वो यादे बचपन की

वो यादे बचपन की

 

वो यादे  बचपन की जब भी आती तब यैसा लगता हैं, की बचपन दिन भी क्या दिन था। न कोई टेंसन न कोई चिंता।

दोस्तों नमस्कार , दोस्तों आज बचपन की कुछ बाते याद आगई । बचपन की याद आई मेरा मन खुशियों से भर गया । हाय दोस्तों,क्या आप को कभी बचपन की याद आने पर यैसा लगाता है। की हम बचपन में फिर से जा पाते  अगर यैसा लगता है तो चलो एक बार फिर से  बचपन की गलियों में घुम आते है

वो यादे बचपन की

वो क्‍या दिन थे…
मम्‍मी की गोद और पापा के कंधे,
न पैसे की सोच और न लाइफ के फंडे,
न कल की चिंता और न फ्यूचर के सपने,
अब कल की फिकर और अधूरे सपने,
मुड़ कर देखा तो बहुत दूर हैं अपने,
मंजिलों को ढूंडते हम कहॉं खो गए,
न जाने क्‍यूँ हम इतने बड़े हो गए,

बचपन में लगी चोट पर मां की हल्‍की-हल्‍की फूँकऔर कहना कि बस अभी ठीक हो जाएगा!
वाकई अब तक कोई मरहम वैसा नहीं बना!

बचपन मे 1 रु. की पतंग के पीछे – पीछे  2 की.मी. तक भागते थे ।  न जाने कीतने चोटे लगती थी वो पतंग भी हमे बहोत दौड़ाती थी… आज पता चलता है, दरअसल वो पतंग नहीं थी, एक चेलेंज थी खुशीओं को हांसिल करने के लिए दौड़ना पड़ता है  वो दुकानो पे नहीं मिलती  शायद यही जिंदगी की दौड़ है  जब बचपन था, तो जवानी एक ड्रीम था जब जवान हुए, तो बचपन एक ज़माना था जब घर में रहते थे, आज़ादी अच्छी लगती थी आज आज़ादी है, फिर भी घर जाने की जल्दी रहती है ।

 

बचपन की वो  गलियां

 याद है ना वो

 

चोर सिपाही

कंचे

गिल्ली डंडा

छुपा छुपाई

गली क्रिकेट

बारिश के दिनों वो नाव बनना

दोस्तों के साथ मस्ती

बगीचों में चोरी करना और चौकीदार के आने पर भागना

स्कूल की Life

  • ”रंगोली”में शुरू में पुराने फिर नए गानों का इंतज़ार करना ।
  • शनिवार और रविवार की शाम को फिल्मों का इंतजार करना ।
  • सन्डे को सुबह-2 नहा-धो कर टीवी के सामने बैठ जाना।
  • ”जंगल-बुक”देखने के लिए जिन दोस्तों के पास टीवी नहीं था उनका घर पर आना ।
  • ”चंद्रकांता”की कास्टिंग से ले कर अंत तक देखना ।
  • हर बार सस्पेंस बना कर छोड़ना चंद्रकांता में और हमारा अगले हफ्ते तक सोचना ।
  • सचिन के आउट होते ही टीवी बंद कर के खुद बैट-बॉल ले कर खेलने निकल जाना ।
  • ”मूक-बधिर”समाचार में टीवी एंकर के इशारों की नक़ल काटना ।
  • शक्तिमान के जैसे गोल – गोल घूमना ।

बचपन  में जहां चाहा हंस लेते थे जहां चाहा रो लेते थे, पर अब मुस्कान को तमीज़ चाहिए और आंसूओं को तनहाई चाहिए ।

“ किसने कहा नहीं आती वो बचपन  वाली बारिश तुम भूल गए हो शायद अब बनानी कागज़ की नाव”

“ चले आओ कभी टूटी हुई चूड़ी के टुकड़े से, वो बचपन  की तरह फिर से मोहब्बत नाप लेते हैं “

“ अजीब सौदागर है ये वक़्त भी जवानी का लालच दे के बचपन ले गया “

“ आते जाते रहा कर ए दर्द तू तो मेरा बचपन  का साथी है”

“ हंसने की भी, वजह ढूँढनी पड़ती है अब; शायद मेरा बचपन, खत्म होने को है !!!

 

धन्यवाद 

लेखक   Dev Sahu
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7 Comments on “वो यादे बचपन की”

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