हार पक्की होने के बाद भी लोग चुनाव क्यों लड़ते हैं?

हार पक्की होने के बाद भी लोग चुनाव क्यों लड़ते हैं? 

हार पक्की होने के बाद भी लोग चुनाव क्यों लड़ते हैं?

इस सवाल का जितना जवाब महत्वपूर्ण है उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि

आखिर हार पक्की होने के बाद भी लोग चुनाव क्यों लड़ते हैं?

इसका मतलब क्या है?

यह सवाल किसके बारे में है और इस प्रश्न का अर्थ क्या है?

जी हां दोस्तों इसका एक सीधा सरल और साफ मतलब यह है कि

हम अक्सर देखते हैं पूरे देश में या पूरे राज्य में या किसी इलाका विशेष में

किसी खास पार्टी या व्यक्ति विशेष का टेम्पो हाई होता है

लेकिन इसके बाद भी दूसर पापार्टियों के उम्मीदवार

पूरे तन मन धन और लगन के साथ दिल खोल कर चुनाव लड़ते हैं।

ऐसे लोगों के बारे में या फिर इस तरह के लोगों को

उम्मीदवार बनाने वाली पार्टियों के बारे में लोग केवल यही सोच कर हैरान और परेशान रहते हैं कि

यह लोग जब जानते हैं कि इनकी जीत नहीं बल्कि हार सुनिश्चित है तो फिर

यह लोग अपना पैसा और समय बर्बाद करने पर उतारू हो कर चुनाव क्यों लड़ते हैं? 

इस सवाल का क्या मतलब है? 

जहां तक इस सवाल के मतलब की बात है तो इसका

अर्थ ऐसे लोगों के बारे में जानकारी हासिल करना है जिन्हें

यह भलीभांति पता है कि वह चुनाव नहीं जीत पाएंगे फिर भी यह लोग चुनाव क्यों लड़ते हैं?

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि यह वह लोग होते हैं जिनके मन में

चुनाव जीतने से ज्यादा इच्छा चुनाव लड़ने की होती है।

इन्हें किसी भी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टी का टिकट या सिम्बल मिल जाए तो

यह चुनावी ताल ठोंकने से बाज नहीं आते भले ही इनका

कितना भी पैसा और समय बरबाद क्यों न हो जाए। 

 यह चुनाव केवल इसलिए भी लड़ना पसंद करते हैं कि इनके नाते रिश्तेदार और

इनके जानने वाले यह जान जाएं कि फलां ने कभी चुनाव लड़ा था फलां-फलां पार्टी से।

यह इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने की गरज से अपनी हार को खुशी खुशी गले लगा लेते हैं।

इन्हें यह भी ठीक से पता होता है कि नामचीन पार्टियां

खुद की केवल उपस्थिती दर्ज कराने की गरज से इन्हें टिकट देती हैं

फिर भी यह लोग चुनावी समर में कूद पड़ते हैं क्योंकि

इन्हें जीतने से ज्यादा जरूरी चुनाव में भागीदारी महसूस होती है।

यह इस बात से फूले नहीं समाते कि इनका तन मन धन और समय बर्बाद हो गया

लेकिन फिर भी इनका नाम प्रत्याशी के रूप में लिखा जा चुका है। 

इनकी हार में भी जीत छिपी होती है

आप भले ही ऐसे लोगों को होशियार न कहें जो हार पक्की होने के बाद भी चुनाव लड़ते हैं

पर एक सच यह भी है कि यह इतने भी नादान नहीं होते

जितना दुनिया इन्हें समझने की कोशिश करती है।

यह भोले भाले दिखने वाले लोग कभी कभी तो महज इसलिए भी ओखली में सिर डाल देते हैं कि

अगर किसी जिताऊ उम्मीदवार की समय रहते इन पर भी निगाह पड़ गयी तो

बैठे बिठाए आम के आम और गुठलियों के दाम भी सिद्ध हो जाएंगे।

भाइयों बहनों यह लोग जो केवल धन खर्च करके

केवल अपनी चुनावी ललक को पूरा करने का ख्वाब लेकर मैदान में आते हैं

कभी कभी इनके भी वारे न्यारे हो जाते हैं।

अगर यह जिताऊ उम्मीदवार को अपनी आंट में लेने में कामयाब हो गए तो

किसी पार्टी का उम्मीदवार होने के साथ ही साथ एक

निश्चित समझौते के तहत अपने कुछ वोटों के बदले वहीं खिसकने में देर नहीं लगाते

जहाँ नाम और दाम पर आंच नहीं आती।

सरल अर्थ में इसका मतलब यह हुआ कि यह लोग

जिस भयानक कद्दावर पार्टी के कद्दू उम्मीदवार होते हैं बाहर से उसी के बने रहते हैं

लेकिन जिताऊ उम्मीदवार को यह बता देते हैं कि

इनका और इनके समर्थकों का वोट गुप्त रूप से आपको ही जाएगा। 

इन्हें निर्दलीय न समझें 

हार पक्की होने के बाद भी  चुनाव लड़ने वालों को आप कहीं

निर्दलीय उम्मीदवार न समझ बैठें इसीलिए मैं आपसे पहले ही कह रहा हूँ कि

आप ऐसे खास लोगों को निर्दलीय न समझें बल्कि यह बाकायदा दलीय उम्मीदवार होते हैं।

यह कमाल के लोग होते हैं कभी कभी तो ऐसे महानुभावों के दर्शन मिल जाते हैं

जो केवल ऐसी ही सीटों का चयन करते हैं जहां लोग कम ही कमर कसने को तैयार होते हैं। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 11032019

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

View all posts by KPSINGH →

4 Comments on “हार पक्की होने के बाद भी लोग चुनाव क्यों लड़ते हैं?”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *