‘पद्मावत की पाठशाला’ Story of Padmawt.

‘पद्मावत की पाठशाला’ Story of Padmawat 

भारतीय सिनेमा , भारतीय सेंसर बोर्ड, भारतीय प्रसासन और राज्य व केंद्र की सरकारों ने मिलकर शायद ही कभी देश के चेहरे पर इस कदर धूल मली होगी । जब आपको अपने चेहरे की नही, मुखौटो की फिक्र होती है, तब चेहरा पर ऐसे ही कालिख पूत जाती है। संजय लीला भंसाली की ” पदमावत” अछि कमाई कर रही है । विरोध से ही तो फ़िल्म का इतना प्रचार हुआ कि भंसाली को दूसरा कोई ‘परमोसन’ करना नही पड़ा । इसके लिए करनी सेना को भंसाली धन्यवाद तो दे ही सकती है। भंसाली की वे सारी फिल्में सफल बनी है और चली है, जिनके पीछे कोई नजरिया नही था। बस कहानी थी , अछि किस्सागोई थी और उनकी भब्यतर प्रस्तुति थी । भंसाली माल पहचानते भी है और बेचना भी जानते है। लेकिन, आप उनकी फिमलो में वैसा कुछ खोजने लगेंगे, जो उनका हेतु ही नही है , तो गलती आपकी है,  भंसाली की नही। ‘पदमावती’ तो खुद ही जायसी की कल्पना के पंखों पर सवार होकर हम तक पहुची है। अब उसमें किवदंतियों , किस्सो व सिनेमाई आजादी की चौक डालकर भंसाली ने जो परोसा है, हमे उसी दायरे में फ़िल्म देखनी भी चाहिए और अपनी राय भी देनी चाहिए । हमने, जिन्होंने ‘पद्मावती’ का हिंसक विरोध करनेवाली ‘हुन्दुत्व बिग्रेड’ की मनमानी का विरोध किया था , उसे गलती से भी फ़िल्म का या फ़िल्म मे कहि बातो का समर्थन नही माना जाना चाहिये।

हम तो हर भंसाली के उस अधिकार का समर्थन कर रहे थे कि जिसे कुछ लिखना , बनाना, गाना, नाचना, रंगाना या बोलना है। उस पर सरकार की रोक नही होनी चाहिए । उसे कोई ब्यक्ती, पार्टी या गुट आतंकी करे, ऐसी देखना और रोकना सरकार की जिम्मेवारी है; बल्कि जो ऐसा न करे, वह सरकार ही नही है। किसी भी भंसाली का यह अधिकार दरअसल व्यक्ति का नही, लोकतंत्र का अविभाज्य अंग हैं; कहूँ कि अगर यह अधिकार आचरण नही है , तो हम लोकतंत्र की लाश के राखवाले भर है , क्योंकि लोकतंत्र की हत्या तभी कर दी हमने , जब किसी को उसकी अभिव्यक्ति से रोकने का काम किया।

जब राज्यस्थान में चल रही शूटिंग में घुसकर ‘करनी सेना’ ने भंसाली पर हमला किया था, तब से आज तक भंसाली का एक भी बयान कोई मुझे दिखलाये की जहा वे हिमत के साथ इन लोगो का विरोध करते हो , वो तो पहली वारदात के बाद से ही घिघियाती आवाज में सबको यही भरोसा दिलाते आ रहे है कि हमने कुछ भी ऐसा नही किया नही बनाया है जिससे कि राजपूती आन -बान -सान में खम पड़ता हो । वे कहते ही रहे – करनी सेना मेरी फिल्म का सेंसर बोर्ड बन जाये ! ऐसे कहते है -कायरो के कृत्य का कायराना समर्थन! ‘हम कलाकार है, हमे राजनीति से क्या लेना ?’

जैसे वाक्यो से खुद को हर जिमेवारी से अलग कर लेना कला के व्यपारियो की ढाल है। राजनीति पोशाक पहनकर अलोकतांत्रिक- असामाजिक कृत्यों को अंजाम देनेवाले एकाधिकार संगठन है, जो भंसाली जैसे कि खुराक से ही जिंदा रहते है।

इसी बीच खबर आई कि जयपुर लिट् फेस्टिवल में इस बार प्रसून जोसी हिस्सा नही लेंगे ।क्यों ? साहित्य के नाम पर सजे बाजार में बिकाऊ माल न पहुचे , तो बाजार कैसे चले ! लेकिन प्रसून जोसी ने बड़ी शालीनता से कहा कि वे नही चाहते है कि फेस्टिवल की गरिमा कम हो , आशांति हो , साहित्यकारों और साथित्यप्रेमियो को तकलीफ हो, इसलिए वे जयपुर नही जाएंगे । प्रसून जोसी वहाँ ऐसा क्या करनेवाले थे कि समारोह की गरिमा कम हो जाती ?’ हिंदुत्व ब्रिगेड’ के नए सहस्वारो में शान से शामिल प्रसून जोसी को इनाम में जिस सेंसर बोर्ड की अध्यक्षता मिली है , वही उनके गले की फांस बन गई .’हिन्दू ब्रिगेड’ जो हासिल करना चाह रहा था , वह तो सेंसर बोर्ड का अधिकारी ही था न ! फिर क्या पुलिस , क्या कानून , क्या संविधान , क्या संस्थाए और क्या प्रसून जोसी ,सब ठेंगे पर ! मुख्यमंत्री ने ऐलान करना शुरू कर दिया कि वे अपने राज्य में ‘ पदमावती’ के पर्दशन की इजाज़त नही देंगे । केंद्र तो किसी गिनती में नही था ,  क्योंकि ऐसी मनमानी की शुरुआत ही तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी , जब उन्होंने आमिर खान की फ़िल्म पर इसलिए बंदिश लगा दी थी ,  क्योंकि आमिर ने गुजरात दंगों की नींदा की थी और नर्मदा आंदोलन का समर्थन किया था। तब की केंद्र में मनमोहन के वक्त ही ऐसा इलाज निकल आता कि किसी ‘पद्मावती’ की ऐसी हालत नही होती । लेकिन , सता कई स्तरों पर , कई तरह की कायरता फैलाती है ।

देश में जब असहिष्णुता का मामला चल रहा था , तब अनुपम खेरे , प्रसून जोसियो का जमावड़ा चीख रहा था कि नरेंद्र भाई के शासन में कहि कुशासन है ही नही । तब कुशासन अवैध शब्द था । फिर हमने देखा कि ये सारी बहादूर सरकारी कुर्सियों पर जा बैठे । प्रसून जोसी को अब उसी अवैध कुशासन का सामना करना पड़ा है और अगर वे जयपुर लिट् फेस्टिवल में गए होते , तो वे ऐसी कुशासन के शिकार हो सकते थे । कुशासन अमानवीयता का दूसरा नाम है । प्रसून जोशियो , अनुपम खेरे को शायद यह एहसास हो कि जब भीड़ की असहिष्णुता हमला करती है , तब व्यक्ति कितना अकेला और असहाय हो जाता है- फिर चाहे उसका नाम पहलू खान हो या प्रसून जोशी !

राजनीत का पोशाक पहनकर अलोकतांत्रिक- असामाजिक कृत्यों को अंजाम देनेवाले एकाधिकार संगठन है ,जो भंसाली जैसे कि खुराक से ही जिंदा रहते है ।

धन्यवाद                      नमस्कार ,

आपका मित्र – कौशल किशोर सिंह

 

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