गांव के लोग कितने भोले और कितने भाले?

गांव के लोग कितने भोले और कितने   भाले? 

गांव के लोग कितने भोले और कितने भाले?

इस पोस्ट को पढ़ने वाले सभी भाई बहनों से विनम्रनिवेदन है कि

आप मुझे किसी शहर का निवासी न समझें बल्कि मैं आज भी

किसी गांव से ही संबंध रखता हूं।

बावजूद इसके इस लेख या पोस्ट का मकसद केवल और केवल यह दिखाना है कि

हमारे गांव किस तरह आज भोले से भाले बनने की ओर बढ़ चले हैं।

इस हेडिंग को पढने के बाद आप सोच रहे होंगे हम यहां पर अपनी इस पोस्ट में

यह बताने वाले हैं कि गांव के लोग बहुत ही सीधे सरल और सच्चे होते हैं

तो बहनों भाइयों आपको यह अभी से साफ कर दें कि हम इस बात को यहां कतई नहीं बता रहे

बल्कि इस पोस्ट का मकसद यही है कि आपको इस

चली आ रही है पारंपरिक मान्यता से हटकर कुछ सचमुच की सच्चाई भी बताई जाए।

दोस्तों, सचमुच की सच्चाई यह है कि भले ही कभी

हमारे गांव भोले भाले रहे हों लेकिन आज भोले भाले कतई नहीं हैं। 

बदले हैं गांव और गांव के लोग 

गांव के लोग कितने भोले और कितने भाले हैं?

अगर हम इस बात की तफ्तीश करने निकलते हैं तो किसी भी गांव में घुसने पर

जो सबसे पहले दिखाई देने वाला परिवर्तन दिखता है वह है

लोगों का छानी छप्परों को त्याग देना

और साथ ही साथ ईंट और कंक्रीट  की संगति में पहुंच जाना ।

आज  गांव के लोग खेती पर भरोसा कम करने लगे हैं और यह लगभग हर घर की हकीकत है कि

चाहे सरकारी नौकरी मिले या फिर प्राईवेट सभी लोग नकद आय के लिए परदेश जाने लगे हैं।

परदेश जाकर गांव लौटने वाले सरकारी और प्राइवेट दोनों नौकरीपेशा लोगों का

पहला काम होता है कच्चे घर को पक्का बनाना।

आप सोचते होंगे पक्का घर बरसात से सुरक्षा के लिए जरूरी हो गया है तो आपको बता दें

पहली बात तो आजकल बरसात के ही लाले पड़े रहते हैं और फिर

अगर बरसात होती भी है तो वह केवल चंद दिनों की ही होती है।

सच कहें तो मेरा मतलब यह नहीं है कि आप कच्चे घर में ही रहें लेकिन

मेरा मतलब यह जरूर है कि हम में जरूरत के भी छानी छप्परों की मेहनत नहीं बची है।

इसलिए घर केे ज्यादा से ज्यादा भाग में सीमेंट का साम्राज्य हो जाता है

जो अपना असली रंग गर्मी में दिखाती है ऊपर से बिजली,

इंवरटर की खपत ईंट भट्टा के बढते चलन से घटते बाग बगीचे जानवरों की बजाए

मशीन से होने वाली खेती यह सब उदाहरण हैं जो हमारे गांव को

भोलेे लोगों का निवास नहीं बल्कि भाले लोगों का निवास बताने के लिए काफी हैं। 

उजड़ते बाग बगीचे और गांव के भोले भाले लोग

हमारे गांव के  भोले भाले लोगों की हकीकत यही है कि हम चंद पैसों के चक्कर में

यह भी भूल गये हैं कि आज हम जिन जंगलों को चांदनी चौक बनाना चाहते हैं

उनके चांदनी चौक बनते ही हमारी आने वाली पीढियां

सम्मृद्धि शाली धरती के निवासी कहलाने की बजाय चवन्नी छाप कहलाएंगे।

हम पैसा बनाने के चक्कर में सालों से धरती की रक्षा

करने वाले वृक्षों को जिस तरह धराशायी करते जा रहे हैं उससे

हम केवल कुछ पेड़ ही खत्म नहीं कर रहे बल्कि हम धरती के सामंजस्य को भी बिगाड़ रहे हैं।

धरती के बढ़ते प्रदूषण को अपने आप में सोखने वाले पेड़ों की कीमत हम जिस तरह

महज कुछ सिक्के लगा कर उन्हें कटने के लिए छोड़ देते हैं उससे यह साफ है कि

धरती को हवा पानी मुहैया कराने वाले प्रकृति के यह

प्रहरी एक दिन हम से और हमारी आने वाली पीढ़ियों से बदला जरूर लेंगी। 

गांव के भोले लोगों का यह भयानक   शौक 

बुरा मत मानिएगा भाइयों बहनों लेकिन आज मैं आपको

गांव के भोले भाले लोगों की एक ऐसी नवीनतम प्रवृत्ति या

भयानक शौक के बारे में बताना चाहता हूं जिसकी

वजह से न केवल धरती के कोख का पानी लगातार कम हो रहा है बल्कि

गांवों की संस्कृति भी किसी हद तक लुप्तप्राय होती जा रही है।

दोस्तों, मैं बात करना चाहता हूं आजकल गांवों में लगाए जाने वाले घरेलू सम्मर्सिबल की

इसे हम घरेलू ट्यूब वेल भी कह सकते हैं जो बमुश्किल 35/40 हजार में लग जाता है

लेकिन इससे होने वाली बर्बादी हजारों लाखों में होती है।

होता यह है कि आजकल लोग 40 हजार खर्च करके

मुकेश अंबानी जैसे रईस हो जाते हैं और पानी को हद तक बर्बाद करते हैं।

मान लीजिए किसी बगल वाले घर में अभी यह गंगा नहीं बहती तो

उसे ललचाने और दिखाने के लिए यह मुकेश भाई अंबानी

कुछ ज्यादा ही पानी की बर्बादी करते हैं।

गलती से भी किसी पढ़े लिखे आदमी ने यह कह दिया कि श्री मान

यह पानी की बर्बादी नहीं करनी चाहिए तो जनाब मुकेश भाई बस इतना ही कहते हैं कि

तुम भी लगवा लो अगर तुम्हारी औकात हो तुम्हारा पानी नहीं बर्बाद कर रहे।

अब आप ही बताइए इस तथाकथित भोले भाले गांव के प्राणी को

कौन समझाए कि यह पानी उसका भी नहीं है।

ऐसा भी नहीं है कि शहर में पानी नहीं बर्बाद होता

लेकिन कम से कम गांवों को तो इस व्याधि से दूर रहना चाहिए मेरा ऐसा ही मानना है।

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 14012019

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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