इंसानियत अथवा मनुष्यता – कैसे बनें महान? 

इंसानियत अथवा मनुष्यता से कैसे बनें महान?

इंसानियत अथवा मनुष्यता – कैसे बनें महान? 

इंसानियतअथवा मनुष्यता क्या है?  इस पर शास्त्रों में, तथा नीति में कई अच्छे निर्देश मिलते है।, विद्वानों ने, कवियों और शायरों ने भी बहुत कुछ कहा है। “शीलम परम भूषणम” अर्थात शील अथवा संयम मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है। शील से रहित मनुष्य तो पशु ही है। भर्तृहरि लिखते हैं:-

येषां न विद्या न तपो न दानं
ज्ञानं न शीलम न गुणों न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।।
अर्थात- जिन मनुष्यों में न विद्या है, न तप है, न दान देने की भावना है, न ज्ञान है, न संयम है, न ही जीवन में कोई उत्तम गुण है और न ही धर्म है, वे पृथवी पर भारस्वरूप पशु ही हैं, जो मनुष्य के रूप में विचरण करते हैं।
ऐसे ही किसी शायर ने भी कहा है-
दर्दे-दिल पासे वफ़ा और जज़्बए ईमान होना
है आदमियत यहि और यहि इंसान होना
इन शब्दों में किसी शायर ने क्या खूब कहा है-
चलो दोस्तों से मुलाक़ात करें, नया साल है नयी बात करें।
मजहबों के नाम क्यूँ दंगे फसाद, हर शख्स से सवालात करें।
न मरे कोई भूखा प्यासा, मिलकर ज़माने से ऐसे हालत करें।
है गुजारिश ज़माने से यही ‘आशिक़’, मुल्क में अमन की बरसात करें।
उपरोक्त कथन अच्छी इंसानियतअथवा मनुष्यता को ही दर्शाते हैं। कहते हैं अच्छे कार्य करने से तीन बुराइयाँ समाप्त हो जाती हैं- निर्धनता, निराशा और अपराध। ज़िन्दगी के हर कदम पर पुष्प बिखेरते चलो, एक दिन आप अपना बाग़ बना लोगे। अंतरात्मा की आवाज़ पूरी ज़िन्दगी मार्गदर्शन करती है अगर कोई इसकी सुने।
बेल या लता की तरह सहारा तलाशने की बजाये वृक्ष की तरह दूसरों को सहारा देना क्या काबिल-ऐ-तारीफ नहीं है? कभी भी किसी का दिल न दुखाओ, कहीं उसके आंसू आपका दर्द न बन जाये। अगर आप चाहतें हैं कि लोग आपको याद रखें तो अपना व्यवहार सबके साथ ठीक रखें। हर किसी से तहजीब से पेश आएँ। मिठासभरी जबान बोलें।
याद रखें फूल की सोहबत में रहकर मिटटी के जर्रों से भी खुशबू आने लगती है। आप जानते हैं कि शमां किस तरह खुद जलकर, दूसरों को रौशनी देकर ज़िन्दगी बसर करती है। चाँद अपनी रौशनी आसमान पर फैला देता है मगर दिन के दाग सीने तक महदूद रखता है। खुद को बदल दो तो तक़दीर खुद बदल जाती है। नेकी करने से इंसान की उम्र बढ़ती है।
ग़लत ख्वाहिशें ग़लत रास्तों को अंजाम देती हैं। कुछ लोग अच्छा बनने की इतनी कोशिश नहीं करते हैं, जितनी कोशिश अच्छा नजर आने की करते हैं। ध्यान रहे अपने ज़मीर से बढ़कर कोई और उस्ताद नहीं। महान बनने के लिए इंसानियत अथवा मनुष्यता होनी जरूरी है.
इज़्ज़त दौलत से नहीं इंसान के किरदार और नज़रिये से होती है। सच्चाई एक ऐसी दवा है जिसकी लज़्ज़त कड़वी मगर तासीर शहद से भी मीठी है। सच्चाई कभी अपने तलाशने वाले को ज़लील नहीं होने देती। याद रखना चाहिए कि रूप, दौलत और जवानी तीनों कुछ वक़्त के लिए है। यह बात समझ आजाने के बाद सारी हक़ीक़त सामने आजाती है।
हर रोज दुनिया में नया सूरज इसलिए निकलता है कि आप चढ़ते सूरज की तरह तरक़्क़ी करें। तरक़्क़ी करने के लिए ज़िन्दगी को संवारने के लिए वक़्त की क़द्र करना ज़रूरी है। सच्चाई यही है कि वक़्त ही ज़िन्दगी को संवारता है। किसी को पाने की तमन्ना करने की बजाये अपने आप को इस क़ाबिल बनायें कि लोग आपको पाने की तमन्ना करें। इंसानियत अथवा मनुष्यता के बिना यह बिलकुल भी संभव नहीं है 
निम्न श्लोक में जीवन के यथार्थ के बारे में कितना स्पष्ट किया गया है-
धनानि भूमौं पशवश्च गोष्ठे
भार्या गृहद्वारी सखा शमशाने
देहश्चितायाँ परलोकमार्गे
धर्मानुगो गच्छति जीव एक:
मनुष्य की मृत्यु पर, जीवनभर ग़लत तरीके से जोड़ा हुआ धन जिस प्रकार इसी जमीन पर छूट जाता है। घर के पालतू जानवर बाड़े में ही रह जाते है। घरवाली अथवा बीवी जिसे अर्धांगिनी या धर्म-पत्नी से सम्बोधित किया जाता है, वह भी ज़्यादा से ज़्यादा घर के दरवाजे तक और सगे सम्बन्धी श्मशान तक ही जा पाते हैं। उसी तरह यह शरीर जिसे ज़िन्दगी भर प्यार करते रहे चिता पर ही रह जाता है। परलोक में अगर साथ जाता है तो इंसानियत अथवा मनुष्यता के साथ इंसान का धर्म अथवा अच्छा-बुरा कर्म।
फिर भी मनुष्य इस सत्य को झुठलाकर जीवनभर अनेक प्रकार के ग़लत अशोभनीय प्रपंचों में पड़ा रहता है। मनुष्य के दृष्टिकोण के दो रूप देखे जा सकते हैं-
१-मानवीय
२-अमानवीय
एक इंसान का दूसरे इंसान के साथ कैसा सम्बन्ध होना चाहिए, नीति-सूत्रों में यह बात निर्धारित होती है। उसके अनुसार व्यवहार करने वाले व्यक्ति का दृष्टिकोण मानवीय कहलाता है।
जो व्यक्ति दूसरों के हितों की उपेक्षा करता है, उन्हें कुचल देता है, किसी का शोषण करता हो या सताता हो, यह पाशविक अथवा अमानवीय वृत्ति कहलाती है। इस वृत्ति को बदलने से ही मानवीय सम्बंधों का परिष्कार हो सकता है।
इसीलिए सभी को अपने बारे में विचार करना चाहिए और अपने व्यवहार का विश्लेषण भी करते रहना चाहिए ताकि समाज में आपकी इज़्ज़त और मान-मर्यादा पूर्णरूप से बनी रहे। इंसानियत अथवा मनुष्यता के कारण इस लोक में तो लोग आपका यथोचित सम्मान जीवनपर्यन्त करते ही रहें बल्कि परलोक में भी तदनुरूप आपके सुकर्मो का फल भी आपको मिल सके.
शुभकामनाओं के साथ
नागेंद्र दत्त शर्मा 
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About nsharma3

My name is Nagendra Dutt Sharma residing at present in Dehradun, a city Capital of Uttarakhand, one of the famous States of India, the beautiful hilly area of Garhwal Himalayas, a very popular and famous touristic place that is also known as a hub for good education which also have a charming and fascinating climate to live. I've retired as an Assistant Accounts Manager after rendering more than 35 years of service in U P Forest Corporation and Uttarakhand Forest Development Corporation, Dehradun. I also worked as a Manager Accounts on deputation in District Project Management Unit, Swajal, Haridwar (a Govt. of India and World Bank project) during July 1,2009 to May 14, 2010. I am the author of the following books published and printed by Worldwide Trade, Dehradun— “How To Make R$.10,000 Every Month In A Perfect Home Mail Order Business!(1993),” “Your Educational Guide To Mail Order Success!(1995)” and “Business Success Secrets!(1996)” I was also an Honorary Editor of “The Mail Order India International,” a quarterly magazine, published between 1989 to 1996 which was then mailed in more than 100 countries around the world. My other books “How to Write and Self-publish Your Way to Riches!” and "how to Grow Rich in Online Home Business!" recently self-published by me through Amazon’s CreateSpace and Kindle publishing services. Both books are available on Amazon.com I also have got self-published my another book recently in Hindi Language, "Aapke Mastishk Ke Chamatkaar!" through Online Gatha, Lucknow which is also available on Amazon, Flipkart, Snapdeal, Shopclues and onlinegatha.com websites in both printed and eBook PDF format. http://tinyurl.com/huxe9tw My overall view in nutshell is: All people here on this planet earth are for help to each other. If we do not stick to this principle, we are not heading in the direction in which the Almighty is trying to lead us. Life is short, our memories will remain only if our deeds are thoughtful and kind. I understand that we people are unique creatures of that Almighty and everyone of us has excellent and incomparable features and came here on the earth for a particular purpose which each of us catches according to His direction. We must not act like animals as the animals have no mind and imagination to feel what is good and what is bad. If we do like them, then how are we different from them? We must think about others... all others on this earth. That,s why I believe in this quote from...Pope: "Honor and shame from no condition rise; Act well your part, there all the honor lies"

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