चौरी चौरा कांड की हकीकत

चौरी चौरा कांड की हकीकत 

चौरी चौरा कांड की हकीकत क्या है क्या नहीं है, इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि,

भारतीय इतिहास की ऐसी घटना है जिसे भारत का बच्चा बच्चा कभी भूल नहीं सकता।

इतिहास में जब जब जोश जज्बे और जुनून की बात चलेगी,

तब तब एक तरफ कायर सिंधिया टाइप के राजे

रज वाडे़ तो दूसरी तरफ आम से आम आदमी जो

चौरी चौरा जैसी घटनाओं को धरातल में उतारते

थे और इस भ्रम में रहते थे कि देश आजाद होगा

तो उन्हें भी आजादी मिलेगी, वे हरदम याद किए जाएंगे। 

आधी अधूरी आजादी तो नसीब हुई लेकिन यह किसके लिए थी,

यह आज तक समझ में नहीं आया।

खैर अब बात करते हैं चौरी चौरा जैसी इतिहास प्रसिद्ध गाथा की, कुछ इस तरह। 

चौरी चौरा कांड पर कुछ भी लिखने से पहले मैं

इस कांड में फांसी की सजा पाने वाले लोगों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

चौरी चौरा कांड यद्यपि इतिहास का परित्यक्त अध्याय सा है कुछ लोगों के लिए,

लेकिन सच है कि इसके बिना कभी भी भारत की

आजादी का आंदोलन समग्रता से वर्णित नहीं किया जा सकता है। 

चौरी चौरा कांड की कथा 

चौरी चौरा कांड की हकीकत जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि,

यह कांड कब और क्यों हुआ जबकि तत्कालीन भारत में असहयोग आंदोलन जारी था।

5 फरवरी 1922 को संयुक्त प्रांत के गोरखपुर

जिले में चौरी चौरा नामक स्थान पर कांग्रेस व खिलाफत आंदोलन के,

एक जुलूस पर गोली चलाए जाने के कारण से भड़की जनता ने थाने में आग लगा दी,

फलस्वरूप इसमे एक दारोगा व 21 हवलदारों की मौत हो गई थी।

बढती हिंसक गतिविधियों के कारण तब गांधी जी

ने  बारदोली  में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक को बुलाया।

इस बैठक में चौरी चौरा कांड के कारण सामूहिक

सत्याग्रह व असहयोग आंदोलन स्थगित करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

और अंतत:12 फरवरी 1922 को समाप्त हो गया असहयोग आंदोलन। 

मोती लाल नेहरू, सी आर दास, जवाहर  लाल

नेहरू, सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने गांधीजी की इस प्रतिक्रिया की आलोचना की थी।

जहां तक पूरे देश की बात है तो देश के विभिन्न भागों में इसकी मिली जुली प्रतिक्रिया हुई। 

सरकार ने तब क्या किया था 

चौरी चौरा कांड की हकीकत में अगली हकीकत यही है कि,

तब सरकार ने मौके का फायदा उठाकर कई बड़े कामों का निर्णय लिया था।

10 मार्च 1922 को गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया था।

18 मार्च 1922 को अहमदाबाद के शेषन जज

ब्रूम फील्ड की अदालत में गांधीजी पर मुकदमा चलाया गया।

गांधीजी को 6 वर्ष की सजा सुनाई गई लेकिन गांधी जी की बीमारी ने उन्हें बचा लिया, 

यानी 5 फरवरी 1924 को गांधीजी को रिहा कर दिया गया था। 

धन्यवाद

KPSINGH 08062018

 

 

 

 

 

About kpsingh

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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