जानिये क्या है साइटिका और कैसे पाए इससे राहत

जानिये क्या है साइटिका और कैसे पाए इससे राहत

 

साइटिका(sciatica)  :    नमस्कार दोस्तों, आज हम “साइटिका” नामक रोग के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे:-

 

साइटिका या गृध्रसी,  नसों मे होने वाला ऐसा दर्द है  !  जिसमे मरीज को सबसे पहले कुल्हे मे दर्द होता है और फिर,   धीरे-धीरे यह दर्द नसों से होते हुए दोनों पैरों मे होता है !  इससे उठने- बैठने व चलने – फिरने में दिक्कत होती है  !

यह कोई रोग नहीं है,  बल्कि रीड से सम्बंधित कुछ रोगों का लक्षण हो सकता है !  कभी-कभी सगर्भावस्था के कारण भी दर्द शुरू हो सकता है !  अधिक मेहनत करने या भारी वजन उठाने, अनुचित जीवनशैली व खान-पान, उठने बैठने की गलत मुद्रा एवं रुखा,शीतल एवं आवश्यकता से कम मात्रा में आहार,अति संसार-व्यवहार, अधिक व्यायाम, चिंतित रहना, मल-मूत्र आदि के वेगों को रोकना, शारीर मे कच्चा रस बनना आदि कारणों से भी यह दर्द हो सकता है !

कैसे पाएं साइटिका से राहत

अधिकांश मामलों में कमर की गद्दी के अपने स्थान से खिसकने के कारण साइटिका का दर्द होना पाया जाता है  !  इसमें चिकित्सक की सलाह के अनुसार १५ दिनों से २ महीनों तक सिर्फ थोडा विश्राम करने और हलकी कसरत एवं योगासन जैसे की मकरासन,  भुजंगासन,  वज्रासन  आदि का सहारा लेने से काफी लोगों को फायदा मिल जाता है !

साइटिका में लाभदायक अन्य प्रयोग

आयुर्वेदिक औशध्यालयों में कुछ आयुर्वेदिक औषधियां उपलब्ध हैं,  जो साइटिका नमक रोग में उत्तम लाभ देने वाली हैं:

(१) अश्वगंधा चूर्ण व टेबलेट : २ से ४ ग्राम अश्वगंधा चूर्ण या २ से ४ अश्वगंधा टेबलेट सुबह खाली पेट दूध के साथ लें.

(२) वज्र रसायन टेबलेट : आधी से १ गोली देशी गाय के दूध, घी अथवा शुद्ध शहद के साथ सुबह खाली पेट लें .

(३) स्पेशल मालिश तेल : इससे दिन में एक-दो बार हलके हाथों से मालिश करके गर्म कपडे से सिंकाई करें .

(४) संधिशूलहर योग चूर्ण: २ चम्मच चूर्ण रात को एक गिलास पानी में भिगों दें .  सुबह इसे उबालें ,  आधा पानी शेष रहने पर छान के पियें .

अनुभूत घरेलु प्रयोग:-

पारिजात के १० से १५ पत्ते ३०० मी.ली. पानी में उबालें !  २०० मी.ली. पानी शेष रहने पर छानें और २५ से ५० मी.ग्रा. केसर घोंटकर इस पानी में घोल दें  !   १०० मी.ली. सुबह-शाम पियें  !   १५ दिन तक पीने से साइटिका जड़ से चला जाता है !  स्लिप-डिस्क में भी यह प्रयोग रामबाण उपाय है !
केवल वसंत ऋतु में इसका प्रयोग न करें !  बाकी किसी भी ऋतु में इसका प्रयोग कर सकते हैं  !

वैध्कीय सालाहनुसार उचित आहार-विहार, पंचकर्म-चिकित्सा, आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन आदि से संतोषकारक परिणाम मिलते हैं…

सावधानियां :-

(१) वायुवर्धक पदार्थ जैसे  –   आलू, मटर, चना, अरहर की दाल, बासी
भोजन,  अति ठंडा पानी आदि से तथा अति उपवास से बचें .

(२) पेट में कब्ज़, गैस आदि ना होने दें एवं प्रसन्न रहें .

(३) कमोड शौचालय का प्रयोग करें,  ऊँची ऐड़ी की चप्पल ना पहनें,  अधिक दर्द होने पर शारीर को आराम दें एवं मुलायम गद्दे पर न सोयें …

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