सम्राट मान्धाता की कहानी

सम्राट मान्धाता की कहानी

सम्राट मान्धाता की कहानी एक ऐसी कहानी है जो

भारत के इतिहास को ही नहीं हम सब भारतीयों को गौरवान्वित करने वाली कहानी है।

सम्राट मान्धाता की कहानी वास्तव में भारत के प्रथम सम्राट की कहानी है।

अगर आप भारत के गौरव पूर्ण इतिहास को जानना चाहते हैं तो

आपको भारत के प्रथम सम्राट अर्थात सम्राट मान्धाता की कहानी अवश्य पढनी चाहिए

ताकि आप को इस तथ्य से वंचित न रहना पड़े

कि भारत के प्रथम सम्राट मान्धाता की कहानी अपने आप में अद्वितीय और बेजोड़ है।

सम्राट मान्धाता 

पौराणिक जन श्रुति और मान्यता के अनुसार मान्धाता

न केवल भारत के सम्राटों में प्रथम सम्राट थे बल्कि वह एक चक्रवर्ती सम्राट थे।

अपने समस्त पड़ोसी राजाओं को जीतकर उन्होंने दिग्विजय प्राप्त किया था ।

मान्धाता के शौर्य की प्रामाणिकता इसी में है सूर्य जहां से उगता था और जहां अस्त होता था

वह सम्पूर्ण क्षेत्र महाराजा मान्धाता के ही राज्य में शामिल था।

पौरव आनव हैहय द्रुहयु यह वह विशेष उल्लेखनीय राज्य हैं जिन्हें मान्धाता   ने विजित किया था।

जहां तक भारत के प्रथम सम्राट मा के समय की बात है तो

इनका काल 5000 वर्ष पूर्व का माना जाता है।

कौन थे मान्धाता के पूर्वज 

पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर यह बात कही जा सकती है कि भारत के 

प्रथम आर्य राजा मनु थे।

विदित हो कि मनु को मानवंश का प्रथम पुरुष भी कहा जाता है।

राजा मनु का नाम वैवस्वत मनु था।

कहते हैं मनु से पूर्व इस देश में अराजकता का आलम था।

इसके बाद परेशान लोोगों ने ही मनु को अपना राजा चुना था।

मनु को उसकी प्रजा उपज का 1/6 वां हिस्सा कर के रूप में देती थी।

वैवस्वत मनु पहले आर्य राजा थे यह बात कोई कपोल कल्पित नहीं है

बल्कि इसके प्रमाण महाभारत तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ में मिलते हैं

 महाभारत को आप एक बार धर्म ग्रंथ मानकर नकार भी सकते हैं

लेकिन आप अर्थशास्त्र को कैसे नकारेंगे क्योंकि वह एक प्रामाणिक ग्रंथ है।

मनु के प्रथम आर्य राजा बनने के बाद उसकी अगली

पीढ़ी के राज्य को मानवंश का राज्य कहा जाता है इतिहास में।

हिन्दू धर्म और मनु 

अगर हम हिन्दू धर्म की मान्यताओं की बात करें तो

हिन्दू धर्म के अनुसार वैवस्वत मनु इस संसार के पहले पुरुष थे।

इनके साथ जो प्रथम स्त्री थीं उनका नाम शतरूपा था।

यह एक विशेष संयोग वाली बात है कि संसार की सभी

भाषाओं में मनुष्य शब्द मैन या इसी तरह के शब्दों व उच्चारण से बने हैं।

मैन मनुज आदम मानव आदमी आदि जितने भी ज्ञात शब्द हैं

यह सभी इस मनु से प्रभावित प्रतीत होते हैं।

हिन्दू धर्म के अनुसार स्वयं मनु सहित कुल 14 मनु इस धरती पर हुए हैं।

इनमें 8 मनुओं का उल्लेख तो खुद महाभारत भी करता है।

श्वेत बाराह कल्प में कुल 14 मनुओं का उल्लेख है।

हिन्दू धर्म के 14 मनुओं को जैन धर्म में 14 कुलकर कहा गया है।

इन 14 मनुओं के नाम इस प्रकार हैं।

🔴स्वयं भू मनु 🔴स्रोचिष मनु 🔴यौत्तमी मनु 🔴तामस मनु🔴 रैवत मनु 🔴चाक्षुष मनु 🔴श्राद्ध देव मनु 🔴सावर्णि मनु 🔴दक्ष सावर्णि मनु 🔴ब्रह्म सावर्णि मनु 🔴धर्म सावर्णि मनु 🔴रुद्र सावर्णि मनु 🔴देव सावर्णि मनु 🔴इंद्र सावर्णि मनु।

विशेष बात यह भी है कि सावर्णि मनु के बारे कुछ जगह उल्लेख मिलता है कि

इनका आविर्भाव विक्रमी संवत प्रारंभ होने से 5630 वर्ष पूर्व हुआ था।

मनुस्मृति में उल्लेख है कि महाभारत में 8 मनु उल्लिखित हैं।

शतपथ ब्राह्मण में मनु को श्रृद्धादेव   कह कर पुकारा गया है।

श्री मद्गभागवत में उन्हें वैवस्व मनु और सृदधा कह कर पुकारा गया है। 

प्रथम मनु ने ही मनुस्मृति नामक ग्रंथ लिखा था। मनुस्मृति

आज मूलरूप में कहीं उपलब्ध नहीं है ।

मनु के समय एक प्रलय की घटना का भी वर्णन मिलता है, 

ठीक ऐसी ही घटना का वर्णन हजरत नूह के समय में भी है। 

मनु का वंश विस्तार 

मनु की सबसे बड़ी संतान को इक्ष्वाकु कहा जाता है। यह मध्य देश के राजा थे।

इनकी राजधानी अयोध्या थी ।

इनके बाद जो वंश इनसे चला उसका नाम सूर्य वंश था।

सूर्य वंश के ही प्रतापी राजा  राजा दिलीप, राजा रघु, राजा दशरथ और राजा राम थे।

नेदिष्ट तथा कारुष भी मनु के अन्य पुत्र थे।

वैशाली को बसाने वाले राजा विशाल नेदिष्ट के ही वंशज थे।

मनु के पुत्र कारुष ने कारुष नगरी बसाई जो बघेल क्षेत्र में विद्यमान थी।

सूर्य वंश के प्रतापी राजा इक्ष्वाकु के बड़े बेटे विपुक्षि ने अयोध्या की गद्दी संभाली।

इक्ष्वाकु के छोटे पुत्र निमि ने मिथिला को बसाया था। इसी वंश के राजा जनक की पुत्री सीता थीं।

मनु के वंशज इक्ष्वाकु के अयोध्या में राज्य स्थापित करने के 19 पीढ़ी बाद

इस वंश में अत्यंत प्रतापी राजा मान्धाता हुए थे।

इन्हीं मान्धाता की बारह पीढ़ी के बाद राजा हरिश्चंद्र अयोध्या की गद्दी पर बैठे थे।

हरिश्चंद्र को संसार का प्रत्येक व्यक्ति जानता है।

हरिश्चंद्र के बाद इसी वंश में राजा दिलीप और भागीरथ जैसे नामचीन और प्रतापी राजा हुए हैं।

राजा दिलीप का पौत्र रघु भी प्रतापी राजा हुआ

जिसकी दिग्विजय का वर्णन महाकवि कालिदास ने

अपने महान ग्रंथ रघुवंश में किया है। 

रघु का पुत्र अज था और इन्ही राजा अज के पुत्र राजा दशरथ माने जाते हैं।

दशरथ के पुत्र भगवान् राम को कौन नहीं जानता ।राम इक्ष्वाकु वंश की 65 वीं पीढ़ी थे।

सम्राट मान्धाता एक दिग्विजयी राजा थे जिनके बारे में कहा जाता है कि

वे इतने दयालू भी थे कि उन्होने अपने जीवन में जितने

भी युद्ध लड़े और जीते उनमें कभी भी पराजित पक्ष के साथ बर्बरता कभी नहीं की।

उनके बारे में तो यह भी कहा जाता है वह अपना जीता हुआ राज्य भी केवल इस लिए छोड़ देते थे कि

कहीं पराजित राजा को कष्ट न हो।

सम्राट मान्धाता ने कभी भी कोई ऐसा काम नहीं किया कि उनके

हितैषी और गैर हितैषियों का कल्याण न होकर उनका पतन या विनाश हो जाए।

सम्राट मान्धाता के समकालीन राजवंशों में पौरव वंश,

कान्यकुब्ज वंश और एल वंश कुछ शक्ति शाली वंशों में गिने जाने वाले राजवंश थे।

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि हमारा अतीत बेहद उदीयमान रहा है

जिसके बारे में हमे इतिहास के हर शब्द से पता चलता है।

आशा है कि आपको यह पौराणिक तथ्यों से भरी हुई पोस्ट अच्छी लगेगी। 

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 07102018

 

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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2 Comments on “सम्राट मान्धाता की कहानी”

  1. सम्राट मान्धाता की कहानी हमने पढ़ा और मुझे बहुत अच्छी लगी ,
    आशा करता हूँ की अगली बार फिर ऐसी ही कहानी मुझे पढ़ने को मिले ।
    मै आपको बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूँ सर जी।

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