क्या हम मानव क्लोनिंग के करीब हैं?

क्या हम मानव क्लोनिंग के करीब हैं?

  क्या हम मानव क्लोनिंग के करीब हैं?

हाल ही में चीनी वैज्ञानिकों ने बंदर की क्लोनिंग में जिस प्रकार, सफलता प्राप्त की है,उससे यह प्रश्न पैदा हो गया है कि,

क्या हम अब मानव क्लोनिंग के करीब पहुंच गए हैं?

चाइनीज इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइंस के वैज्ञानिकों ने दो क्लोन मन्दरों को तैयार किया है।

वैज्ञानिकों ने जिस तरह से त्वचा की स्टेम सेल्स यानी कोशिकाओं को

प्रारंभिक भ्रूण में  बदलकर इतिहास रचा है,

यह मानव इतिहास को बदलने का पूरा पूरा संकेत है।

हां यह बात दीगर है कि इस सफलता से क्या सच में उत्साहित होना चाहिए अथवा नहीं

यह अभी कोई भी निश्चितता से कहने की स्थिति में नहीं है।

क्योंकि सच यह है कि सच्चे विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी यही है

कि उसे सार्वभौमिक रूप से सत्य होना चाहिए ।

कमाल स्टेम सेल का है 

 

क्या हम मानव क्लोनिंग के करीब हैं?

इस प्रश्न का उत्तर यदि हां है तो इसका  संपूर्ण श्रेय स्टेम सेल को जाता है।

क्योंकि  वैज्ञानिकों को इस उपलब्धि के इतने करीब किसी और ने नहीं

बल्कि स्टेम सेल ने ही पहुंचाया है।

इतना ही नहीं इस उपलब्धि ने एक उपलब यह भी हासिल कर ली है

कि आज नहीं तो कल जरूर हम इंसानों का भी क्लोन कहीं न कहीं नजर आएगा। 

प्रश्न यह है कि यह स्टैम सेल आखिर नाम किस बला का है? 

इस सवाल का सहज जवाब यही है कि स्टेम सेल वे कोशिकाएं हैं जो

विभाजित होने के बाद शरीर की किसी भी विशिष्ट कोशिका के रूप में विकसित हो सकती हैं ।

इसका एक फायदा यह भी है कि ह्रदय रोग और

पार्किन्सन जैसी बीमारियों के लिए बेहतर इलाज की उम्मीद जगी है ।

वहीं इसका दुष्परिणाम यह है कि कोई सचिन तेंडुलकर का क्लोन बना ले तो,

शक्ल सूरत मिलने के बाद भी जरूरी नही कि स्वभाव और आदत ,

हमारे सचिन जैसी ही हों।

अब तक हुए क्लोन और हम

क्या हम मानव क्लोन के करीब हैं?

इस सवाल के पहले आइए यह भी जान लें कि आखिर ,

अब तक वैज्ञानिकों ने किन किन जीव जंतुओं का

क्लोन तैयार करने में सफलता हासिल की है ?

तो इसका जवाब है कि अब तक वैज्ञानिकों ने मेढक,

भेड़, कुत्ते, सुअर, गाय और बिल्ली समेत ,

20 से अधिक जैव प्रजातियों का क्लोन तेयार करने में सफलता हासिल की है ।

मगर मनुष्य या मनुष्य से मिलती-जुलती किसी जीव प्रजाति का क्लोन अब तक बनाना मुश्किल रहा है ।

चीनी वैज्ञानिकों ने इस बाधा को भी पार कर लिया है ।

चीनी वैज्ञानिकों ने लम्बी पूंछ वाले मकैक प्रजाति के “झोंग झोंग “और “हुआ हुआ “

नामक दो बंदरों का क्लोनिंग तकनीक से निर्माण किया है ।

क्या हैं इसके मायने और मकसद? 

चीनी वैज्ञानिकों की उपलब्धि के आखिर क्या मायने हैं या हो सकते हैं? 

तो इसके जवाब में यही कहा जा सकता है कि चीन ने सोमैटिक कोशिकाओं से ,

जो बंदर का क्लोन तैयार किया है ।

वास्तव में इस उपलब्धि ने जल्दी ही मनुष्य को

क्लोन किए जाने की संभावना को तेज हवा दे दी है ।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार इस शोध का मुख्य कारण

एक जैसे जीन्स वाले बंदरों का निर्माण करना था ,

जिन पर मनुष्यों के लिए उपयोगी दवाओं का परीक्षण करने के साथ-साथ ,

चिकित्सा शोध में भी सहायता मिल सके ।

देखा जाए तो सोमैटिक सेल्स से बंदर का क्लोन बनाने में सफलता मिलना ,

बुनियादी अध्यन में बड़ा महत्व रखता है ।

इस उपलब्धि के साथ अधिकांश मस्तिष्क संबंधी

बीमारियों के प्रभावी इलाज में भी सहायता मिलना निश्चित है ।

उपलब्धि से उठे कुछ प्रश्न 

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं ।

इसी तरह इस उपलब्धि के अगर कुछ फायदे हैं ,

तो यह भी सच है कि इस उपलब्धि के कुछ नुकसान भी हैं ।

इन्ही नुकसान रूपी प्रश्नों को आइए हम भी देखते हैं ।

सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि क्या इस तरह से इंसान का निर्माण किया जा सकता है?

और यदि किया जा सकता है तो क्या यह सर्वथा उचित होगा ?

क्योंकि इंसान के जन्म लेने की एक नियमित प्रक्रिया है ।

माना कि हम अब महिला के पेट की बजाय कंक्रीट की प्रयोगशाला में जीवन बना सकते हैं,

तो क्या हम प्रयोगशाला में संस्कार और संस्कृति को भी सजीव कर सकते हैं ?

कुछ लोगों का कहना है कि इससे यह फायदा होगा कि हम

विराट कोहली और कपिल देव के क्लोन बना सकते हैं ,

और फिर विश्व कप जीत सकते हैं ।

तो कुछ लोग ऐसे ही सवालों के जवाब में कहते हैं कि इसकी क्या गारंटी है कि

जो सफलता विराट और कपिल ने मैदान में पसीना बहा कर हासिल की है,

वह इनके क्लोन केवल शक्ल पाने से प्राप्त कर लेंगे?

सवाल और भी हो सकता है, जिनके जवाब भी लाजवाब होंगे,

परन्तु निष्कर्ष यही है कि दुनिया की पूरी उपलब्धि वास्तव में केवल इसी कीमत में होती है,

जब वह मनुष्य का कल्याण करे।

यदि वह उपलब्धि मानव का अंतिम कल्याण नहीं करती है

तो हमें अपनी औपचारिक उपलब्धि पर फिर से गौर करने की नितांत आवश्यकता है। 

धन्यवाद

केपी सिंह किर्तीखेड़ा 

KPSINGH18032018

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

View all posts by KPSINGH →

5 Comments on “क्या हम मानव क्लोनिंग के करीब हैं?”

  1. हम मानव क्लोनिंग के करीब हैं! वैसे क्लोनिंग शब्द आधुनिक युग का है और इसकी कार्य शीलता अब महसूस हो रही है इसलिए अब करीब लगता है। परंतु अगर हम अपने भारतीय इतिहास के सतयुग में जाकर देखें तो उस समय मानस पुत्र हुआ करते थे। क्या वो क्लोनिंग नही था। यह हमारी पुरातन साइंस है। मानस पद्धति ने ही चीन को क्लोनिंग बनाने के लिए प्रेरित किया है।

  2. क्षमा कीजिए, साइंस हमारी या तुम्हारी नहीं होती, साइंस का वास्तविक अर्थ है ‘बुद्धि, साइंस बुद्धि का ही प्रर्यावाची नाम है। बुद्धि ही साइंस को पैदा करती है। बुद्धि से, साइंस से जो निर्मित होता है, निर्णित होता है वह सब निष्पक्ष होता है। बुद्धि की निगाह में कोई अपना नहीं है, कोई पराया नहीं है। वे भारत के लोग निश्चित ही बुद्धिमान रहें होंगें जिन्होंने इस पृथ्वी को ‘वसुधैव कुटुम्बकम, कहा था।

    अबुद्धि से ‘मोह, पैदा होता है, और मोह ही अपनों परायों की सीमाएं निर्मित करता है। मेरा न देश है, न नाम है, न रूप है, न जाति है, न धर्म है फिर भी मैं, हूँ! और मेरे साथ यह संपूर्ण आस्तिव है, यह बुद्धिमान मनुष्य की अभिव्यक्ति है।

    1. आपकी बात निश्चित रूप से सही हो सकती है
      लेकिन आप केवल इस प्रश्न का समुचित उत्तर देने की कृपा करें कि हम क्लोनिंग के जरिए इंसान तो बना सकते हैं
      तो क्या हम बिना सामाजीकरण के केवल प्रयोग शाला में ही
      संस्कृति और संस्कार भी गढ़ सकते हैं?
      आशा है कि आप मेरे प्रश्न का आशय समझ गए होंगे
      मुझे आपके जवाब की प्रतीक्षा रहेगी
      धन्यवाद

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *