गौमाता हमें मंदिर जाने और तीर्थ करने से भी ज्यादा पुण्य कमाने का मौका देती है

गौमाता हमें मंदिर जाने और तीर्थ करने से भी ज्यादा पुण्य कमाने का मौका देती है

प्राचीन काल में मनुष्य की समृद्धि का आंकलन उसकी गौसंख्या के आधार पर किया जाता था |
भारत में वैदिक काल से ही गायों को अत्यन्त महत्व दिया गया है |
समुद्र मंथन के समय जो चौदह रत्न प्रकट हुए थे उनमें से गौ कामधेनु भी एक रत्न है |
शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य योनि सभी योनियों में श्रेष्ठ है क्योंकि मनुष्य अपना जीवन गौमाता की छाया में बिताकर जीवन को धन्य कर सकता है |
जब भी हम किसी मंदिर या तीर्थ करने जाते हैं तो हमें वहाँ पर एक, दो तीन, पाँच या दस देवी – देवता के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है |
पूरी पृथ्वी पर ऐसा कोई देवस्थल या तीर्थ नहीं है जिसमें हजारों देवता एक साथ हों |
ऐसा दिव्य स्थान, दिव्य मंदिर या तीर्थ स्थल हिन्दूओं के लिए गौमाता से बढ़कर कोई नहीं है |
गौमाता के दर्शन मात्र से ऐसा पुण्य प्राप्त होता है जो बड़े – बड़े धर्म और दान कर्म से भी प्राप्त नहीं हो सकता है |
स्पर्श करने मात्र से ही गौमाता मनुष्य के सभी पापों को नष्ट कर देती हैं |
धर्म ग्रन्थ में बताया गया है कि यदि समस्त देवी देवता और पितरों को एक साथ प्रसन्न करना हो तो
गौभक्ति या गौसेवा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है |
भविष्यपुराण में लिखा है कि सभी 68000 तीर्थ और 33000 देवी देवता गाय में वास करते हैं |
गौमाता के पृष्ठ भाग में सींग के आधार पर ब्रह्मा का वास है, गले में विष्णु का, मुख में महादेव का, मध्य में समस्त देवताओं, रोमकूपों में ऋषिगण,
पूँछ में अनंतनाग, खुरों में समस्त पर्वत, गौमूत्र में गंगा नदी, गौमय में लक्ष्मी और नेत्रों में सूर्य – चन्द्र हैं |
गाय की हर चीज़ गुणकारी एवं सर्वोत्तम है |गरूड़ पुराण में एक श्लोक लिखा हुआ है –
‘ गोमूत्रं गोमयं दुग्धं गोधूलिं गोष्ठगोष्पदम् |
पक्कसस्यान्वितं क्षेत्रं दृष्टा पुण्यं लभेद् ध्रुवम || ‘
इसका अर्थ है कि गौमूत्र, गोबर, गौदुग्ध, गोधूलि, गौशाला, गौखुर और पके हुए हरे भरे खैत नजर भर देख लेने से पुण्य की प्राप्ति होती है |

गौमूत्र –

शास्त्रों के अनुसार गौमूत्र को गंगाजल के समान पवित्र माना गया है
क्योंकि शास्त्रों में बताया गया है कि गौमूत्र में गंगा का वास होता है |
गौमूत्र से बहुत सारी बीमारियाँ दूर हो जाती हैं इसलिए आयुर्वेद में गौमूत्र को औषधि के रुप में प्रयुक्त किया जाता है |
गरूड़ पुराण के अनुसार यदि मनुष्य गौमूत्र का सिर्फ दर्शन कर ले तो उसे पुण्य और लाभ दोनों प्राप्त होते हैं |

गोबर –

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार गौमाता के गोबर में देवी लक्ष्मी का वास होता है, इसलिए सभी मांगलिक कार्यों में गाय के गोबर का उपयोग किया जाता है |
किसी भी स्थान को पवित्र करने के लिए गाय के गोबर से लीपा जाता है |
सबसे अधिक गाय के गोबर का प्रयोग पुजा स्थल या विवाह के मंडप में किया जाता है ताकि वह जगह पवित्र हो जाय,
इसलिए श्रद्धाभाव से गाय के गोबर को देखने मात्र से पुण्य की प्राप्ति हो जाती हैं |

गोदुग्ध –

प्राचीन काल से लेकर आज तक गाय के दूध को अमृत तुल्य माना जाता है |
गोदुग्ध के निरन्तर प्रयोग से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है जिससे कोई रोग शरीर के पास फटकता भी नहीं है |
गोदुग्ध पीने वाले व्यक्ति कैंसर जैसे भयानक रोग से भी बचे रहते हैं |
इसका प्रयोग कई तरह की बीमारियों की दवा बनाने में भी प्रयुक्त किया जाता है |
जो भी गाय को दूध देते हुए देख लेता है उसे निश्चित रुप से शुभ फल और पुण्य की प्राप्ति होती है |

गोधूलि –

जब गौमाता अपने पैरों से जमीन खुरचती है तो उस समय जो धूल उड़ती है उसे गोधूलि कहते हैं |
गरूड़ पुराण के अनुसार गौमाता के पैरों से खुरचने पर जमीन से निकली हुई धूल पवित्र होती है,
उसे देखने मात्र से मनुष्य पुण्य का भागी बन जाता है |

गौशाला –

गौशाला को भी मंदिर के समान पवित्र और पूजनीय माना गया है,
इसलिए जो मनुष्य नित्य गौशाला जाकर गौ सेवा करता है उसे श्रीकृष्ण का आशीर्वाद मिलता है और पुण्य प्राप्त होता है |
यदि कोई मनुष्य किसी कारणवश गौसेवा नहीं कर पाता है तो वह
रोजाना गौशाला को मंदिर के समान भाव से दर्शन और नमन करने से भी पुण्य प्राप्त कर सकता है |

गौखुर –

शास्त्रों के अनुसार गौमाता के पैरों में तीर्थ होता है |
जब गौमाता अपने पैरों से जमीन खुरचती है तो इस प्रक्रिया को गौखुर कहते हैं |
इस प्रक्रिया में पैरों में लगी मिट्टी का रोजाना तिलक लगाने से सारे तीर्थों का फल प्राप्त होता है और पैरों के दर्शन करने से पुण्य और लाभ दोनोॉ प्राप्त होते हैं |

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दोस्तों, गाय की महिमा का जितना गुणगान किया जाय कम ही प्रतीत होता है |
वेद, उपनिषद, पुराण, शास्त्र आदि में कोई ऐसा धर्मग्रंथ नहीं है जिसमें गौमाता को अतुलनीय नहीं बताया गया हो |
हैरानी की बात है कि भारत जैसे धार्मिक और हिन्दू देश में गायों की दुर्दशा सबसे अधिक हो रही है, गौहत्या अपने चरम पर है |
जिसके सुनने मात्र से आँखें रो पड़ती हैं, हृदय चीत्कार उठता है |
यदि हमें अपनी संस्कृति को बचाये रखना है  तो  गौरक्षा अत्यंत आवश्यक है |इसी निवेदन के साथ आपका साथी

         

              प्रमोद   कुमार

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मेंने ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन राजस्थान में कम्पलीट किया |इसके बाद B. Ed कर्नाटक से किया | लेखन की चाह बचपन से ही थी, कॉलेज आते आते इसमें कुछ निखार आ गया |कॉलेज में यह स्थिति थी कि यदि कोई निबंध प्रतियोगिता होती और उसमें मेरे शामिल हो जाने से प्रतियोगिता दूसरे और तीसरे स्थान के लिए रह जाता | वापस राजस्थान आने पर अपना विद्यालय खोला ,सरकारी शिक्षक बनकर त्याग पत्र दे दिया |बिजनेस में एक सम्मानित ऊँचाई को पाकर धरातल पर आ गया |अब अपने जन्म स्थल पर कर्म कर रहा हूँ, जहाँ शिक्षा देना प्रमुख कर्म है | बचे समय में लिखने का अपना शौक पुरा करता हूँ |

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