरज निकल आया

तो क्या सच में सूरज निकलता है?

जब हम कहते हैं कि चांद निकल आया तो क्या सच में चांद कहीं से निकलता है?

इन दोनों सवालों के जवाब यही हैं कि नहीं बिलकुल नहीं।

सवाल उठता है क्या सच में सुबह होती है और क्या इसी तरह रात भी सच में होती है?

जरा विचार करें तो इस बात पर भी विचार करने का मन करता है कि

क्या सचमुच सर्दी और गर्मी की ही तरह मौसम भी आते और जाते हैं?

एक ही वाक्य में इन सवालों के साथ साथ इनके ही

जैसे सैकड़ों सवालों का एक ही जवाब है और वह है नहीं नहीं बिलकुल नहीं।

जीवन की और इन तमाम सवालों की सच्चाई कुछ और ही है। 

 

क्या है हमारे जीवन और जिंदगी की सच्चाई? 

हमारे जीवन और जिंदगी की सचमुच की सच्चाई यही है कि सच्चाई कुछ और है।

जी हां दोस्तों, हम समझते जरूर हैं कि सूरज और चांद निकलते और डूबते हैं,

हम यह समझते हैं कि दिन होता है इसके बाद रात होती है,

लेकिन अगर आप यह कहें कि यह सभी तथ्य सास्वत सत्य हैं तो यह हमारी भूल है 

हकीकत यही है कि न तो कभी  सूरज निकलता है और न ही कभी चांद निकलता है

न तो कभी सूरज डूबता है और न ही कहीं चांद छिपता है।

इसी तरह हमारे जीवन की सच्चाई यही है कि न तो कभी दिन होता है न ही कहीं रात होती है।

इन सबकी सचमुच की सच्चाई यही है कि यह सब हमारी अपनी

समझ की वजह से प्रतीत मात्र होते हैं।

यह सब हमें घटित होते महसूस होता है जबकि घटता कुछ भी नहीं। 

जरा सोचिए कुछ इस तरह 

मेरे प्रिय पाठकों हकीकत यह है कि जब आप कहते हैं कि पांच बज गए या 10 बजे हैं

तो यह बात भी सही नहीं होती न कभी पांच बजते हैं न कभी दस बजते हैं।

आप कहेंगे कि जब दिन रात नहीं होते, सूरज चांद नहीं डूबते निकलते साथ ही साथ

जब पांच या दस नहीं बजते तो फिर आखिर होता क्या है या फिर

इन सब बातों का वास्तविक मतलब क्या है?

दोस्तों और मेरे पाठकों हकीकत यह है कि यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड सदैव चलायमान है

और हम केवल इसे अपनी सुविधा के लिए विभिन्न नामों से जानते हैं।

जैसे पृथ्वी अपने अक्ष में घूमती है और साथ ही साथ सूर्य का चक्कर भी लगाती है।

पृथ्वी के अपने अक्ष में घूमने से दिन रात होते हैं तो सूर्य के परितः घूमने से

सर्दी गर्मी बरसात आदि मौसमों का परिवर्तन होता है। इसी तरह बांकी चीजों की सच्चाई है। 

क्या 1जनवरी को हैप्पी न्यू ईयर मनाएं? 

एक जनवरी को पूरी दुनिया सुविधा के कारण नए साल का आगमन कहती और समझती है, 

जब कि हकीकत यह है कि कोई नया साल न आता है और न ही कोई पुराना साल विदाई लेता है।

सत्य यह है कि पूरी दुनिया में अपने अपने देश कल और परिस्थितियों के हिसाब से

नया और पुराना  साल कहने और समझने की प्रवृति पाई जाती है।

यहां अपने अपने देश काल परिस्थिति और प्रवृति को जरा ध्यान से समझने की जरूरत है।

दोस्तों कहते हैं कि नकल में भी अगर अक्ल की कमी हो तो वह भी किसी काम की नहीं होती।

यहां उदाहरण के लिए हम सरकारी प्राईमरी स्कूल का उदाहरण लेते हैं।

सरकारी स्कूलों को तथाकथित बुद्धि मान अफसर गाइड करते हैं

अतः जब वे जनता के मन में प्राईवेट स्कूलों की ललक को नहीं कम कर पाए

तो पैर उठाकर उनकी बराबरी करने वाहियात तर्कों के भरोसे मैदान में आ गए।

 

 

हैप्पी न्यू ईयर और हम 

देखा देखी में सरकारी स्कूलों ने अपना सत्र परिवर्तन कर दिया ।

पहले जुलाई से स्कूल खुलते थे जिसे बदलकर नए नए बुद्धिमान लोगों ने अप्रैल कर दिया।

भाइयों बहनों मेट्रो सिटी में सबके पास जो भी काम होता है

वह खेती किसानी के अलावा दूसरे काम होते हैं अतः

इनके लिए सरकारी साल के हिसाब से खुद को ढालना आसान होता है। 

मसलन् अप्रैल में ही उन्हें नए नए वेतनमान की सौगात मिलती है।

छुट्टी भी तब ही मिलने का समय होता है जबकि

ग्रामीण इलाके में खेती किसानी का काम अप्रैल में होता है

इसलिए जून में शादी विवाह के बाद फुर्सत से जुलाई में पढाई लिखाई आसान लगती है।

कहने का मतलब यह है कि मार्च अप्रैल शहरी प्रवृति

के लिए तो जून जुलाई ग्रामीण परिवेश के लिए अनुकूल बैैठते हैं।

यही कारण है कि गांवो में शादी विवाह के बाद ही जब जुलाई आती थी तो

अनायास ही स्कूल चमक जाते थे, 

पर बराबरी करने के लिए जब से गांव के स्कूलों में सत्र परिवर्तन हुआ है

तो मानों सब चैन सुख खो गया है ।

न अप्रैल में लोगों के पास खेती किसानी नातेदारी से फुर्सत होती है न ही स्कूल का ध्यान आता है। 

इस उदाहरण से क्या सीखें? 

इस उदाहरण से हमें यह सीखना है कि हमें अपने

कारणों से अपनी प्राथमिकता तय करनी है न कि पड़ोसी को देख कर।

हमारे देश में नए साल  जैसा परिवर्तन चैत्र मास में तब तय किया गया था

जब प्राकृतिक दृष्टिकोण से इस माह में जीवन के लिए सबसे अहम

भारतीय खाद्यान्न की आवक प्रारंभ होती है ।

हमारे लिए भारतीय परिवेश में एक जनवरी किसी भी

सामाजिक और तार्किक दृष्टि से नए साल की शुरुआत प्रतीत नहीं होती।

इसके बावजूद तथाकथित पढे लिखे और सभ्य लोग पागल हुए जा रहे हैं

सेंटा की अगुवानी और ग्रेगेरियन कैलेंडर को गले लगाकर

हैप्पी न्यू ईयर के धंधे में कंधे से कंधा मिलाकर बेवकूफी करने के लिए।

अरबों खरबों का न्यू इयर में धंधा करने वाले भारतीय शायद ही इस बात को

कभी समझ सकते हैं कि  हमारे देश और देश की

भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल नहीं है 1जनवरी का हैप्पी न्यू ईयर,

अतः जहां तक इस बात का सवाल है कि हैप्पी न्यू ईयर मनाएं मगर कैसे?

तो मेरा सम्यक रूप से यही कहना है कि एक सबसे

ज्यादा लोकप्रिय कैलेंडर की किसी तारीख को खुशी खुशी जीने में कोई बुराई नहीं है

लेकिन जीवन की सांस्कृतिक शुरूआत हमें अपने देश के लिए

देश काल और परिस्थितियों के अनुकूल ही सोचना समझना और करना चाहिए। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 01012019

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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