सहमति से बने समलैंगिक संबंध और सुप्रीम कोर्ट

सहमति से बने समलैंगिक संबंध और सुप्रीम कोर्ट 

सहमति से बने समलैंगिक संबंध और सुप्रीम कोर्ट का आलम यह है कि

आज सुप्रीम कोर्ट इसे अपराध नहीं मानता।

भले ही ऐसे संबंथ अब तक हमारी आपकी सबकी नजरों में

अतार्किक, असंगत और अवैध  रहे हों पर आज भारत

की सर्वोच्च अदालत ने इन्हें सहज स्वाभाविक और सही करार दिया है ।

बावजूद इसके आपको हमको या फिर सबको यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि

समाज से बड़ा कुछ भी नही होता।

न तो सुप्रीम कोर्ट और न ही संसार का कोई आदमी आदमी।

हमारा सम्पूर्ण ताना बाना सिर्फ इस सिद्धांत पर टिका है कि

कुछ भी हो, सही वही है जो आम आदमी से लेकर खास आदमी तक

सबके लिए बराबर उपयोगी और सहज स्वीकार हो। 

आओ बात करें समलैंगिकता की 

सहमति से बने समलैंगिक संबंध और सुप्रीम कोर्ट के संदर्भ में

अगर हम बात समलैंगिकता की करें अर्थात अगर यह जानना चाहें कि समलैंगिकता क्या है? 

तो इसका सीधा सरल और सही जवाब यही है कि किसी भी स्त्री या पुरुष को

अपने ही समान लिंग वाले के प्रति लगाव आकर्षक 

रोमांस और रोमांच के स्तर तक जाने की आदत या

प्रवृत्ति ही समलैंगिकता कहलाती है। 

जब कोई पुरुष किसी स्त्री की ओर न आकर्षित होकर अपने ही समान लिंग वाले

यानी किसी पुरुष से ही आकर्षित हो और उसके साथ

अपनी यौन तृप्ति की आकांक्षा रखता है तो यही समलैंगिकता है।

पुरुष के समान ही जब कोई स्त्री किसी पुरुष की ओर न आकर्षित होकर

अपने ही समान लिंग वाली यानी किसी स्त्री के प्रति आकर्षित होकर

उसके साथ अपनी यौन इच्छा पूर्ति की कामना करे तो उसे हम समलैंगिकता कहते हैं। 

समलैंगिकता और विश्व 

सहमति से बने समलैंगिक संबंध और सुप्रीम कोर्ट के संदर्भ में

अगर हम पूरी दुनिया की बात करें तो भारत के सुप्रीम कोर्ट ने

समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाकर

और इसका समर्थन करके

दुनिया के उन देशों के साथ अपना नाम जोड़ दिया है जो इसका हर तरह से समर्थन करते हैं।

भारत की समलैंगिक संबंधों की स्वीकृति से पहले पूरे

विश्व मे कुल 125 देश इसका समर्थन करते थे

लेकिन अब समलैंगिकता का समर्थन करने वाले कुल देशों की संख्या 126 हो गई है।

भारत अब समलैंगिकता का समर्थन करने वाला 126 वां देश है। 

समलैंगिकता का दुनिया के 126 देश यदि समर्थन

करते हैं तो पूरी दुनिया में 72 ऐसे भी देश हैं जो इसे अपराध मानते हैं।

पूरी दुनिया में 72 ऐसे देश हैं जो समलैंगिकता को सहमति प्रदान नहीं करते हैं।

दुनिया में आठ देश ऐसे भी हैं जो समलैंगिकता में मृत्यु दंड का प्रावधान करते हैं।

यानी यहां यह केवल अपराध नहीं बल्कि एक बड़ा अपराध है

जिसके लिए मौत की सजा दी जाती है।

दुनिया के जिन 72 देशों में समलैंगिकता को अपराध माना जाता है उनमें 45 ऐसे भी देश हैं

जहां महिला समलैंगिकता को माफ नहीं किया जाता।

और हां, दर्जन भर ऐसे भी देश हैं जो इस अपराध के लिए कैद की सजा का प्रावधान रखते हैं।

समलैंगिकता को लेकर पूरी दुनिया में सहमति असहमति

स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।

किसी देश का न्याय तंत्र इसे सहमति प्रदान करता है तो किसी देश की न्यायिक प्रणाली

इसे सिरे से खारिज करती है।

इसका एक मतलब यह भी हुआ कि आप न तो अंतिम सत्य हैं और न ही कोई पैमाना। 

आखिर क्या कहा है सुप्रीम कोर्ट ने? 

बहुत सारे किंतु परंतु, अथवा सही गलत के तमाम प्रश्नों को हल करने के बाद

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने आखिर कार 6सितम्बर 2018 को

आई पी सी की धारा 377 को अपराध की श्रेणी से निकाल ही दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसे अपराध मानने से समानता के कानून का उल्लंघन होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुराने कानून को अपराध की श्रेणी से अलग करते हुए

यह भी कहा कि दो वयस्कों के बीच एकांत में सहमति से बने संबंध अपराध नहीं है। 

सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कर के सही किया है या गलत किया है?

इसका कुछ भी उत्तर देने के पहले हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि

सुप्रीम कोर्ट ने पूरी की पूरी धारा 377 को अपराध की श्रेणी से नहीं निकाला।

सिर्फ उस भाग को अपराध की श्रेणी से अलग किया गया है

जिसमे दो वयस्कों की आपसी सहमति प्रमुख हो।

नाबालिग और अप्राकृतिक पशु यौनाचार अभी भी अपराध की ही श्रेणी में कैद हैं

जो सर्वथा उचित भी है।

यह ऐतिहासिक फैसला कुल पांच न्यायाधीशों ने दिया है जिनके नाम हैं

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस आर एफ

नरीमन, ए एम खानविलकर, डीवाई चंद्र चूड़, जस्टिस इंदू मल्होत्रा।

ध्यान देने की बात है कि इस पांच सदस्यीय खंड पीठ

के चार न्यायाधीशों ने अलग अलग फैसला दिया  लेकिन सभी फैसले सहमति के हैं।

जस्टिस दीपक मिश्रा ने दो फैसले दिए हैं एक स्वयं का दूसरा खानविलकर की तरफ से भी दिया ।

इस फैसले में मूलतः कोर्ट ने 2013 के सुरेश कौशल फैसले को खारिज किया है।

🔴158 साल पुराने कानून को भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने अतार्किक  अन्याय और मनमाना बताया है।

🔴बच्चों और पशुओं के साथ अप्राकृतिक संबंध अब भी अपराध की ही श्रेणी में रहेगा। 

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि

“यौन रुझान जैविक तथा प्राकृतिक है।

इसमें किसी तरह का भेदभाव मौलिक अधिकारों का हनन होगा।

अंतरंगता और निजता किसी की भी व्यक्तिगत पसंद होती है।

किसी भी व्यक्ति का इस पर बहुत कम नियंत्रण होता है कि वह किस स्त्री या पुरुष के प्रति आकर्षित हो।

दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने यौन संबंध पर आईपीसी की धारा 377 संवि के अनुच्छेद 14/15/19 और 21 का हनन करती है। 

समलैंगिक समुदाय को इससे बड़ी राहत मिली है।

ध्यान से देखें तो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से देश के समलैंगिक यानी

लेस्बियन,  गे,बाईसेक्सुअल, और ट्रांसजेंडर समुदाय को राहत मिली है।

एलजीबीटी समुदाय काफी लम्बे समय से

समलैंगिक संबंधों को कानून के दायरे में लाने की कोशिश कर रहा था।

6 सितम्बर 2018 वाला कोर्ट का यह फैसला

समलैंगिक संबंधों को अपराध घोषित करने वाली

धारा को चुनौती देने वाली पांच मुख्य याचिकाओं पर सुनाया गया है।

इसके बाद भारत भी उन देशों में शामिल हो गया है

जहां समलैंगिक संबंधों को कानूनी कवच प्राप्त है। 

इन पांच लोगों ने दी थी धारा 377 को चुनौती 

59 वर्षीय नव तेज सिंह जौहर।

इन्होंने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार जीता है।

2010 में यह मिशिगन यूनिवर्सिटी में पढा चुके हैं।

यह अशोका यूनिवर्सिटी में गेस्ट फैकल्टी हैं।

सुनील मेहरा

ये पत्रकार, लेखक, अभिनेता, निर्माता और निर्देशक हैं।

दो दशक से यह जौहर के साथी हैं।

रितु डालमिया

सेलिब्रिटी सेफ हैं रितु डालमिया।

कलकत्ता के मारवाड़ी परिवार में जन्मी 45 साल की रितू कई फूड शो  होस्ट कर चुकी हैं। 

कई किताबें भी लिखी हैं इन्होंने ।

अमन नाथ ये नीमराना होटल्स के मालिक हैं।

इतिहास और कला में किताबें लिखी हैं इन्होने।

61 साल के नाथ कवि भी हैं।

यह दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम ए हैं।

केशव सूरी

इनकी उम्र 33 साल है।

ये ललित सूरी हास्पिटेलिटी ग्रुप के कार्यकारी निदेशक हैं। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 07092018

 

 

 

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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