स्वामी विवेकानंद क्यों अद्भुत अद्वितीय बेमिसाल हैं?

स्वामी विवेकानन्द क्यों अद्भुत अद्वितीय   बेमिसाल हैं?

स्वामी विवेका नंद क्यों अद्भुत अद्वितीय बेमिसाल हैं?

सच में यह सवाल होकर भी कोई सवाल नहीं है इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि

जैसे ही हमारे सामने यह सवाल आता है हमें लगता ही नहीं कि हम किसी सवाल को पढ़ रहे हैं

बल्कि आप चाहें तो खुद स्वयं परीक्षण करके इस हेडिंग नुमा सवाल को पढ़कर देखिए

आपको यही लगेगा कि यह कतई कोई सवाल नहीं

बल्कि यह तो हमारी ही आत्मा का उद्बोधन या कहें आत्मिक स्वीकारोक्ति है।

हमारे सामने जब भी स्वामी विवेकानंद जी का वर्णन आता है तो एक सच्चाई यह भी है कि

हमारे दिल दिमाग में केवल किसी साधु संत या सन्यासी की ही छवि नहीं उभरती

बल्कि हमारी आत्मा में रची बसी स्वामी जी की वह छवि नजर आती है

जिसे हम आधुनिक भारत के महान विचारक और दार्शनिक भी कहते हैं। 

राष्ट्रीय युवा दिवस और स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानन्द जी को अभी तक दुनिया जिस रूप में जान पाई है

उसी के आधार पर हम कह सकते हैं कि स्वामी विवेकानंद जी न केवल एक संत थे,

बल्कि एक महान विचारक लेखक मानव प्रेमी प्रखर वक्ता और महान देश भक्त भी थे।

स्वामी एक ऐसे भारत प्रेमी थे कि वे भारत भूमि पर अपने जन्म को

अपना परम सौभाग्य समझते थे।

यह हमारे आपके लिए सौभाग्य की बात है कि स्वामी

विवेकानंद जी का विश्वास था कि भारत वर्ष ही धर्म और दर्शन की जन्मभूमि है।

स्वामी विवेकानन्द जी को अपने देश भारत में इस लिए भी सदैव गर्व रहता था

क्योंकि उनका मानना था कि भारत ही वह भूमि है जहां पर

बड़े बड़े महात्माओ और ऋषियों का जन्म हुआ है।

यह भारत भूमि सन्यास और त्याग की अद्भुत अद्वितीय और बेमिसाल भूमि है। 

 

स्वामी विवेकानन्द एक परिचय 

स्वामी विवेकानन्द का मूल नाम नरेंद्र नाथ दत्त था।

इनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था।

भारत के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विवेकानन्द मूलतः संन्यासी  योगी और सुधारक थे।

स्वामी विवेकानंद जी का जन्म एक बंगाली परिवार में हुआ था।

स्वामी विवेकानंद जी कोलकाता के एक योगी पुजारी राम कृष्ण परम हंस के शिष्य थे।

स्वामी विवेकानंद जी ने सितम्बर 1893 में अमेरिका

में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था

और यहीं पर अपने धर्म जनित भाषण में पूरे विश्व को

आकर्षित करते हुए हिन्दू धर्म के कौतूहलों से भर दिया था ।

स्वामी विवेकानंद जी 1896 में इंग्लैंड भी गए थे जहां पर बहुत लोग इनके शिष्य बन गए थे।

इन्ही शिष्यों में इनकी एक शिष्य थीं मार्गरेट नोबुल

यानी सिस्टर निवेदिता जो भगिनी निवेदिता भी कहलाती थीं।

विवेकानंद जी का समग्र चिंतन 

स्वामी विवेकानंद जी भारत लौटने पर 1897 में कोलकाता के वेलूर में

अपने गुरु राम कृष्ण परम हंस की स्मृति में राम कृष्ण मिशन नामक एक

सामाजिक सेवा संस्थान खोला था।

स्वामी विवेकानंद जी ने इस संस्थान का दूसरा मठ अल्मोड़ा के

मायावती नामक स्थान में खोला था।

स्वामी विवेकानंद जी 1898 में जब दोबारा अमेरिका गए तब उन्होंने

सैन फ्रांसिस्को में एक वेदांत अध्ययन केंद्र वेदांत

सोसायटी तथा राम कृष्ण मिशन की एक शाखा की स्थापना की थी।

स्वामी जी के एकमात्र जीवन दर्शन की बात करें तो इनका प्रमुख उद्देश्य

गरीबों रोगियों अभावग्रस्त लोगों की सेवा करना था।

04 जुलाई 1903 को स्वामी जी का निधन हुआ था अर्थात इहलीला संपन्न हुई थी। 

खुद को मोटिवेट कैसे करें।

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 12012019

 

  

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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