मुख्यमंत्री सुपोषण घर योजना

मुख्यमंत्री सुपोषण  घर योजना 

मुख्यमंत्री सुपोषण घर योजना एक ऐसी योजना है जिसके जरिए

वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार कुपोषण के कलंक को न केवल मिटाना और धोना चाहती है

बल्कि वह इस योजना के जरिए उस सरकारी

उदासीनता को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहती जिसके कारण 

पोषण और स्वास्थ्य की दृष्टि से भारत का रिकार्ड  आज

बांग्लादेश जैसे पड़ोसियों से भी बदतर है।

उदाहरण के लिए हमारे पड़ोसी बांग्लादेश की शिशु

मृत्यु दर 48 /1000 है वहीं हमारे भारत में यही आंकड़ा 67/1000 है।

इसका मतलब यह हुआ कि बांग्लादेश में एक हजार

शिशु में 48 शिशु जन्म के समय मर जाते हैं जबकि हमारे देश में यह संख्या 67 है। 

मुख्यमंत्री की खास योजना 

मुख्यमंत्री सुपोषण घर योजना उत्तर प्रदेश सरकार के वर्तमान मुख्य मंत्री की

एक बेहद महात्वाकांक्षी योजना है, जिसका लक्ष्य

उत्तर प्रदेश के बेहद जरूरतमंद जिलों का कायाकल्प करना है।

मुख्यमंत्री कुपोषण घर योजना के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के कुल 10 जिलों में

ऐसी योजना चलाने का लक्ष्य है जिसके अंतर्गत

कुपोषण के शिकार जच्चा और बच्चा को राहत प्रदान करना है।

कुपोषण भारत में खासकर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश राजस्थान जैसे

बड़े प्रदेशों मेंएक कलंक के समान है। 

इसलिए इस कलंक को मिटाने के लिए उत्तर प्रदेश

सरकार ने एक खास योजना बनाया है जिसका नाम रखा गया है सुपोषण घर योजना। 

कैसी है यह योजना

मुख्यमंत्री सुपोषण घर योजना उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य 

विभाग द्वारा संचालित होने वाली  योजना है।

इस योजना की जिम्मेदारी बाल विकास मंत्रालय की होगी।

इस योजना को जिन जनपदों में संचालित किया जाएगा उनके नाम इस प्रकार हैं:

चित्रकूट, सोनभद्र, चंदौली, श्रावस्ती, बहराइच, फतेहपुर,

सिद्धार्थ नगर  बलराम पुर, गोंडा और सीतापुर को भी इसमें शामिल किया गया है।

इस योजना को जिस जिले में संचालित किया जाएगा उस जिले के

28 सीएचसी तथा पीएचसी यानी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में

तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में छ: छ:6-6 बेड

जन्मजात अति कुपोषित बच्चों के लिए आरक्षित किए जाएंगे।

इन केन्द्रों की अतिरिक्त सुविधा को बाल विकास मंत्रालय देखेगा।

जैसे सलाहकार, स्टाफ नर्स, केयर टेकर  रसोइया और अन्य

जरूरी कर्मचारियों की भी व्यवस्था करेगा।

ये सभी लोग प्रसूता को स्तनपान कराने का महत्व और बच्चे की देखभाल के उचित तरीके बताएंगे।

अस्पताल से छुट्टी देते समय भी आगे क्या करना है, इसकी सलाह भी मां को दी जाएगी।

सलाह पर अमल हो रहा है या नहीं इसके लिए प्रत्येक 15 दिन पर चार बार निगरानी की जाएगी।

इतना ही नहीं हर मंगलवार को बाल विकास

परियोजना अधिकारी और शनिवार को डीपीओ यानी जिला कार्यक्रम अधिकारी

मुख्यमंत्री सुपोषण घर योजना के घरों का निरीक्षण करेंगे।

अधिक से अधिक महिलाएं यहां प्रसव के लिए आएं

इसके लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को बतौर प्रोत्साहन राशि

प्रति महिला 50 रुपये तथा मुख्य सेविका को 200 रुपये मिलेंगे।

यह योजना जनवरी 2019 से मार्च 2020 तक चलेगी।

इस योजना पर कुल 5.33 करोड़ रुपये का खर्च  होने का अनुमान है। 

कुपोषण किस बला का नाम है

मुख्यमंत्री सुपोषण घर योजना का एक मात्र और सबसे बड़ा कारण यह है कि

भारत में 6 साल से कम आयु के बच्चों, प्रसूताओं तथा माताओं को कुपोषण ने घेर रखा है।

इस कारण यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर यह कुपोषण कौन सी बला है?

वैसे तो कुपोषण की ढेर सारी परिभाषाएं हैं अर्थात

सभी ने अपनी अपनी तरह से इसे स्पष्ट किया है लेकिन

सबसे सरल शब्दों में कुपोषण वह शारीरिक मानसिक स्थिति है

जब शरीर को जरूरी पोषक  तत्व नहीं मिल पाते हैं या किसी तत्व की अधिकता से

शारीरिक और मानसिक विकास अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पाता है।

शरीर में आवश्यक तत्वों की कमी या अधिकता ही कुपोषण है।

इसे आप इस तरह भी परिभाषित कर सकते हैं कि शरीर के लिए

आवश्यक संतुलित आहार का लम्बे समय तक न मिलना ही कुपोषण है।

कुपोषण एक ऐसा चक्र है जिसमें 6साल से कम उम्र के बच्चों ,

प्रसूताओं तथा दुग्ध पान कराने वाली महिलाओं के फंसने की संभावना सबसे ज्यादा होती है।

जहां तक बात भारत में कुपोषण की स्थिति की है तो मध्यप्रदेश, 

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, ओडिशा भारत के सबसे ज्यादा कुपोषण के शिकार प्रदेश हैं। 

कुपोषण अंतरराष्ट्रीय बन गया है 

आज कुपोषण अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का एक ऐसा विषय बन गया है

जिस पर अगर समाज और सरकारों ने समय रहते ध्यान नहीं दिया तो

इससे भी भयावह स्थिति आने से कोई भी तरीका नहीं रोक पाएगा।

आपको आश्चर्य होगा

आज कुपोषण खतरनाक और पूरे विश्व समुदाय के लिए इतना भयंकर बन गया है कि

विश्व बैंक ने इसकी तुलना ब्लैक डेथ से की है।

आपको शायद पता न हो ब्लैक डेथ वह महामारी जी हां महामारी है

जिसने 18 वीं सदी के यूरोप में जनसंख्या के  एक बहुत बड़े हिस्से को निगल लिया था ।

सच कहें तो कुपोषण ब्लैक डेथ से भी बड़ी महामारी

का नाम है क्योंकि अगर आपको को बीमारी या महामारी अपना शिकार बनाती है तो

आपको या किसी को भी पता जरूर चलता है।

लेकिन इस कुपोषण की समस्या को कई बार लोग तब

तक गंभीरता से नहीं लेते जब तक उनका घातक नुकसान सुनिश्चित नहीं हो जाता। 

भारत और कुपोषण   की दास्तां 

भारत और कुपोषण की कहानी कतई खुशी देने वाली नहीं है।

SRS सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की बात सच मानें तो भारत

दुनिया के स्वास्थ्य मानकों में खासा पिछड़ चुका है।

2014 के कुछ आंकड़ों की मानें तो हम से अच्छी स्थिति में 

इस मसले में सबसे खराब देश यानी इथियोपिया और चाड भी आ चुके हैं।

देखा जाए तो इसका कारण भले ही चिकित्सा की कमी माना जाए लेकिन

एक सच यह भी कहा कि यह समस्या सामाजिक भी है।

हमारे समाज में अपने ही स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही आज तक खास नहीं बन पाई है।

सबसे दुखद बात तो यह है कि आज भी ग्रामीण इलाकों में जहां

फैशन के सारे औजार मौजूद हैं वहां ज्यादातर लोगों को यही नहीं पता कि कुपोषण कहते किसे हैं।

भले ही हर साल कुपोषण के कारण लाखों बच्चों की असमय मौत हो जाती हो

और सैकड़ों महिलाएं समय से पहले चल बसती हों इसके बाद भी

कुपोषण के प्रति जितनी और जैसी जागरूकता की दरकार है

उसका दूर दूर तक नितांत ही अभाव है।

इस लिए निष्कर्ष रूप में हम यही कहेंगे कि मुख्यमंत्री सुपोषण घर योजना को

सफल होना ही चाहिए वर्ना ढाक के वही तीन पात तो पहले से ही यहां कब्जा जमाए हुए हैं।

ऐसा नहीं है कि कुपोषण का कारण अनाज की अनुपलब्धता है

पर हां जागरूकता की कमी भारत की शिक्षा प्रणाली

का व्यर्थ हो जाना इसका कारण जरूर है। 

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 21112018

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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