पानी गए न ऊबरें मोती मानुष चून क्या सही है?

पानी गए न ऊबरें मोती, मानुष, चून क्या सही है? 

पानी गए न ऊबरें मोती मानुष चून

जी हां दोस्तों,पानी की एक एक बूंद को बचाना समय समाज और सभ्यता का सर्व प्रथम कर्तव्य है

क्यों कि आज की हकीकत केवल और केवल यही है कि अगर हम आज न संभले

तो हमें और हमारी आने वाली पीढ़ियों को अकल्पनीय अकल्पित, 

  भयंकर ही नहीं भयावह नतीजों का सामना करना पड़ेगा।

क्यों कि इसके पीछे की कहानी कम से कम भारत में यही है कि हम रेत में तूफान आने पर

रेत में ही गर्दन डालकर अपनी मूर्खता का परिचय देने वाले शुतुरमुर्ग हैं।

इसका प्रमाण यह है कि आज भारत में बहने वाली नदियों में अधिकतर के

प्रवाह तंत्र और उनकी मानक शुद्धता यानी पानी की गुणवत्ता

इस हद तक प्रभावित हुई है कि आप तथाकथित पवित्र नदियों के जल का आचमन तो दूर

स्नान की जगह केवल जल छूने से भी पहले कई बार सोचने को मजबूर होंगे।

यद्यपि हम चाहें तो अपनी इस सुलगती दुनिया को बचा सकते हैं

लेकिन हमें इसके लिए 2019 में जल संरक्षण के बारे में जरूर सोचना होगा। 

बूंद बूंद अनमोल है जल 

नल से पानी की एक बूंद प्रति सेकंड लगातार टपकने पर सालाना

2700 गैलन तक पानी बर्बाद होता है।

नल से औसतन प्रति मिनट 20 ली पानी निकलता है।

इस्तेमाल के दौरान भी इसमें से अधिकांश पानी बर्बाद होता है।

नल की जगह अगर किसी बर्तन में पहले पानी भरकर

इस्तेमाल करें तो पानी को काफी हद तक बर्बाद होने से रोका जा सकता है।

क्या आपको पता है कि पृथ्वी की सतह पर 71% जल मौजूद है।

पूरी धरती में पानी के अलावा सब कुछ 29%ही है।

विशेष बात ध्यान में रखने वाली यह है कि संसार में जितना भी पानी मौजूद है

उसमें से 96.5%पानी खारा है यानी पीने योग्य नहीं है। यह खारा जल है जिसे पिया नहीं जा सकता।

धरती में पीने योग्य पानी 

पानी गए न ऊबरें मोती मानुष चून क्या सही है?

अगर हम इस सवाल के आलोक में संसार में उपलब्ध पीने योग्य पानी की बात करें तो 

पूरे संसार में पीने योग्य पानी की उपलब्धता  महज 3.5% ही है।

ध्यान रखें इस 3.5%पीने योग्य पानी का 68%भाग बर्फ और ग्लेशियर के रूप में है, 

और इसका एक तिहाई भाग भूगर्भ जल के रूप में है।

जबकि 2%भाग झीलों और नदियों के रूप में मौजूद है।

पूरी दुनिया में पीने योग्य पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1951 में 5177 घन मीटर थी

जबकि 2025 में इसके 1341 घन मीटर ही रह जाने का अनुमान लगाया गया है।

यह आंकड़े वास्तव में जो सीधी और साफ कहानी कहते हैं वह यही है कि

हम मनुष्यों ने पानी की कीमत को अभी तक समझ नहीं पाए हैं।

हमें कहीं और जाने की जरूरत नहीं है बल्कि केवल

अपनी ही सुबह से शाम तक की दिनचर्या को ध्यान से देखने की जरूरत है।

क्योंकि अगर हमने दुनिया के इस अनमोल प्राकृतिक

वरदान को समझा होता तो आज पानी को हम कतई पानी की तरह न बहाते

और न ही आज हमें यह बहस ही करनी पड़ती कि पानी गए न ऊबरें मोती मानुष चून क्या सही है? 

3 Minutes to Start your Day Right

क्रमशः

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 09012019

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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