भारत में राज्यों की हैसियत आखिर क्या है?

 

भारत में राज्यों की हैसियत आखिर क्या   है? 

भारत में राज्यों की हैसियत आखिर क्या है?

दोस्तों, आजकल अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए या फिर

जनता को महज उल्लू बनाने के लिए जिस तरह भारत के कुछ राजनीतिक छत्रप

केंद्र के प्रति महज दिखावा करने के लिए आक्रामक दिखने में रत्तीभर का टाइम नहीं लगाते

इसे देखकर मन में यह सहज शंका घर कर गयी है कि हकीकत क्या है

यानी भारत में राज्यों की हैसियत आखिर क्या है?

इसे आप इस तरह से भी समझ सकते हैं कि केंद्र में भाजपा सरकार है

लेकिन जिन प्रदेशों में भाजपाई सरकारें नहीं हैं मसलन पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार

मध्य प्रदेश में कमलनाथ की सरकार या फिर राजस्थान में अशोका गहलोत की सरकार

दिल्ली में सदाबहार मोदी विरोधी केजरीवाल सरकार

आदि केंद्र को आए दिन किसी भी बात पर अंगूठा क्यों दिखाते रहते हैं

क्या सच में किसी भी भारतीय राज्य की इतनी हैसियत है कि

वह केंद्र को नजरअंदाज कर सके?

या फिर यह सब क्षेत्रीय छत्रपों की बौखलाहट में  गई वह गलती है

जिसका दंड अगर केंद्र सरकार देने लगे तो यह छत्रप और भी बलवान हो जाएंगे?

कुल मिलाकर आज हम अपनी इस पोस्ट में केंद्र राज्य

संबंधों की हैसियत और हकीकत जानने की कोशिश करेंगे कुछ इस तरह से

क्या कहता है भारतीय संविधान? 

भारत में राज्यों की हैसियत आखिर क्या है?

अगर इस सवाल का जवाब हम भारतीय संविधान की

दहलीज में तलाशने का प्रयास करेंगे तो हमें पता चलेगा कि भारत राज्यों का संघ है।

इसका मतलब यह हुआ कि भारत में जो भी राजनीतिक व्यवस्था है

उसके शिखर पर केंद्रीय सत्ता ही है लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि

यहां पर इससे जुड़े राज्यों की कोई हैसियत ही नहीं है।

सच यह है कि भारत जिन राज्यों के संघ का समग्र नाम है

उन राज्यों के भी एक नहीँ अनेकों संवैधानिक अधिकार हैं।

बता दें कि अगर हम भारतीय राज्यों की तुलना अमेरिका से करें तो पता चलता है कि

अमेरिका के संविधान में केवल केंद्र सरकार की

शक्तियों का स्पष्ता से वर्णन किया गया हैऔर राज्यों को अवशिष्ट शक्तियां दी गई हैं

जबकि भारत में इसके ठीक विपरीत स्थिति है।

भारत में केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक शक्तियों

के विभाजन में संघीय चरित्र साफ साफ दिखाई देता है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण इस बात को समझना भी है कि भारत में

सामान्य स्थिति में संवैधानिक रूप रेखा राज्यों की

गतिविधि के संबंध में स्वायत्तता सुनिश्चित करती है परंतु

व्यावहारिक रूप तथा आपात स्थिति में राज्यों की स्वायत्तता सीमित हो जाती है।

भारत में केंद्र राज्य संबंध 

भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ राज्य तथा समवर्ती सूची का स्पष्ट वर्णन है।

इन सूचियों के माध्यम से संघ और राज्यों के विधान मंडलों की

विधायी क्षमता के क्षेत्र की सीमाओं को परिनिश्चित और सीमांकित किया गया है।

ध्यान रखें संघीय सूची में राष्ट्रीय महत्व के ऐसे विषयों को रखा गया है

जिनके संबंध में संपूर्ण देश में एक ही प्रकार की नीति का अनुसरण जरूरी है।

संविधान की इस सूची के सभी विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल और केवल संसद को प्राप्त है।

इस सूची में कुल 97 विषय हैं जैसे रक्षा, विदेशी मामले 

युद्ध और संधि, देशीकरण व नागरिकता विदेशियों का आना जाना,

बंदरगाह हवाई मार्ग डाक तार टेलिफ़ोन आदि। जहां तक बात राज्य सूची की है तो राज्य सूची में सामान्यतः वह विषय रखे हुए हैं जो वास्तव में क्षेत्रीय महत्व के होते हैं।

इस सूची के विषयों पर विधि निर्माण का अधिकार राज्य विशेष का होता है।

इस सूची में कुल 62 विषय हैं जैसे पुलिस न्याय जेल

स्थानीय स्वशासन सार्वजनिक स्वास्थ्य कृषि सिंचाई सड़क आदि ।

जहां तक बात समवर्ती सूची की है तो इस सूची में

शामिल वह विषय होते हैं जो स्थानीय और संघीय दोनों महत्व के होते हैं।

इस सूची में शामिल विषयों से संबंधित कानून में यदि

केंद्र तथा राज्य का मतभेद हो तो राज्य के कानून को केंद्र पलट सकता है या खत्म कर सकता है।

इस सूची में कुल 52 विषय हैं जैसे फौजदारी विषय तथा प्रक्रिया,

निवारक निरोध, विवाह और तलाक दत्तक और उत्तराधिकार

कारखाना श्रमिक संघ औद्योगिक विवाद आर्थिक और

सामाजिक योजना सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक बीमा आदि। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 08022019

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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