यह उन दिनों की बात है?

यह उन दिनों की बात है? 

यह उन दिनों की बात है जब मैं प्राईमरी पाठशाला किर्तीखेड़ा में पढता था।

सबसे पहले तो आपको बता दें कि तब आज की तरह न तो कोई सर्वशिक्षा अभियान चल रहा था

और न ही सब पढो सब बढो का नारा ही लगाया जाता था।

हां सुबह जब तक करेरा वाले पंडित जी, चंदौरा वाले दीक्षित जी

दौलतियापुर वाले सविता जी महना वाले मन्ना मास्टर साहब और

तपनी वाले जय करन मास्टर साहब नहीं आते थे तब तक हम

अपनी अपनी पाटी और बोरी एक तरफ रख कर जम कर कबड्डी

या छुई छुआल जैसे ऊधम मचाने वाले खेल खूब खेला करते थे।

शिक्षा के पतन की कहानी 

बुरा मत मानिए तब हमारे स्कूल में केवल हमारे गांव के ही बच्चे नहीं आते थे

बल्कि अगल बगल के गांवों यानी रेंय, चित्तापुर, थवई तक के बच्चों का तांता लगा रहता था।

सच मानिए इसी कारण हम आसपास के गांवों में जब

जाते तो हमें किसी भी तरह का अपरिचित पन नहीं लगता था,

लेकिन अगर इसी बात की तुलना आज से करें तो हकीकत यह है कि हमें

अपने गांव में ही नहीं इस मुहल्ले की बजाय उस मुहल्ले तक में

कोई ढंग से पहचानने वाला नहीं है।

आप ताज्जुब मानेंगे तब हमारे गांव के बच्चे, बूढ़े तक कोंडार गांव की रामलीला देखने जाया करते थे।

हां यह बच्चे ज्यादातर वह बच्चे होते थे जो थवई के जूनियर स्कूल में पढ़ते थे।

शिक्षा का ऐतिहासिक पतन 

थवई हमारे ही गांव के बगल का गांव था जहां स्कूल तो था

लेकिन यह स्कूल हमारे ही गांव का था।

इस स्कूल में रेंय, चित्तापुर के ही नहीं बल्कि महाखेड़ा,

कोंडार, धर्मपुर, गोपाली खेड़ा, गौरी, चंदौरा, रामपुर शिवरी,

बरवट, तपनी, करेरा, हिंतापुर, खुर्मानगर तक के बच्चे पढने आते थे।

हां हमारे गांव के ही बगल वाले गांव अजमत पुर में सरकारी जूनियर स्कूल था

लेकिन वह पढाई के मामले में कतई पापुलर नहीं था ।

हमारा थवई स्कूल बेहद पापुलर था जबकि इसके अध्यापक

केवल 100-150 रुपये में ही पढाते थे और मन लगाकर बच्चों के भले की बात भी करते थे।

कहा तो यहां तक जाता था कि इस स्कूल  के बच्चों का मुकाबला

दूर दूर तक करने वाले भी नहीं मिलते थे।

शायद इसका प्रमाण यही है कि यहां से पढ़कर

निकलने वाले बच्चों में आज कुछ अंतरराष्ट्रीय पत्रकार हैंतो कुछ कई मंडल के कमिश्नर।

जी हां, आज की डेट में इस स्कूल से पढ़कर निकले लोगों में ज्यादातर लोग नौकरी में हैं।

मंडल कमिश्नर आयकर और देश के जाने माने मुंबई के एक पत्रकार इसी स्कूल से पढकर निकले हैं। 

शिक्षा के असली दुश्मन 

शायद यही कारण है कि हम लोग आज भी अगर थवई

वाले स्कूल के अध्यापकों के सामने पड़ जाते हैं तो हांथ जोड़ कर प्रणाम करते हैं

लेकिन हाईस्कूल, इंटर, बीए, एम ए, बीएड, एम एड तक के अध्यापक

यदि हमारे सामने आ जाते हैं तो आज हम उन्हें  पहचान तक नहीं पाते।

इसका कारण यही है कि कि जब हम प्राईमरी में पढते थे तो ढूंढ ढूंढ कर

अपने अध्यापकों के लिए गुड़  चना, गन्ना आदि लाते थे, घरों में मचलते थे कि नहीं

गुरु जी के बिना हम यह नहीं करेंगे,, वह नहीं करेंगे।

पर आज हाल यह है कि अध्यापक नाम से भी एलर्जी टाइप का कुछ आभास होता है।

हकीकत यह है कि आज का अध्यापक टीचर बन गया है।

सच तो यह है कि विश्व बैंक का पैसा हजम करने और

अपनी सारी विकास यात्रा महज कागजों तक सीमित रखने के कारण

आज वह लोग अध्यापक पद पर आ गए हैं जो अपने जीवन में कभी अपने लिए किताब नहीं खोली,

ऐसे में आप ही बताइए वह देश की कर्णधार पीढ़ी का क्या भला करेगी??

ऐसा भी नहीं है कि सरकार यह सब नहीं जानती लेकिन

केवल वोट की भीख के कारण यूपी में शिक्षा को पतुरिया बनाकर बाजार में बिठा दिया गया है। 

आज का अध्यपकब हर वक्त अपनी तनख्वाह और भविष्य की पेंशन के गम में रहता है लेकिन

तब  का अध्यापक

अपनी छोटी सी तनख्वाह में भी सचेत और संतुष्ट रहता था।

 

शिक्षक ही बने शिक्षा के दुश्मन 

आज तिकड़मी लोग जब से इधर-उधर से पेंच फंसाकर मास्साब बन गए हैं

तब से शिक्षा का जितना बंटाधार किया है उससे

ज्यादा समाज के लिए कुछ और पतन का कारण नहीं हो सकता।

दोस्तों, आजकल केवल तिकड़मी अध्यापक ही नहीं हैं बल्कि सरकारें भी तिकड़मी हो चली हैं।

पहले सरकार के प्रतिनिधि जाति धर्म मजहब और इलाका देखकर बात नहीं करते थे

जबकि आजकल हाल यह है कि वोट की खातिर लोग

  गंदगी खाने के मामले में काले कौवे से भी ज्यादा नीचे चले जाते हैं।

बात शिक्षा की करें तोो राज्य सरकारों ने वोट के लालच में शिक्षा व्यवस्था को पतुरिया बना दिया है।

केवल लोगों को खुश करके वोट हासिल करने के चक्कर में

राज्य सरकारों ने संविधान और सर्वोच्च न्यायालय तक को ठेंगा दिखाते हुए वह काम किया है

जिसे दुनिया का कोई भी लाजिक सही नहीं ठहरा सकता।

योगी सरकार की ऐतिहासिक मूर्खता 

बात अगर आजकल की सरकारों की करें तो शिक्षा को

हंसी का पात्र बनाने में कम से कम यूपी में किसी ने भी कोई कोर कसर कभी नहीं छोड़ी।

1998 /1999 में कल्याण सिंह ने केवल वोट बटोरने के चक्कर में

जिस पतनशील व्यवस्था को शुरू किया था, 

उत्तर प्रदेश की लुटेरी सरकारों ने उस  में हर दिन केवल चार चांद ही लगाया है।

कल्याण सिंह के बाद मुलायम सिंह यादव फिर इनके बाद मायावती, अखिलेश यादव ने भी

यूपी में शिक्षा व्यवस्था का भरपूर और जमकर बंटाधार किया है।

ताज्जुब तो इस बात का है कि जिस योगी बाबा की सरकार को समझा गया था कि वह

शिक्षा की सभी विसंगतियों को कम से कम यूपी में दूर करेंगे

वही योगी बाबा और उनकी सरकार ने वह काम किया है

जिसे दुनिया का कोई भी आदमी सही और तार्किक नहीं कह सकता है।

कोई भी प्रतियोगिता जब होती है तो उसे पास करने के लिए कोई न कोई मानक तय किया जाता है

लेकिन महज वोट की भीख के कारण यूपी में योगी सरकार

जिस शिक्षक भर्ती परीक्षा का आयोजन 6जनवरी 2019 को करने जा रही है

उसमेंं अभीतक  कोई मानक ही नहीं तय कर पाई है।

शायद इसी लिए इस भर्ती परीक्षा को लेकर उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालय को

हस्तक्षेप करते हुए सरकार से यह कहना पड़ा कि वह अपने कृत्य को सिद्ध करे कि

वह जो कुछ भी कर रही है वह दुनिया के किसी भी पैमाने पर सही है। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 05012019

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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