अब खतरनाक खतना की खैर नहीं है

अब खतरनाक खतना की खैर नहीं है

अब खतरनाक खतना की खैर नहीं है।
यह बात मैं आपको विश्वास पूर्वक इस लिए कहना
चाहता हूं
कि आज हमारी सभ्य दुनिया में इस तरह के
असंगत
अनैतिक, अमानवीय और बर्बर तौर तरीकों का
कोई काम नहीं है।
अब खतरनाक खतना की खैर नहीं है।
यह मैं इसी लिए कह रहा हूँ कि अब यह महा
घृणित और कष्टकारी प्रथा
किसी भी हालत में आनेवाले समय में शेष नहीं
रहने वाली।
क्यों कि इसका स्पष्ट संदेश समाज ही नहीं अब
कानून भी बाकायदा देने लगा है।
वैसे भी हमारी आज की संवैधानिक दुनिया में अब
खतरनाक खतना की खैर नहीं है। 

संविधान पीठ करेगी  खतना प्रथा की सुनवाई 

अब खतरनाक खतना की खैर नहीं कहने का असली कारण यह है कि

दाऊदी बोहरा समाज में सात साल की बच्चियों या नाबालिग लड़कियों का

किया जाने वाला खतरनाक खतना  को चुनौती न्यायालय में दी जा चुकी है।

इतना ही नहीं पूरी मानवता को शर्म सार करने वाली

दाउदी बोहरा मुसलमानों की

इस अमानवीय प्रथा की सुनवाई करने के लिए अब कोर्ट भी तैयार हो गया है।

इस प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अब पांच न्यायधीशों की खंड पीठ सुनवाई करेगी।

सोमवार 24 सितम्बर 2018 को भारत के प्रधान न्यायाधीश

दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने

इस मामले को संविधान पीठ के पास विचार के लिए भेजा है। 

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दाउदी बोहरा समुदाय के मुसलमानों में

सात साल की बच्चियों या नाबालिग लड़कियों का खतना किया जाता है।

यह प्रक्रिया बेहद बर्बर और असहनीय पीड़ा वाली होती है

क्योंकि इसमे बच्चियों के जननांग के एक खास भाग को काट कर निकाल दिया जाता है।

इस अमानवीय प्रक्रिया में होने वाले असहनीय दर्द के

कारण बच्चियों को घोर कष्ट से काफी समय तक गुजरना होता है।

वास्तव में इस प्रथा का कोई भी वैज्ञानिक या तार्किक कारण नहीं है

फिर भी पुरुष मानसिकता को सिंचित करने वाली इस प्रथा को

इस लिए अपनाया जाता है कि कोई भी महिला अपने पुरुष साथी की अनुपस्थिति में भी

उनकी जरूरत महसूस न करें और पवित्र बनी रहें।

किसी बेहद खतरनाक मानसिकता वाले आदमी की इस धूर्त सोच को

कार्य रूप में परणित करने वाली यह प्रथा सैकड़ों सालों से संचालित है। 

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची बात

कुछ भले मानुष लोगों की बदौलत इस खतना जैसी भयंकर पीड़ा दायी प्रथा को

जन हित याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी है।

कई दिनों तक मामले की मेरिट यानी महत्व पर सुनवाई के बाद

24 सितम्बर 2018 को प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा

एएम खानविलकर और डीवाई चंद्र चूड़ की पीठ ने केंद्र सरकार और

दाउदी बोहरा समुदाय के वकीलों की मांग स्वीकार करते हुए

केस पर विचार करने के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ को भेज दिया है।

केंद्र की ओर से पेश अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल और दाउदी बोहरा समुदाय की ओर से पेश

वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी दोनों ने इसका समर्थन किया।

हालांकि याचिका कर्ता का कहना था कि इस मामले को संवि पीठ नहीं भेजा जा सकता। 

खतना प्रथा को दी गयी चुनौती के आधार 

दाउदी बोहरा समाज के मुसलमानों में जन्म लेने वाली बच्चियों की

की जाने वाली खतना प्रथा को मिली सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का आधार यह है कि

सबसे पहले तो यह एक गैर कानूनी प्रथा है इसका कोई भी तार्किक और वैज्ञानिक कारण नहीं है।

कुल मिलाकर इसे मन गढंत अमानवीय और क्रूर प्रथा कहा जाए तो कतई गलत नहीं होगा ।

इस प्रथा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का दूसरा आधार यह है कि

इससे मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन होता है।

जिन अबोध बच्चियों के साथ यह अमानवीय कृत्य किया जाता है

यह उनके  मौलिक मानवाधिकारों का भयंकर उल्लंघन होता है।

इस गंदी प्रथा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का एक अधिकार यह भी है कि

इस प्रथा के कारण बच्चियों के निजी अंगों को छूने जैसी अमानवीय हरकत होती है

जबकि कानूनन आप किसी के निजी अंगों को उसकी सहमति के बगैर छू कर

एक घिनौना और गैरकानूनी काम ही करते हैं।

शायद इसीलिए कानून की किताब में किसी के निजी अंगों को छूने

और उनसे छेड़छाड़ करने पर पास्को कार्यवाही सुनिश्चित किया जाता है।

खतरनाक खतना की खैर नहीं का मतलब यही है कि इन सभी आधारों को आधार बनाकर ही

इस निहायत गलत प्रथा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। 

केंद्र की अपनी दलीलें 

केंद्र सरकार के रुख और मनतव्य की बात करें तो यह बिल्कुल साफ है कि

भारत सरकार इस प्रथा से सहमत नहीं है इसीलिए उसने भी यही दलील दी है कि

यह प्रथा जीवन के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।

केंद्रीय सरकार ने इसकी तुलना देवदासी प्रथा और सती प्रथा से करते हुए कहा है कि

जिस तरह उन्हें बंद किया गया है ठीक उसी तरह इस बर्बर अमानवीय प्रथा को भी

समाप्त करने की बेहद जरूरत है।

केन्द्रीय सरकार ने यह भी दलील दी है कि यह प्रथा कष्टकारी है

और इसे धर्म का हिस्सा कतई नही माना जा सकता। 

प्रथा को बचाने वाले 

बोहरा समुदाय की ओर से इस मामले में इस प्रथा के पक्ष में भी कई कुतर्क प्रस्तुत किये गये जो

इस प्रकार हैं :

बोहरा समुदाय ने यह कहा कि यह प्रथा 1400 साल से चली आ रही है।

इतना ही नहीं यह इसके साथ ही साथ धर्म का अभिन्न हिस्सा है।

बोहरा समुदाय ने यह भी कहा कि उन्हें संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के तहत संरक्षण मिले।

बोहरा समुदाय का अंतिम कुतर्क यह था कि यह प्रथा पवित्रता से जुड़ी मान्यता पर आधारित है। 

कोर्ट ने क्या कहा? 

बोहरा समुदाय के तर्कों को खारिज करते हुए कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा

कि केवल 1 400 सालों से चली आ रही परम्परा के

कारण कोई प्रथा धर्मिक और धर्म का अभिन्न हिस्सा

कतई नहीं हो जाती। यह एक सामाजिक दायरा जरूर हो सकता है

लेकिन इसे स्वास्थ्य नैतिकता पब्लिक आर्डर के संवैधानिक मूल्यों पर परखा जाएगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कहा कि यह महिलाओं की गरिमा को चोट पहुंचाता है।

महिला ऐसा करने दे तो क्या इससे पुरुष वर्चस्व की बू नहीं आती। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 26092018

 

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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3 Comments on “अब खतरनाक खतना की खैर नहीं है”

  1. Very nice sir.
    सर आपने मेरी बात को S.P सर तक पहुँचाने में मेरी मदद नहीं की।

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