समाज शास्त्र का उद्भव एवं भारत में विकास

समाज शास्त्र का उद्भव एवं भारत में विकास 

समाज शास्त्र का इतिहास 150 वर्ष से अधिक पुराना नहीं है ।

19 वीं शताब्दी के यूरोप में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं बौद्धिक परिस्थितियों ने,

समाज शास्त्र के उद्भव एवं विकास में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान किया है ।

इस समय  तक यूरोप में धर्म, समाज और राज्य के पारस्परिक संबंध विघटित होने लगे थे ,

जिसके कारण राज्य तथा समाज के दैवीय उत्पत्ति ,

के सिद्धांत के स्थान पर इनकी उत्पत्ति में मानवीय प्रयत्नों के योग दान पर जोर दिया जाने लगा था ।

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों के फलस्वरूप ,

समाज के स्वरूप में परिवर्तन हुआ और पुरानी संरचना के  स्थान पर नई संरचना विकसित हुई।

इसकी निम्नलिखित विशेषताएं थीं :

●राजतंत्र के स्थान पर लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का विकास हुआ ।

●कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था के आधार पर औद्योगिक अर्थव्यवस्था का जन्म हुआ ।

●गावों से नगरों की तरफ प्रवसन तेज हुआ ।

●सदियों से निर्मित सामुदायिक संबंधों और दबाव वाली ,

●सामूहिकता के स्थान पर व्यक्तिवादी विचारधारा का उदय इसी काल में हुआ ।

सामाजिक रूपांतरण की इस प्रक्रिया में फ्रांस की राज्य  क्रांति 1789 का प्रमुख स्थान है ।

फ्रांस की यह क्रांति स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्वता पर आधारित थी ।

सेंट साइमन की अवधारणाओं एवं फ्रांस की राज्य क्रांति से ,

अगस्त्य काम्टे अत्यधिक प्रभाव हुए ।

काम्टे के गुरु थे सेंट साइमन ।साइमन का काल खंड 1760 से 1825 है। 

समाज शास्त्र की पहली पढ़ाई

पूरी दुनिया में समाज शास्त्र की पहली पढ़ाई की बात करें ,

तो सर्व प्रथम इसकी पढ़ाई अमेरिका के येल विश्वविद्यालय में शुरू हुई थी ।

समाज शास्त्र को अन्य सामाजिक विज्ञानो से पृथक एक स्वतंत्र एवं वैश्विक विज्ञान बनाने  का श्रेय,

फ्रांसीसी विद्वान इमाइल दुरखीम को जाता है ।

समाज शास्त्र के आविर्भाव से ठीक पहले तीन विचारकों रूसो, एडम फारगयूशन एवं हीगल के चिन्तन ने सेंट साइमन एवं काम्टे को प्रभावित किया था ।

●एडम फारगयूशन के अनुसार समाज पारस्परिक रूप से संबद्ध संस्थाओं की एक प्रणाली है ।

●हीगल के अनुसार समाज में परिवर्तन चेतना अथवा विचार में परिवर्तन किया कारण होता है ।

●इन्होने इतिहास की व्याख्या द्वंद्वतमक पद्धति के अनुसार की है ।

●हीगल के अनुसार चेतना में परिवर्तन के तीन स्तर हैं ।

●सबसे पहले किसी विचार का उदय होता है ।

●दूसरे स्तर के अंतर्गत अनेक विचारों की अभिव्यक्ति के बाद परस्पर विरोधी विचारों में संघर्ष होता ।

●तीसरी स्थिति में विचारों का समन्वय होता है ।

●हीगल इन्हें वाद,विवा,प्रतिवाद एवं समन्वय की स्थितियों में वर्गीकृत करते हैं।

●बोटोमोर के अनुसार 18 वीं शताब्दी की बौद्धिक परिस्थितियां समाज शास्त्र के उदय में सहायक प्रमाणित हुईं ।

भारत में समाज शास्त्र का विकास 

भारत में समाज शास्त्र का विकास कैसे हुआ आइए जानते हैं ।

भारत में सर्व प्रथम 1914 में बम्बई विश्व विद्यालय में समाज शास्त्र का अध्ययन कार्य प्रारंभ हुआ था ।

शुरुआत में समाज शास्त्र को राजनीति विज्ञान के साथ मिला अध्ययन किया गया था ।

बम्बई विश्वविद्यालय के बाद भारत में समाज शास्त्र की पढ़ाई उस्मानिया और मैसूर विश्वविद्यालय में प्रारंभ थी ।

1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बृजेंद्र नाथ शील के प्रयत्नों के कारण ,

अर्थशास्त्र के साथ समाज शास्त्र का अध्ययन कार्य प्रारंभ हुआ था ।

1919 में भारत में पहली बम्बई विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र विभाग की स्थापना हुई थी ।

1921 में लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विषय के साथ समाज शास्त्र का अध्ययन प्रारम्भ हुआ था ।

लखनऊ विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष  के रूप में डाक्टर राधा कमल मुखर्जी को बिठाया गया था ।

डाक्टर जी एस घुरिए बम्बई विश्वविद्यालय,

डाक्टर पी मुखर्जी लखनऊ विश्वविद्यालय तथा

डाक्टर आर वाडिया मैसूर विश्व विद्यालय से सम्बद्ध थे। ।

भारतीय समाज शास्त्र में विकास की तीन प्रवृत्तियां पाई जाती हैं,जो इस प्रकार हैं

:● पाश्चात्य समाज शास्त्रीय परम्परा से प्रभावित ।

●परम्परागत भारतीय चिन्तन से प्रभावित ।

●पाश्चात्य एवं भी समाज शास्त्रीय परम्पराओं के समन्वित चिन्तन से प्रभावित ।

डॉक्टर जे एच हटटन एवं मजूमदार ने भारतीय जाति व्यवस्था पर अपनी सूक्ष्म विवेचना प्रस्तुत की है ।

डॉक्टर घुरिए ने 1952 में इंडियन सोशियोलाजी सोसायटी की स्थापना की थी।

यहीं से घुरिए के सम्पादन में  सोशियोलाजिकल बुलेटिन का प्रकाशन हुआ था ।

डाक्टर एम एन निवासी शास्त्री का अध्ययन दक्षिण के कुर्ग प्रदेश की दुर्ग जनजाति पर आधारित है ।

शास्त्री ने भारत मे जाति के संदर्भ में होने वाले परिवर्तनों के लिए संस्कृति करण नामक अवधारणा प्रस्तुत की है ।

●समाज शास्त्र का अध्ययन अमेरिका 1876 ।

●फ्रांस 1889 ।

● इंग्लैंड 1907।

●भारत 1 914

●मिस्र 1924

स्वीडन 1947।

 

●ByKPSINGH

         17042018 

 

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About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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