भगत सिंह जिंदाबाद हैं और रहेंगे

भगत सिंह जिंदाबाद   हैं और रहेंगे

भगत सिंह जिंदाबाद हैं और रहेंगे इस बात में रत्तीभर किसी को शक नहीं है और न ही होना चाहिए

क्योंकि जिसे भी अपने देश से प्यार होगा वह भले ही गांधीजी को न जानता हो

मगर कभी ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह सहीद ए आजम भगत सिंह को न जाने।

भगतसिंह ईश्वर की वह अमर कृति हैं जिन्हें शायद ईश्वर भी बार बार नहीं बना सकता

इसीलिए भगत सिंह कई बार नहीं बस एक बार ही जन्म लेते हैं।

भगतसिंह वही भगतसिंह हैं जिन्होंने 30 अक्टूबर 1928 को

जेम्स ए स्काट द्वारा चलवाई गई लाला लाजपत राय पर लाठी चार्ज

और फिर उससे हुई मौत का बदला 17 दिसंबर 1928 को

लाहौर रेलवे स्टेशन पर चंद्रशेखर आजाद और राजगुरु के साथ सांडर्स की हत्या करके लिया था।

भारत माता का अनोखा सपूत था भगतसिंह जो

आदमी के आदमी पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ था। 

भगत सिंह से डरते थे गांधी और अंग्रेज 

भगत सिंह जिंदाबाद हैं और रहेंगे केवल एक जुमला

भर नहीं है बल्कि यह समय और समाज की सच्चाई है।

जहां तक बात भगतसिंह से गांधी और अंग्रेजों के डरने की बात है तो यह बात पूरी तरह से सही है।

अगर यह बात सही न होती तो सुबह 6 बजे होने वाली फांसी 11घंटे पहले

रात के अंधेरे में चोरों की भांति चुपके से कभी नहीं दी जाती।

इतना ही नहीं अगर गांधीजी और अंंग्रे भगतसिंह सिंह के मृत शरीर तक से न डरते होते

तो भगतसिंह को फांसी देने के बाद उनके लटके हुए मृत शरीर को

उतार कर उसे आरी चलाकर टुकड़े टुकड़े कभी न करते।

इतना ही नहीं अगर गांधी जी और अंग्रेज भगतसिंह के मृतक शरीर के कटे हुए टुकड़ों से न डरते

तो मृतक शरीर को आरी से टुकड़े टुकड़े करने के बाद उन्हे बोरे में भरकर न भागते।

इतना ही नहीं गांधीजी और अंग्रेज अगर भगतसिंह से न डरते

तो कटे हुए शरीर के टुकड़ों से भरे बोरों को गाड़ी में लादकर

अधेरे में ही सतलज नदी में खम्भा नम्बर 13 और 14 में ऊपर से फेंककर रफूचक्कर न होते। 

भगत सिंह और एक कुतर्की का कुतर्क 

पिछले दिनों घृणित आतंकवाद की पर्याय जम्मू-कश्मीर की निंदनीय धरती से

एक बेहद गंदा और कुतर्क से बजबजाता बयान आया।

इस बयान को देने वाला एक एक ऐसा गद्दार है जो खाता इस देश का है

लेकिन पाकिस्तान की घुंघरू पहन कर नाचता उस दुश्मन देश के लिए है

जो आज दुनिया की नजरों में इतना गिर गया है कि उसे उठाया ही नहीं जा सकता।

उसी जम्मू विश्व विद्यालय का एक प्राध्यापक भगतसिंह को आतंकी कहने की हिम्मत करता है।

हद है उस तथाकथित प्राध्यापक की जिसने भगतसिंह के बलिदान को न तो समझ पाया है

और न ही समझने की उसकी औकात समझ में आती है।

कुछ बातें और

भगतसिंह जिंदाबाद हैं और रहेंगे

कुछ बातें भगतसिंह के बारे में ऐसी हैं कि आप शायद ही जानते हों

क्यों कि आजादी के बाद भारत सरकार ने इन्हें पूरी मुस्तैदी से छिपाया है

लेकिन चूंकि पानी का बुलबुल ऊपर आने से कभी नहीं रुकता इसलिए

वह बातें कुछ लोग आज भी जानते हैं।

भगत सिंह को जब फांसी दी गई तब वह 23 साल 5 माह और 26 दिन के थे।

उनके शरीर की लम्बाई 5फुट 10 इंच थी।

जब भगतसिंह को फांसी देने के बाद उनके शरीर को आरी से काट कर टुकड़े टुकड़े करने के बाद

सरकारी आदमी सतलज में फेंक कर भागने लगे तो कुछ लोग वहां आग ताप रहे थे ।

आग तापने वाले लोगों ने बोरी फेंकने वालों को

दौड़ाया लेकिन वह निकल गये। वापस आकर लोगों ने नदी में देखा तो उन्हें लाश वाले बोरे मिले।

भगत सिंह जिंदाबाद जिंदाबाद 

बाहर निकाल कर भगतसिंह की लाश के टुकड़ों को जोड़ा गया

फिर अंतिम संस्कार किया जा सका था।

भगतसिंह से सबसे बड़ा डर किसी अंग्रज कोको नहीं था बल्कि

भगतसिंह से सबसे ज्यादा डर गांधी जी को था।

भगतसिंह 1930/31 में इतना ज्यादा लोकप्रिय थे कि दक्षिण भारत में भी लोग

अपने बच्चों का नाम भगतसिंह अय्यर रखने लगे थे।

लार्ड इरविन की हिम्मत नहीं थी कि भगतसिंह को दिन में फांसी देता

इसीलिए रात के अंधेरे में वह भी गांधी जी के यह विश्वास दिलाने पर कि

मैं भगतसिंह की फांसी के बाद पैदा होने वाले हालात संभाल लूंगा के बाद ही दी गयी थी।

भगतसिंह के बारे में ज्यादा से ज्यादा सही जानकारी

को कांग्रेस की सरकारों ने छिपाया है यह भी एक सच्चाई है।

इसके बावजूद सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि भगतसिंह जिंदाबाद हैं और रहेंगे । 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 02122018

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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