क्या विवाह एक ढोंग है?

क्या विवाह एक ढोंग है? 

क्या विवाह एक ढोंग है?

विवाह के बारे में यह भ्रमित करने वाली आशंका से भरी जानकारी मेरी नहीं है

बल्कि यह तथाकथित जानकारी और आशंका कुछ ऐसे विद्वानों की देन है

जिन्हें हम युग पुरुष कहते और मानते हैं।

ओशो जिन्हें हम रजनीश के नाम से भी जानते हैं उनका मानना है कि

हम जिसे विवाह कहते हैं वह एक ढोंग है इससे ज्यादा कुछ नहीं।

अपने कथन की व्याख्या करते हुए वह कहते हैं कि मनुष्य ताउम्र तृप्ति के लिए भटकता रहता है

लेकिन अगर उसे आजीवन तृप्ति नसीब नहीं होती तो उसका कारण यही है कि

हम जिसे सांसारिक तृप्ति का रास्ता मानते हैं वह सचमुच का सही रास्ता नहीं

बल्कि एक ढोंग से अधिक कुछ नहीं है।

ओशो विवाह को एक बंधन और जकड़न भी कहते हैं क्योंकि उनके विचार से

हर स्त्री पुरुष को जकड़न में जकड़ने वाला कोई और नहीं बल्कि वही है

जिसे हम बोलचाल की भाषा में विवाह कहते हैं। 

हम विवाह किसे कहते हैं? 

क्या विवाह एक ढोंग है?

इस सवाल का जवाब न तो हां है और न ही इस सवाल का जवाब न है

बल्कि इस सवाल का असल जवाब यह है कि विवाह तो एक आदर्श सामाजिक संस्था का नाम है

जिसे कुछ महान विद्वान लोग परिवार की कुंजी तक कहते हैं

लेकिन आज इसका रूप इतना विकृत और निकृष्ट होने लगा है कि

यह ढोंग न होने के बाद भी ढोंग प्रतीत होने लगा।

विवाह का शाब्दिक अर्थ है उदव्ह अर्थात वधू को घर ले जाना।

विवाह की परिभाषा या विवाह के मायने को और भी ज्यादा स्पष्ट करते हुए

लूसी मेयर लिखते हैं कि विवाह स्त्री पुरुष का ऐसा योग है

जिससे स्त्री से जन्मा बच्चा माता पिता की वैध संतान माना जाए।

डब्ल्यू एच आर रिवर्स के अनुसार जिन साधनों द्वारा मानव समाज

यौन संबंधों का नियमन करता है उन्हें विवाह की संज्ञा दी जाती है।

इसी तरह प्रसिद्ध समाज शास्त्री वेस्टमार्क के अनुसार

विवाह एक या अधिक पुरुषों का एक या अधिक स्त्रियों के साथ होने वाला वह संबंध है

जिसे प्रथा या कानून स्वीकार करता है और जिसमें इस संगठन में आने वाले

दोनों पक्षों एवं उनसे उत्पन्न बच्चों के अधिकार एवं कर्तव्यों का समावेश होता है।

बोगार्डस के अनुसार अगर बात करें तो विवाह स्त्री

और पुरुष के पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने की संस्था है।

मजूमदार एवं मदन के अनुसार विवाह में कानूनी या धार्मिक आयोजन के रूप में

उन सामाजिक स्वीकृतियों का समावेश होता है जो विषम लिंगियों की यौनक्रिया और संबंधित

सामाजिक आर्थिक संबंधों में सम्मिलित होने का अधिकार प्रदान करती है।

जानसन लिखते हैं विवाह के संबंध में अनिवार्य बात यह है कि यह एक स्थाई संबंध है, 

जिसमे एक स्त्री तथा एक पुरुष समुदाय में अपनी प्रतिष्ठा को खोए बिना

संतान उत्पन्न करने की सामाजिक स्वीकृति प्राप्त करते हैं। 

विवाह ढोंग है मगर किसके लिए? 

क्या विवाह एक ढोंग है?

इस सवाल का जवाब अगर आप यह देते हैं कि हां विवाह एक ढोंग है

तो अगला सवाल है कि वह कौन लोग हैं जिनके लिए विवाह एक ढोंग है?

इस असली सवाल का असली जवाब यह है कि विवाह एक ढोंग उनके लिए है जो

न केवल गैर ईमानदार, लालची, ढोंगी, फरेबी और खुद मक्कार हैं

बल्कि मानवता के नाम पर वह सबसे बड़े झूठे और दगाबाज भी हैं।

जिन्हें पवित्र रिश्ते की पहचान नहीं है विवाह उनके लिए एक ढोंग से ज्यादा कुछ नहीं है

जिनके लिए विवाह दहेज से मालामाल बनने का एक मौका है

उनके लिए विवाह एक ढोंग से ज्यादा कुछ भी नहीं है। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 12022019

 

 

About KPSINGH

मैने बचपन से निकल कर जीवन की राहों में आने के बाद सिर्फ यही सीखा है कि "जंग जारी रहनी चाहिए जीत मिले या सीख दोनों अनमोल हैं" मैं परास्नातक समाज शास्त्र की डिग्री लेने के अलावा CTET और UP TET परीक्षाएं पास की हैं ।मैंने देश के हिन्दी राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन किया है जैसे प्रतियोगिता दर्पण विज्ञान प्रगति आदि ।

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