कुण्डलिनी शक्ति के चमत्कार

कुण्डलिनी शक्ति के चमत्कार  भाग – 1

                       

कुण्डलिनी  : आज हम कुण्डलिनी शक्ति के चमत्कार पर चर्चा करेंगे। यह विषय बहुत ही गूढ़ एवं महत्वपूर्ण है | इसलिए अंत तक ध्यान से पढने का कष्ट करें। कुण्डलिनी असीम ऊर्जा का केंद्र है। उसमें दिव्य शक्तियों का वास होता है। उसके चैतन्य होने पर मानव के शरीर में विभिन्न प्रकार की शक्तियां व्याप्त हो जाती हैं। जैसे वह निरोगी, दूरश्रवण, आकाशवाणी, संवेगप्रेषण, प्रकृति नियंत्रण दूरदर्शन, घटनाओं में हस्तक्षेप करने और अभीप्सित वस्तु प्राप्त करने तथा इच्छित आयु प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है।

स्वरूप :- 

आपने अभी तक कुंडलिनी के विषय में यही पढा़ होगा कि उसका स्वरूप सर्पिणी जैसे है और वह ढाई आंटे लगाकर मनुष्य में रीढ़ की हड्डी ( मेरुदण्ड) के निचले हिस्से पर बैठी है लेकिन वास्तविकता इससे अलग हटकर है। उसका स्वरूप सर्पाकार बिल्कुल नहीं है। उसका स्वरूप कुछ इस प्रकार है। वह मानव शरीर में मौजूद इडा़, पिंगला और सुषुम्ना नाडि़यों के गुच्छों के समूह से युक्त उपरिगामी हल्की लहरदार नाडि़याँ हैं। नाडि़यों के गुच्छों का स्वरूप कमल पुष्प की पंखुड़ियों के समान है।

निवास :- 

दोस्तों कुण्डलिनी के विषय में जैसे प्रचलित है कि वह इस पंचभूतात्मक शरीर में मौजूद है, लेकिन मैं स्व अनुभव के आधार पर यह बता दूँ कि कुण्डलिनी का इस भौतिक शरीर में बिल्कुल भी अस्तित्व नहीं है। यदि इस भौतिक शरीर में उसका अस्तित्व होता तो डाक्टर लोग पता नहीं कबके शरीर का चीरफाड़ करके उसमें इलेक्ट्रिक शाट देकर चैतन्य कर चुके होते लेकिन अभी भी वे लोग उसकी खोज कर पाए और न ही कर पाएंगे। इसका कारण यह है कि कुण्डलिनी प्राण देह, सूक्ष्म शरीर और दिव्य देह में मौजूद है।

कुण्डलिनी के चक्र :- 

कुण्डलिनी में सात चक्र होते हैं – मूलाधारचक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहतचक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र या छठी इंद्री और सहस्रार चक्र।

1- मूलाधार चक्र :- 

यह चक्र मेरुदण्ड के निचले सिरे के पास गुदाद्वार से थोड़ा ऊपर होता है। यह  कमल पुष्प की चार पंखुड़ियों के समान नाडि़यों का गुच्छा होता है। यह भू तत्व प्रधान होता है। इसका रंग जामुनी होता है। इस चक्र में हिंदू धर्म के प्रथम पूज्य देवता गणेश जी का वास होता है। इसका मूल बीज मंत्र लं होता है

2- स्वाधिष्ठान चक्र :- 

इस चक्र में कमलवत छः पंखुडियां होती हैं। यह मूलाधार से दो अंगुल ऊपर मूत्राशय के पास होता है। यह चक्र जल तत्व प्रधान होता है।इसका रंग नीला होता है। इसमें व्रह्मा और गायत्री देवी या सविता का वास होता है। इस चक्र का मूल बीज मंत्र वं होता है।

3- मणिपुर चक्र :- 

इस चक्र का स्थान नाभि के ठीक पीछे होता है। इसमें कमलवत दस पंखुडियां होती हैं। यह अग्नि तत्व प्रधान होता है। इसका रंग लाल होता है। इस चक्र में विष्णु और लक्ष्मी का वास होता है। इसका मूल बीज मंत्र रं होता है।

4- अनाहत चक्र :- 

यह चक्र ह्रदय के पास स्थित होता है।इसमें कमलवत बारह पंखुडियां होती हैं। यह चक्र वायु तत्व प्रधान होता है। इसका रंग स्वर्णिम होता है। इस चक्र में शिव और पार्वतीजी का वास होता है। इसका मूल बीज मंत्र यं  होता है।

 

नोट- अगले भाग में हम बाकी बचे हुए तीन चक्रों का एवं कुण्डलिनी चैतन्य की प्रक्रिया, भोजन, लक्षण और लाभ के विषय में जानेंगे।

 

कृपया इन्हें भी पढ़ने का कष्ट करें – सिद्धाश्रम रहस्य और होली उत्सव।

धन्यवाद

By- Vinod Singh

 

 

 

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