सपा-बसपा गठबंधन या गांठ बंधन?

सपा-बसपा गठबंधन   या गांठ बंधन? 

सपा-बसपा गठबंधन या गांठ बंधन?

इस सवाल की परत खोलने के पहले हमें इस

तथाकथित महा गठबंधन के अतीत में डुबकी लगाने की सख्त जरूरत है

क्योंकि इतिहास गवाह है जब जब भी बेर और केर का संग हुआ है तब तब या तो

इतिहास में सकारात्मक संस्तुति दर्ज की गई है या फिर नकारात्मक प्रवृत्ति की वह छाया देखीगई है 

जिसन उजाले को ही हजम करके छोड़ा है।

हर भारतीय ही नहीं बल्कि आज की डेट में पूरी दुनिया इस बात से वाकिफ है कि जल्द ही

भारत में दिल्ली की गद्दी के लिए आम चुनाव होने वाले हैं इस बात को ध्यान में रखते हुए

अपनी अपनी बंद पड़ी दूकानों को फिर से चमकाने की सभी

राजनीतिक दूकानदारों को जरूर आन पड़ी है।

इसी बात का साक्षात महा प्रमाण है सपा-बसपा तथाकथित महा गठबंधन।

12 जनवरी राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश के दो पूर्व सत्ताधारी दलों के प्रमुख

कुमारी बहन मायावती और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने

आने वाले लोक सभा चुनावों के लिए गठबंधन की अनंतिम घोषणा की है।

इस महा गठबंधन की महा घोषणा के अनुसार

सपा और बसपा उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोक सभा सीटों में 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी।

इस महा गठबंधन ने कांग्रेस के साथ एक अनाम दल को भी दो-दो सीटें देने का वादा किया है।

यहां एक बात खासतौर पर ध्यान रखने की है कि जब इस महा गठबंधन की घोषणा हो रही थी

तब मायावती जी ने एक बार नहीं बल्कि दो दो बार

जाने अनजाने 1995 में हुए बहुचर्चित गेस्ट हाउस कांड को भी याद किया। 

कहानी गेस्ट हाउस कांड की

राजनीति के बारे में रत्तीभर भी जानकारी रखने वाले यह जानते हैं कि

बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार को

बर्खास्त कर दिया गया था।

इस अवसर को माननीय मुलायम सिंह यादव और मान्यवर कांशीराम ने

अपने लिए एक राजनीतिक लाभ का अवसर समझ कर

सपा और बसपा का गठबंधन किया था।

इन दोनों महानुभावों को लगता था कि उनके इस कदम से

भाजपा को सत्ता से दूर रखा जा सकता है।

हकीकत भी यही थी क्योंकि जब उत्तर प्रदेश में बाबरी

मस्जिद गिराए जाने के बाद विधानसभा चुनाव हुए थे तब सपा को 109 सीटें मिली थीं।

बसपा को 67, जनता दल को 27, कांग्रेस को 28 और भाजपा को

सबसे ज्यादा 177 सीटें मिली थीं।

बावजूद मुलायम सिंह यादव ने एनकेनप्रकारेण सरकार बना ली थी।

यहां खास बात यह है कि बसपा मुलायम सिंह यादव की सरकार में शामिल नहीं थी

इसके बावजूद बसपा का सुपर पावर बरकरार था।

यह शायद इसी का परिणाम था कि बेर केर का संग दो

साल में ही इतना तल्ख और उबाऊ हो गया था कि अंततः गठबंधन के टूटने की नौबत आ गयी।

 

सपा को इस बात की जानकारी मिल चुकी थी कि बसपा न केवल सरकार गिराने जा रही है

बल्कि भाजपा के साथ सरकार भी बना रही है।

2जून 1995 को बसपा अपने विधायकों की बैठक करने वाली थी।

बैठक प्रारंभ हुई और सपा से गठबंधन तोड़ने पर चर्चा ही चल रही थी कि तभी

सपा के तथाकथित 200 सुपर चहेतों ने गेस्ट हाउस में हमला बोल दिया था।

बसपा और सपा के विधायकों में भयंकर मारपीट होने लगी तो मायावती जी ने

सपा के सुपर चहेतों से बचने के लिए खुद को एक कमरे में बंद कर लिया।

कुछ ही देर बाद सपा के सुपर चहेते मायावती के कमरे के दरवाजे तोड़ने लगे

और जातिसूचक शब्दों में गंदी से गंदी गालियाँ देने लगे। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 13012019

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मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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