सम्राट भरत की कहानी

सम्राट भरत की  कहानी

सम्राट भरत की कहानी तभी से प्रारंभ होती है जब

मान्धाता काल में ही पौरव अथवा पुलवे वंश की स्थापना हुई थी।

भविष्य में इसी पुरु वंश  और पुरु राज्य के महान सम्राट राजा दुष्यंत हुए थे।

राजा दुष्यंत के बारे एतिहासिक अनुश्रुतियों की भरमार है,

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि राजा दुष्यंत कल्पना निर्मित कोई नरेश हैं।

संस्कृत के महान कवि कालिदास जी ने अपने प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम में

जिस महान और प्रतापी राजा का वर्णन करते हैं वर यही राजा दुष्यंत हैं।

कहा जाता है कि गंगा यमुना के दोआब में इनका भरापूरा और सम्पन्न राज्य स्थित था।

अनुश्रुति और राजा दुष्यंत 

प्राचीन लेकिन विश्वसनीय अनुश्रुति के अनुसार एक बार की बात यह है कि

राजा दुष्यंत शिकार के उद्देश्य से जंगल गए हुए थे।

राजा दुष्यंत जिस जंगल में शिकार खेलने गए थे उसी

जंगल के बीच से होकर भारत की महान ऐतिहासिक नदी मालिनी भी बहती थी।

एक संयोग यह भी था कि इसी नदी के तट पर भारत

के इतिहास में अद्वितीय ऋषि कण्व का स्वर्ग जैसी छवि वाला आश्रम था।

कण्व ऋषि के आश्रम से गुजरने वाली नदी के बारे में सच यह है कि

मालिनी नदी गढ़वाल के पहाडों से निकल कर आगे गंगा में विलीन हो जाती थी।

इसी मालिनी नदी के तट पर स्थित किनक स्रोत नामक गांव के बारे में कहा जाता है कि

वह तब भी था और वह आज भी स्थित है।

इसी जगह को भारतीय पौराणिक इतिहास में ऋषि कण्व का आश्रम माना जाता है। 

 

दुष्यंत और शकुंतला की भेंट 

सम्राट भरत की कहानी की आगे बढती हुई कहानी यह है कि

जब दुष्यंत जंगल से शिकार की फिराक में गुजर रहे थे तब वह प्यास से लगभग ब्याकुल थे।

राजा दुष्यंत और उनके शिकारी दस्ते ने जैसे ही जंगल में एक आश्रम देखा

तो सबको काफी राहत महसूस हुई ।

राजा दुष्यंत ने सभी को आश्रम के पास ही ठहरने को

कहकर खुद आश्रम में प्यास बुझाने के लिए जल की आशा में प्रवेश कर गए।

आश्रम में प्रविष्ट करने के बाद दुष्यंत को अंदर अत्यंत ही अतुलनीय सुंदर

सुशील और यौवन से भरपूर नव युवती शकुंतला मिली।

शकुंतला ऋषि कण्व द्वारा पालित थी।

शकुंतला पर मोहित होकर राजा दुष्यंत ने उससे वैवाहिक संबंध स्थापित कर लिया ।

चूंकि उस समय कण्व ऋषि आश्रम में नहीं थे इसलिए दोनों ने तय किया कि

जब ऋषि आ जाएंगे तभी शकुंतला को राजा अपने महल ले जाएंगे।

इसी सुंदरी शकुंतला और दुष्यंत के बीच संबंध

स्थापित होने के कारण इन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम भरत रखा गया ।

आगे चल कर इसी भरत के नाम से हमारे देश का नाम भारत पड़ा। 

राजा भरत का     कृतित्व और    व्यक्तित्व 

पुरु वंश के राजा दुष्यंत के उत्तर गामी ऐश्वर्य और यश से युक्त

राजा भरत की गणना महाभारत में उल्लिखित सोलह  श्रेष्ठ राजाओं में होती है।

कुछ समय तक के लिए राजा भरत का बचपन जंगल में ही अपनी मां के साथ बीता था ।

इस लिए इन्हें शेरों तक से खेलने का शौक तथा अनुभव था।

आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट भरत  का वंश भरत वंश कहलाया ।

कहा जाता है कि पश्चिम में सरस्वती नदी से शुरू होकर

पूर्व में अयोध्या के समीप तक का क्षेत्र सम्राट भरत के राज्य का हिस्सा थे।

सम्राट भरत की कहानी की एक खास कहानी यह भी है कि

सम्राट भरत ने अपने जीवन काल में गंगा यमुना और वर्तमान में अदृश्य सरस्वती नदी के तटों पर

सैकड़ों अश्वमेध यज्ञ किए थे। 

भरत का व्यक्तिगत  जीवन 

ऐतिहासिक विवरणी के अनुरूप राजा भरत ने विदर्भ राज की तीन कन्याओं से विवाह किया था।

यह भी वर्णन मिलता है कि सम्रट  भरत की तीनों रानियों से कुल तीन पुत्र हुए थे।

कहा जाता है कि भरत ने अपनी तीनों रानियों से कहा था कि यह पुत्र मेरे अनुरूप नहीं हैं।

पत्नियों ने मारे डर के इन पुत्रों को खत्म कर दिया ।

इस कृत्य के बाद भरत को अथाह यज्ञ और अनुष्ठान करने पड़े

तब जाकर भारद्वाज नामक एक पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

जनश्रुति तथा श्री मद्भागवत की कथा के अनुसार वंश बिखर जाने पर

सम्राट भरत ने मरुत्स्तोम यज्ञ किया था। इसी यज्ञ के बाद इन्हें

भारद्वाज नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

भारद्वाज जन्म से ब्राह्मण थे लेकिन भरत का पुत्र होने के कारण क्षत्रिय कहलाए।

कहा जाता है कि भारद्वाज ने स्वयं शासन नहीं किया ।

भरत के देहावसान के बाद अपने पुत्र वितथ को राज्य का भार सौंप कर

खुद वन को प्रस्थान कर गए थे।

कहा यह भी जाता है कि इसके बाद भरत के वंश का क्रमिक विवरण अप्राप्य है

लेकिन इसी वंश में एक हस्ती नामक राजा ने ही हस्तिनापुर की स्थापना की थी।

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 09102018

 

 

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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