आधार की आधारशिला तथ्यों के आइने में

 

आधार की आधारशिला तथ्यों के आइने में 

आधार की आधारशिला तथ्यों के आइने में नामक  इस

पोस्ट में आपकोआधार के संबंध में अनेक वह

जानकारियां मिलेंगी जो आपको सचमुच कम से कम होना ही चाहिए। 

आधार पर काफी समय से जारी घमासान आखिर अपने अंतिम मुकाम पर पहुंच ही गया।

26 सितंबर 2018 को आखिर कार भारतीय सुप्रीम

कोर्ट ने इस सवाल का जवाब दे ही दिया कि

आपका आधार कितनी सही है, कितना गलत है?

आपका आधार कितना उचित है, कितना अनुचित है?

या फिर आपका आधार कार्ड कितना संवैधानिक है,

और कितना असंवैधानिक है।

आप से आपका आधार कौन मांग सकता है, कौन नहीं मांग सकता?

आपको अपना आधार किसको दिखाना चाहिए और

किसको दिखाने तक की जरुरत नहीं है?

इस तरह के आधार से संबंधित जितने भी सवाल हैं या हो सकते हैं

सभी सवालों के सम्यक जवाब सुप्रीम कोर्ट ने दे ही दिया है। 

जिसका प्रमाण है आधार की आधारशिला तथ्यों के आइने में

नाम की यह पोस्ट जिसका इस समय आप सिद्दत से अवलोकन कर रहे हैं। 

आधार को मिली बुनियाद 

आधार की किफायती वैधता पर सुप्रीम कोर्ट की 26

सितंबर 2018 को लगाई गई ऐतिहासिक मुहर केवल मोदी सरकार के लिए नहीं

बल्कि उन सभी लोगों के लिए एक बहुत बड़ी राहत की बात है जो 

सरकारी सेवाओं और अनुदान में पारदर्शिता के स्थाई इच्छुक थे।

ऐसे लोग लगातार यह देख रहे थे कि आधार आधुनिक दुनिया में आज

किस तरह अनियमितताओं को रोकने में सहायक बन रहा है।

आधार के संपूर्ण अस्तित्व पर सुप्रीम कोर्ट का यह बेहद सामयिक फैसला

इसलिए कहीं अधिक नीर छीर और संतुलन से भरा हुआ है कि एक ओर जहां

उसने इस विशिष्ट पहचान पत्र के जरिए निजता के हनन  होने वाले आदेशों को

निराधार बताया वहीं दूसरी ओर उन नियमों उप नियमों को भी खारिज कर दिया जो

आधार के अनावश्यक इस्तेमाल को बढावा देने के साथ ही साथ

आधार की अप्रत्यक्ष रूप बुनियाद ही हिलाने का सबब बनने वाले थे। 

आधार का परिभाषित हुआ औचित्य 

सच कहें तो 26 सितंबर 2018 को पांच न्यायाधीशों द्वारा

आधार पर दिए गए एतिहासिक फैसले ने एक नहीँ

एकसाथ सैकड़ों सवालों को हल कर दिया है

जो इस आधुनिक उपलब्धि को औचित्य हीन बना रहे थे।

इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि

आमआदमी की सुविधा के लिए

उठाया कदम इसके औचित्य को लगातार औचित्य हीन बना रहा था।

सच कहें तो जिस तरह निजी कंपनियां आधार के

आंकड़ों को सहेज रही थीं इसका भी औचित्य समझ से परे ही था।

सुप्रीम कोर्ट ने निजी कंपनियों को आधार का इस्तेमाल करने वाले कानूनी प्रावधान को अर्थात

आधार अधिनियम की धारा 57 को रद्द करने के साथ ही साथ

आधार के विरोध में उतरे लोगों की ऐसी अतार्किक

दलीलों को भी खारिज कर दिया है कि

आधार कार्ड जासूसी का हथियार बन रहा है।

इसे राजनीति कहें या विडम्बना कि ऐसी अतार्किक बातें

उस कांग्रेस के जिम्मेदार लोग भी कर रहे थे जो आधार की आधारशिला का ही आधार रहे हैं।

आप जान लीजिये यह अपनी तरह का अनोखा विशेष मामला ही कहा जाएगा

जिसमें जिस दल ने आधार की आधार शिला रखी आज वही उसकी बुनियाद हिला रहा है। 

आधार कहां जरूरी  कहां गैर जरूरी 

अदालती निर्णय के अनुसार पैन कार्ड बनवाने के लिए आधार नम्बर देना अनिवार्य है।

साथ ही पैन नम्बर को भी आधार नम्बर से जोड़ना होगा।

आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए भी आधार नम्बर देना जरूरी किया गया है।

कल्याणकारी सरकारी योजनाओं का लाभ तभी मिलेगा

जब आप अपना केंद्रीय व राज्य स्तरीय योजनाओं में आधार नम्बर देंगे।

जांच एजेंसियां सुरक्षा के नाम पर डाटा ले सकती हैं लेकिन इसके लिए

उन्हें न्यायिक आदेश लेना होगा।

बैंक खाते के लिए आधार कार्ड बिलकुल जरूरी नहीं रह गया है।

अब बैंक आपसे खाता खोलते वक्त आधार कार्ड नहीं मांग सकते।

मोबाइल सिम लेने के लिए टेली काम कंपनियां आधार नम्बर नहीं मांग सकती।

बच्चों के एडमिशन के समय स्कूल आपसे या आपके बच्चे से आधार की मांग नहीं कर सकते ।

सीबीएसई, यूजीसी नेट और तमाम बोर्ड परीक्षाओं के लिए आधार नम्बर कोई जरूरी नहीं है।

आधार न होने से बच्चों को सरकारी सेवा से वंचित नहीं किया जा सकता है। 

आधार पर अदालत में हुआ फैसला कुल 1448 पन्नों का है।

इन पन्नों में सुप्रीम कोर्ट ने तीन अलग अलग आदेश दिया है।

जो इस प्रकार हैं 

आधार से लोगों की निगरानी करना संभव नहीं है।

सरकार डाटा सुरक्षा के लिए और उपाय करे।

डाटा स्टोर करने की अवधि छह माह से ज्यादा न हो।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह भी निर्देश दिया है कि

देश में अवैध रूप से घुसने वाले लोगों का आधार कार्ड न बन पाए

इसकी पुख्ता व्यवस्था की जाए। 

तथ्यों के आइने में आप सबका अपना आधार 

28 जनवरी 2009 को योजना आयोग ने यूआई डी ए आई को

अधिसूचित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया था।

23 जून 2009 को इंफोसिस के नंदन नीलकेनी यूआई डी ए आई के अध्यक्ष बनाए गए थे।

अप्रैल 2010 में यू आई डी ए वाई का लोगो और ब्रांड नाम आधार लांच किया गया।

7 फरवरी 2012 को आधार संख्या को आनलाइन सत्यापित करने की सेवा शुरू की गई थी।

1जुलाई 2018 को चेहरा आधारित सत्यापन सेवा को लांच किया गया।

2012 में हाईकोर्ट के सेवा निवृत्त जज के एस पुथ्थू स्वामी ने

बिना कानूनी आधार लागू करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

इस तरह आधार के खिलाफ किसी याचिका के जरिए विरोध की शुरुआत हुई।

23 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि

आधार संख्या नहीं होने के कारण किसी भी व्यक्ति को

कल्याण कारी योजनाओं से वंचित नहीं किया जा सकता।

मई 2017 में कांग्रेस के नेता जय राम रमेश ने आधार विधेयक को

धन विधेयक के रूप में पारित करने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

17 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने

आधार मामले की सुनवाई शुरू की थी।

7 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अखिल भारतीय परीक्षाओं में

छात्रों के पंजीकरण के लिए आधार आवश्यक या फिर कतई जरूरी नहीं है।

13 मार्च को आधार से योजनाओं को जोड़ने की समय सीमा

अनिश्चित काल के लिए बढाई गई थी। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 27092018

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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2 Comments on “आधार की आधारशिला तथ्यों के आइने में”

  1. कोर्ट का निर्णय सर्बोपरि है।
    कोर्ट के निर्णय में बदलाव सरकारें ही करती आई हैं ।
    वास्तव में आधार कार्ड एक ऐसा पहचान पत्र है,जिसका होना उचित है।
    मुख्य रूप से आधारकार्ड न होने से अपराधी निरंकुश हो जायेंगे।
    किसी गैर भारतीय की पहचान कठिन हो जायेगी।

    1. अदालत ने सब कुछ ठीक किया लेकिन सिम, बैंक आदि में अनिवार्यता खत्म करके शंका पैदा कर दिया है
      लगता सिम कंपनियों ने
      अदालत को हमराही बना लिया है।
      आतंकी
      बेधड़क सिम खरीद सकेंगे

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