सुप्रीम कोर्ट के बहाने

सुप्रीम कोर्ट की बहाने आओ खेलें गंदा खेल 

सुप्रीम कोर्ट की बहाने आओ खेलें गंदा खेल

इस लाइन को पढ़ने के बाद आप शायद उलझन में आएंगे कि आखिर भी क्या बात हुई?

लेकिन बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि,

सबसे बड़े लोकतंत्र के हिमायती हम भारतीयवासी इतने खराब स्तर पर पहुंचे हैं,

कि हम वोट करने के लिए किसी भी बात का विभाजन बना रहे हैं,

न तो रत्तीभर  संकोच करते हैं न ही जरा से शर्म करते हुए अपने इरादों को बदलते  हैं I

आलम यह है कि खिसियानी बिल्ल न केवल खम्भा नोचती है  ,

बल्कि अपने गंदे खेल का फायदा उठाकर मुंह  नोचवा भी पैदा कर रही है।

जो सुप्रीम कोर्ट की ख्याति दुनिया के सभी देशों में है,

उसी सुप्रीम कोर्ट की बातों को हम न केवल अचूक साबित करने के लिए तैयार हैं

बल्कि सुप्रीम कोर्ट के तर्कसंगत बात को एक हिंसक भीड़ से हम अराकक साबित करने के लिए भी तुले हैं

और वह भी महज इसलिए है कि हमें यह भय बड़ा भयानक सतना लगा है,

अगर जनता जागरुक हुई तो कहीं हमारी कमजोर दुकान की कुंडी न बंद हो जाए

आओ समझें असली बात 

सुप्रीम कोर्ट की बहाने आओ खेलें गंदा खेल

शायद इसका मतलब अभी भी नहीं समझ में तो,

आइए पहले यह मामला ही बात कर लें।

दोस्तों 2 अप्रैल 2018 आयोजित भारत बंद की बात तो विरोध का यह घटिया स्तर पर।

किसी भी तरह से स्वस्थ बहस योग्य नहीं है

फिर भी चूंकि आजकल बहुत से छद्म समाज सेवी,

अपना उल्लू सीधा कर रहा है इसलिए आइए कुछ भी इसके बारे में चर्चा करें

असली विवाद क्या है?

सुप्रीम कोर्ट की बहाने आओ खेलें गंदा गेम की असली चर्चा तब पूरी होगी,

जब हम भारत के संविधान के रक्षक सुप्रीम कोर्ट के,

उस बयान की चर्चा की जिसका बहाना इस खेल में खेला जा रहा है

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने ठीक उसी व्याख्या या व्यवस्था में एक और कानून का संदर्भ दिया था,

जिसका प्रभाव एससीएसटी कानून से कहीं अधिक व्यापक है,

परन्तु किसी माई के लाल ने तो न तो भारत बंद किया और न ही सुप्रीम कोर्ट को भी बुरा कह दिया गया।

आप को बताएं कि सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 17 में महिला से संबंधित धारा 498 ए पर इसी तरह की व्यवस्था की थी

तब किसी ने कोई भारत बंद नहीं किया

इसका अर्थ यह है कि क्या भारत में महिला निवास नहीं है?

जे एससी, सेंट एक्ट से दलितों को दिक्कत है क्या महिलाएं नहीं होना चाहिए? 

सुप्रीम कोर्ट का बात 

जरा ध्यान से सुप्रीमकोर्ट का बात पढ़ो फिर तुमसे बात हो

सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च 2018 को यह व्यवस्था दी,

कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून 1989 का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।

क्यों कि सुप्रीम कोर्ट अकेले 2016 में दलित प्रेतना के 5347 झूठे मामले पकड़े गए थे।

सुप्रीम कोर्ट ही नहीं आम भारत का नागरिक जानता है कि,

लगभग हर कानून का भारत में गलत इस्तेमाल होता है

खैर 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के दो प्रमुख न्यायाधीश न्याय मूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्याय मूर्ति यू यू ललित,

का खंडपीठ ने यह व्यवस्था दी है कि अब कोई झूठे मामला है,

यह मुकदमा ना लिखवा सके इसके लिए कुछ प्रावधान जरूरी है।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट केवल यह चाहता है कि झूठे मुकदमों का पहाड़,

इतना भारी न हो जाए कि किसका बोझ यह संविधान न उठ सके।

क्यों कि सर्वोच्च न्यायालय का पहला कर्तव्य यदि दोषी को सजा देना है,

तो उससे भी पहले कर्तव्य यह है कि किसी को निर्दोष को दंडित नहीं किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की बहन 

अपनी राजनीति की बंद पड़ी दुकान चलाने के लिए,

कुछ समाज विरोधी व्यक्तियों और नेताओं के लिए,

सुप्रीमकोर्ट की व्यवस्था अलिंदी का चिराग समझ में आने लगी,

जिसके परिणाम यह हुआ कि यह असंतुष्ट,

और तथाकथित बंद के दौरान 8 लोग जान गए थे

राजनीति के हाशिए में चल रहे कुछ स्वयं भू धुरंधर यह भूल गए कि,

सुप्रीम कोर्ट कोई उनके जैसा ही ढोंगी राजकीय दल नहीं है

उसकी मक़ा पर संदेह करने के प्रश्न तो बनता है,

लेकिन डंडा से खुले सड़क में संविधान को गाली देना,

कतिई माननीय या लोकतांत्रिक नहीं है।

मेरा मतलब मेरा उद्धरण 

मेरा मत मेरे उद्धरण का अर्थ है कि मैं

● अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए बने कानून से कोई नहीं,

लेकिन जिस तरह से इसका प्रामाणिक दुरुपयोग बढ़ गया है

इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था पर केवल प्रश्न चिह्न लगाना ही वास्तविक अच्छाई नहीं है।

सच तो यह है कि किसी को निर्दोष को सजा नहीं मिल सकती है यह भी एक सच्चा अच्छाई है ..

● सुप्रीम कोर्ट को असहमत होना आपकी हक है,

लेकिन हांथ में डंडा लेते हुए न्याय के मंदिर के खिलाफ बदमिलाजी के हक में इस देश में कोई नहीं है

● सुप्रीम कोर्ट को अपने जैसे कमजोर राजनीतिक दल समझने वाले नेताओं को चाहिए,

वह एक हिंसक और अमानवीय परम्परा स्थापित नहीं है

● मैं इस बात से सहमत हूं कि दलित विरोधी मानसिकता को कठोर से कठोर सजा मिलती है,

लेकिन मैं यह भी चाहता हूं कि किसी को निर्दोष सजा मिलेगी

● सुप्रीम कोर्ट की बहाने आओ खेल खेलना गंदा खेल महालेखों से,

मुझे यह कहना है कि जब बातचीत पूरी दुनिया में किसी भी समस्या का सबसे अच्छा समाधान है तो,

डंडा ले चलने का क्या मतलब है

यदि आपका मकसद साबित करता है कि डंडा आवश्यक है,

तो यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कानून के डंडे से बड़ा कोई भी डंडा कम से कम भारत में नहीं है

 

धन्यवाद

लेखक: के पी सिंह

03042018

 

 

 

About kpsingh

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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One Comment on “सुप्रीम कोर्ट के बहाने”

  1. सर, 02 अप्रैल को भारत बंद किया गया |इस बंद के समर्थन में जुटी भीड़ ये नहीं जानती थी कि बंद का उद्देश्य क्या है |आज भी अधिकांश जनसंख्या बुद्धिहीनता का परिचय दे रही है |

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