भगवान स्वामिनारायण का जीवन परिचय Bhagawan Swaminarayan Ka Jiwan Parichay

भगवान स्वामिनारायण का जीवन परिचय Bhagawan Swaminarayan Ka Jiwan Parichay

भगवान स्वामिनारायण का जीवन परिचय, दोस्तों, भगवान स्वामिनारायण अद्भुत शक्तियों के स्वामी तथा बहुत ही विद्वान थे । आज हमारे देश में इनके नाम से कई सारी स्कूल व संस्थाएं चल रहीं हैं । इनकी कई सारी मन्दिरें हैं जहाँ इनकी पूजा एक भगवान की तरह की जाती है । आज हम इनके जीवन की कुछ महत्वपूर्ण जानकारियों को जानेंगे ।

भगवान स्वामिनारायण का जन्म व शिक्षा-दीक्षा –

 

भगवान स्वामी नारायण का जन्म  2 अप्रैल सन् 1781 को अयोध्या के निकट छपिया में हुआ था । बचपन में उनका नाम घनश्याम था ।भगवान स्वामीनारायण बचपन से ही भगवान में आस्था रखते थे ।तथा उन्हें संसार की किसी भी चीज़ में कोई लगाव नहीं था । 8 वर्ष की उम्र में ही वह  धर्म शास्त्रों में लीन हो गए ।  उन्होंने गीता, पुराण, धर्मशास्त्र और दर्शन का गहराई से अध्ययन किया । 10 वर्ष की आयु तक उन्होंने यह अध्ययन पूरा किया । इनके गुरु का नाम रामानंद स्वामी था  । उन्होंने ही इन्हें साधु की दीक्षा दी तथा इनका नाम सहजानंद स्वामी रखा ।

गृह-त्याग –

मात्र 11 वर्ष की आयु में ही इन्होंने घर का त्याग कर दिया । नंगें पांव और खुले बदन 7 वर्षों तक पैदल ही इन्होंने भारत के सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन किये । इन्होंने मान-सरोवर (हिमालय), कामाक्षी मंदिर (नेपाल), गंगासागर, रामेश्वरम, गिरनार तथा जूनागढ़ आदि मुख्य तीर्थ स्थलों की पैदल ही यात्रा की ।

गुरू-पद और स्वामिनारायण नाम मिलाना –

गुरु रामानंद स्वामी ने साधु-दीक्षा देने के बाद मात्र 21 वर्ष की आयु में ही सहजानंद स्वामी को अपने संप्रदाय के गुरु पद बैठा दिया । गुरु का स्वर्गवास हो जाने के बाद सहजानंद स्वामी ने अपने अनुयायियों को स्वामीनारायण महामंत्र दिया । इस तरह वह भगवान स्वामीनारायण नाम से भी प्रसिद्ध हो गए । 49 वर्ष की आयु तक इन्होंने 3000 संतो को लेकर गुजरात-सौराष्ट्र में जाकर अनेक प्रकार के धार्मिक आडंबरों और सामाजिक बुराइयों का को समाप्त किया । और वहां के लोगों को उचित मार्गदर्शन दिया । गुजरात में होने वाली पशु-बलि, सती- प्रथा, छुआ-छूत तथा ऊंच-नीच का भेदभाव आदि बुराइयों को इन्होंने समाप्त किया तथा नवजागरण युग प्रारंभ किया ।

भगवान स्वामिनारायण का देहांत –

भगवान स्वामिनारायण के तेज से प्रभावित होकर उस समय के अनेक डाकू इनके परम भक्त बन गए । इन्होंने कुल 6 मंदिरों का निर्माण भी कराया था । इस तरह जन सेवा करते हुए भगवान स्वामिनारायण सन् 1830 में इस दुनियां से अंतर्ध्यान हो गए ।

दोस्तों, ये जानकारी आपको अच्छी लगे तो ऐसे sare जरूर करें ।

धन्यवाद ।

एस के भारती

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